भाजपा लोजपा के चक्र कुचक्रों के बीच चल रहे बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार बाजी पलट सकते हैं.

बिहार विधान सभा 2020 के चुनाव के लिए सीटों का फार्मूला तय हो गया है. इसके तहत जदयू 122 सीटों पर और भाजपा 121 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. लोजपा एनडीए से बाहर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी वहीँ जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा महागठबंधन को छोड़कर एनडीए का हिस्सा बना और इसके बदले में उसे 7 सीट जदयू ने अपने हिस्से से दिया है. लोजपा के एनडीए से बाहर निकलने की अवस्था में हुए दलित वोटों के नुकसान की भरपाई के लिए मुकेश सहनी की पार्टी VIP को एनडीए का हिस्सा बनाया गया है. और तय फॉर्मूले के तहत VIP को भाजपा अपने कोटे से सीट देगी.

तीन चरणों में संपन्न होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव की तस्वीर इस बार बेहद जटिल है. लोजपा की घोषणा के बाद कि वो 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी, लेकिन एनडीए के दूसरे घटक भाजपा के खिलाफ नहीं है, बल्कि उसका विरोध सिर्फ जदयू से है, ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नज़र में जदयू के खिलाफ भीतरघात की संभावना को बलबती कर दिया है. खासकर जिस तरह से भाजपा के पुराने, दिग्गज नेता एक एक करके लोजपा ज्वाइन कर रहे हैं और चुनाव लड़ने के लिए कमर कस रहे हैं. ताजा नाम उषा विद्यार्थी का है, जिन्होंने राजेंद्र सिंह के बाद लोजपा ज्वाइन किया है. अभी आने वाले दिनों में और भी कई भाजपाई नेता लोजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं.

इस नए डेवलपमेंट को जदयू नेतृत्व जहाँ चिंता की नज़र से देख रहा होगा, वहीँ महागठबंधन की नज़रें भी इस नए डेवेलपमेंट पर टिकी होंगी. कई तरह के सवाल राजनीतिक पटल पर उभर कर आ रहे हैं,
एक, क्या जीतनराम मांझी लोजपा के एनडीए से निकलने के बाद दलित वोट को एनडीए के पक्ष में कर पाने में सफल होंगे? क्या जीतनराम मांझी का कद बिहार के दलितों में रामबिलास पासवान समकक्ष है.

दूसरे, लोजपा किस हद तक जदयू की राजनीतिक संभावनाओं को डैमेज करने में सक्षम है. एक तरफ भाजपा नेतृत्व चाहे वो उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी हों या फिर भूपेंद्र यादव नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात करते हैं, वहीँ दूसरी ओर भाजपा नेता लोजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, क्या वचन और व्यवहार का ये विरोधाभास गठबंधन धर्म का सीधा सीधा उल्लंघन नहीं है.

सवाल ये है कि क्या बिहार की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं.

लोजपा ने जहां मुख्यमंत्री नीतीश की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक सात निश्चय योजना की आलोचना करते हुए भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था वहीं उन्होंने कोरोना महामारी और प्रवासी श्रमिकों के मुद्दे पर ठीक से निपटने में नीतीश सरकार की विफलता करार दिया था. जदयू अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि जदयू के साथ लोजपा का कथित विशिष्ट वैचारिक मतभेत को पार्टी जानना चाहती है. उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनावों के दौरान वे हमारे साथ भागीदार थे और उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में नीतीश कुमार की उपस्थिति का अनुरोध किया और चुनाव जीते. अब बिहार विधानसभा चुनावों के लिए वे वैचारिक अंतर का दावा कर रहे हैं.

इन तमाम सवालों के बीच महागठबंधन जिसमे राजद, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां एकजुट होकर लड़ रही हैं, इन तमाम राजनीतिक डेवलपमेंट्स को गौर से देख रहा होगा और अपने लिए संभावनाएं तलाश रहा होगा.

भाजपा का लम्बे समय से संजोया सपना कि पडोसी राज्य उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अपने बलबूते सरकार बनाये किसी से छुपा नहीं है. वर्तमान राजनीतिक कवायद इसी सपने को पूरा करने की दिशा में उठाया गया मास्टर स्ट्रोक है.

पर बिहार की राजनीति पर लम्बे समय से नज़र रखने वाले विशेषज्ञों की राय में बिहार की राजनीति के चाणक्य नीतीश कुमार को कमतर आंकना बड़ी भूल होगी. कई राजनीतिक टिप्पणीकारों की नज़र में चुनाव के बाद नए अलायन्स की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

कुल मिलाकर तमाम कयासों के बीच बिहार विधान सभा चुनाव काफी रोचक हो चला है.


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