हिमाचली लोक कथा: फूलमू रांझू की दुखद प्रेम कहानी

Er S D Ojha
फूलमू रांझू की जोड़ी राधा कृष्ण की जोड़ी थी । उनका प्यार तब से कुलांचे भरने लगा था , जब वे शैशव अवस्था में थे । रांझू एक बड़े जमींदार का बेटा था । फूलमू एक मामूली गड़ेरिए की बेटी थी । फूलमू का बाप जमींदार की भेड़ें चराया करता था । एक बार फूलमू अपने पिता के साथ जमींदार के घर गयी । वहीं पर उसकी मुलाकात जमींदार के बेटे रांझू से हुई । दोनों लगभग एक हीं उम्र के थे । दोनों साथ खेलने लगे । बच्चों में ऊंच नीच की भावना बिल्कुल नहीं होती । फूलमू का बाप भेड़ों को चराने ले गया । फूलमू को वहीं छोड़ गया । वह रांझू के साथ खेलती रही ।
शाम को फूलमू का पिता भेड़ों को चराकर वापस आया । फिर वहाँ से बाप बेटी साथ साथ अपने घर गये । अब यह रोजाना का किस्सा हो गया । फूलमू अपने पिता के साथ जमींदार के घर आती । फूलमू का पिता भेड़ें चराने चला जाता और फूलमू रांझू के साथ खेलने में व्यस्त हो जाती । भेड़ें चराने के बाद फूलमू का पिता भेड़ों को वापस लाता । उनको बाड़े में बंद करता और शाम ढले दोनों बाप बेटी अपने घर चले जाते ।
इसी तरस फूलमू और रांझू साथ साथ खेलते हुए अब बड़े हो गये थे । उनकी बचपन की दोस्ती प्यार में बदल गयी थी । वे दोनों एक दूसरे को चाहने लगे । रांझू बहुत सुंदर बाँसुरी बजाता था । बाँसुरी की तान सुनकर फूलमू रांझू के पास भागी चली आती थी । ठीक इनका हाल राधा कृष्ण की तरह था । राधा भी कृष्ण की बाँसुरी वादन पर मोहित थी । वह भी बाँसुरी की धुन सुनकर कृष्ण के पास बावरिया की तरह दौड़ी चली जाती थीं ।
एक दिन फूलमू रांझू से अचानक अपने दिल की बात बता देती है । वह कहती है कि रांझू के बिना उसे एक क्षण भी कल नहीं पड़ता है । वही हाल रांझू का भी था । उसकी भी “मोंहे एक पल न आवे चैना , सजना तेरे बिना ” वाली हालत थी । रांझू रोज बाँसुरी बजाता था । फूलमू रोज उससे मिलने आती । दोनों एक दूसरे को अपनी भावनाओं से अवगत कराते । अब वे हुश्न और इश्क के दरमियां प्यार के झूले झूलने लगे थे ।
कहते हैं कि इश्क ज्यादा दिनों तक नहीं छुपता । एक दिन जग जाहिर होकर हीं रहता है । फूलमू व रांझू के इश्क का भी एक दिन सबको पता चल गया । जमींदार के किसी आदमी ने दोनों को एक साथ बातें करते हुए देख लिया था । उसने यह खबर जमींदार को दे दी । अब जमींदार ने रांझू पर तगड़ा पहरा बिठा दिया । उसे घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी । उसके बाद रांझू की बाँसुरी कभी नहीं बजी । फूलमू भी उससे मिलने के लिए कभी नहीं आई ।
एक दिन रांझू रात के अंधेरे में छिपकर फूलमू से मिला । लेकिन फूलमू रांझू को समझाती है कि प्यार बलिदान माँगता है । अब दोनों का मिलना सही नहीं होगा । दोनों के घर वालों के मान सम्मान पर आंच आएगी । हमें अपने प्यार का बलिदान करना होगा । अपने घरवालों की बात माननी होगी । दोनों को खुद को संभालना होगा । एक दूसरे को भूलना होगा ।
इधर जमींदार को पता चल जाता है कि रांझू फूलमू से मिलने गया था । जमींदार रांझू पर और तगड़ा पहरा बिठा देता है । पंडित को बुलाकर शुभ लगन और मुहुर्त दिखवाया और आनन फानन में अपने बेटे की शादी किसी और धनाढ्य जमींदार की बेटी से तय कर दिया । यह बात आग की तरह फैली । फूलमू को भी पता चला । वह इस खबर को सहन नहीं कर पाती । वह आत्म हत्या कर लेती है ।
जहाँ फूलमू का दाह संस्कार हो रहा है , उसी रास्ते से रांझू की बारात गुजरती है । रांझू पालकी से उतर जाता है । वह अपने पिता से चिता में अग्नि प्रज्वलित करने की इच्छा जताता है । रांझू के पिता आज्ञा दे देते हैं । रांझू चिता को आग देता है । वहीं खड़े खड़े वह विचलित हो जाता है । फूलमू की मौत के सदमे को वह बरदाश्त नहीं कर पाता । रांझू भी चिता में कूद जाता है । धीरे धीरे जल रही चिता अब धू धू कर जलने लगी मानो वह रांझू का हीं इंतजार कर रही थी ।

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