लोजपा बन रहा भाजपा नेताओं का रैनबसेरा

लोजपा बन रहा भाजपा नेताओं का रैनबसेरा। रैनबसेरा इसलिए कि ये अस्थायी निवास है. बिहार में अवसरवादी राजनीति अपने चरम पर है. लोजपा के नेता चिराग पासवान के द्वारा घोषणा करने के बाद कि वे नीतीश कुमार के खिलाफ ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे और सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के सिर्फ एक घटक जदयू के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे और भाजपा के खिलाफ शांत रहेंगे, भाजपा नेताओं का रेन बसेरा बन गया है लोजपा.

लोजपा जो रामबिलास परिवार की बपौती की तरह काम करता है, के काम करने का अपना तरीका है. जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. अलायन्स ऑफ़ एक्सट्रीम. कांग्रेस ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ आदि सवर्ण जातियों के नेतृत्व में दलितों और मुसलमानों को गोलबंद करती थी. इस राजनीतिक गोलबंद में नेतृत्व सवर्ण जातियों के हाथ में हुआ करता था और दलित और मुसलमान वोट बैंक के रूप में काम करते थे. इस राजनीतिक गोलबंदी में अन्य पिछड़ा वर्ग वंचित रह जाता था. अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आयी जातियां जैसे यादव, कुर्मी, कोयरी, आदि लोहिया के नारे से प्रेरित होते हुए बिहार में समाजवाद के झंडे तले एकत्र हुए और उनका राजनीतिक सशक्तिकरण हुआ. 1989 में भागलपुर दंगे में कांग्रेस की असफलता और फिर बाबरी मस्जिद के विध्वंस में केंद्र में कांग्रेस सरकार की अकर्मण्यता ने मुसलमानों का कांग्रेस से मोह भंग किया और वे समाजवादी दलों खासकर राजद के तरफ खिंचे चले आये.

बिहार में मुख्यतः पासवान वोटों को एकजुट रखते हुए सत्ता के गलियारे में टिका लोजपा जहाँ पासवान परिवार के सदस्यों को सत्ता के गलियारे में भेजता है, वहीँ अन्य सीटों पर जीत हासिल करने के लिए सवर्ण जातियों के बाहुबलियों के साथ गलबहियां करता नज़र आता है. दोनों पक्षों के लिए ये सुविधाजनक स्थिति है. जहाँ सवर्ण जातियों के बाहुबलियों के पास धन बल है, अपनी जातियों का समर्थन है, वहीँ लोजपा के बैनर तले चुनाव लड़ने से उन्हें दलित वोटों का सहारा भी मिल जाता है. लोजपा को ऐसे उम्मीदवारों के चुनावी अभियान के लिए धन नहीं जुटाना पड़ता, उलटे पार्टी फण्ड में पैसे चले आते हैं.

फिलहाल भाजपा से प्रभावशाली नेताओं का लोजपा में आना बदस्तूर जारी है. सबसे पहले आरएसएस के करीबी राजेंद्र सिंह दिनारा से चुनाव लड़ने के लिए कमर कसा, जहां उनका मुकाबला जदयू के प्रभावशाली नेता जयकुमार सिंह से होगा. राजेंद्र सिंह के बाद पालीगंज की पूर्व विधायक उषा विद्यार्थी और रेणु कुशवाहा ने लोजपा का दामन थाम लिया. इस कड़ी में एक और नाम रामेश्वर चौरसिया के रूप में जुड़ गया है.

कुल मिलाकर यह एनडीए के लिए कम और जदयू और नीतीश कुमार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है, खासकर चिराग पासवान की घोषणा कि अगर पर्याप्त संख्या में लोजपा के विधायक चुने जाते हैं, तो लोजपा भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगी.

ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चुनाव के बाद काफी उथल पुथल होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता.


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