जदयू से 7 सीट पाने में सफल रहे जीतनराम मांझी ने राजनीति में एक लंबा सफर तय किया है

तीन चरणों में संपन्न होने वाले बिहार विधान सभा चुनाव 2020 में सात सीट जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के हिस्से आयी है. राजनीति में 40 साल पूरा कर चुके जीतनराम मांझी एक मंझे हुए खिलाड़ी हैं और समय समय पर उन्होंने अपनी लॉयल्टी बदलते हुए ये सिद्ध किया है कि भले मीडिया की नज़र उनकी पैनी राजनीतिक नज़र पर नहीं गयी, पर राजनीति को भांपने में वे ‘मौसम विज्ञानी’ रामबिलास पासवान से उन्नीस हो सकते हैं, अठारह नहीं हैं. बिहार के दलित वोट बैंक पर अधिपत्य के लिए उनकी लड़ाई रामबिलास पासवान और अब उनकी अनुपस्थिति में चिराग पासवान और उनकी पार्टी लोजपा से तेज हो चली है. हालाँकि वे 1980 से विधायक हैं और कांग्रेस, जनता दल, राजद, जदयू की सरकारों में मंत्री भी रह चुके हैं, पर वे बिहार की राजनीति में एक व्यक्तित्व के रूप में 2014 में उभरे, जब 2014 के लोक सभा चुनाव में जदयू के खराब प्रदर्शन की जिम्मेवारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतनराम मांझी को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी. पर एक साल के अंदर ही नीतीश कुमार के आयरन क्लच से बाहर निकलने की चाह और नीतीश कुमार से बड़ी लकीर खींचने की जिद ने जीतनराम मांझी की राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा मांगे जाने पर इंकार करने पर जदयू ने उन्हें पार्टी से बर्खास्त कर दिया. विधानसभा के फ्लोर पर बहुमत सिद्ध किये जाने का अंतिम मार्ग बचा था, पर भाजपा के एन मौके पर हाथ खींच लेने और अनंत सिंह की मदद से जदयू के विधायकों को न टूटने देने में नीतीश कुमार की सफलता ने जीतनराम मांझी के हौसले पस्त कर दिए.

1980 में पहला चुनाव जीतने वाले जीतनराम मांझी ने तब 2015 में अपनी अलग पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा का गठन किया. और 2015 के विधानसभा चुनाव में एनडीए के घटक के तौर पर ( अन्य सहयोगी थे- भाजपा, लोजपा और रालोसपा) 20 सीटों पर चुनाव लड़ा. इन 20 सीटों में 6 अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व सीट था. खुद मांझी दो सीटों पर खड़े हुए -मखदुमपुर और इमामगंज. मखदुमपुर सीट पर उन्हें राजद उम्मीदवार सूबेदार दास से मात खानी पड़ी, पर इमामगंज सीट पर उन्होंने जदयू के कद्दावर नेता उदयनारायण चौधरी को पटखनी देने में सफलता हासिल की.

किसी भी दल में स्थिर होकर नहीं रहने वाले जीतनराम मांझी महागठबंधन के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर बार्गेनिंग में लगे हुए थे. संतोषजनक परिणाम हाथ नहीं लगने के चलते वे एक बार फिर नीतीश कुमार के संपर्क में आये. लोजपा के एनडीए से अलग होकर स्वंतंत्र रूप से चुनाव लड़ने के फैसले और नीतीश कुमार और जदयू के खिलाफ मोर्चा खोल देने के चलते नीतीश कुमार को दलित चेहरे की जरुरत थी. खासकर जिस तरह से उन्होंने अपने कार्यकाल में दलितों के लिए कई योजनाओं का शुभारम्भ किया। इसके लिए उन्होंने एक तरफ अशोक चौधरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया, वहीं दूसरी तरफ जीतनराम मांझी की पार्टी को अपने कोटे से 7 सीटें दीं.

बिहार की 243 विधानसभा सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान होना है. राज्य में 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को वोट डाले जाएंगे, जबकि मतगणना 10 नवंबर को होगी.

फिलहाल स्थिति ये है कि इमामगंज से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी, बाराचट्टी से ज्योति देवी (जीतन राम मांझी की समधिन), टेकारी से पूर्व मंत्री अनिल कुमार, मखदुमपुर से देवेंद्र मांझी (जीतन राम मांझी के दामाद), सिकंदरा से प्रफुल्ल कुमार मांझी, कसबा से राजेंद्र यादव तथा कुटुंबा से श्रवण भुइयां को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया है।

हम देख सकते हैं कि इन 7 सीटों में से 5 सीट रिज़र्व केटेगरी में आते हैं, वहीं 2 सीट unreserved हैं- कसबा और टेकारी. मखदुमपुर से देवेंद्र मांझी पहली बार अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं. शिक्षा से इंजीनियर और बतौर पेशेवर NCDHR नामक राष्ट्रीय स्तर के एनजीओ में बिहार प्रतिनिधि के रूप में काम कर चुके देवेंद्र मांझी ने अपने ससुर के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके पर्सनल असिस्टेंट के रूप में अपनी पहचान बनायी थी. 1 अन्ने मार्ग में मुख्यमंत्री से मिलने के लिए आने वालों को देवेंद्र मांझी के गुड बुक में रहना होता था. उन पर सरकारी काम में अनधिकृत हस्तक्षेप के आरोप भी लगे थे. पर देवेंद्र मांझी इन आरोपों से परे नयी राजनीतिक पारी खेलने के लिए तैयार हैं.

अपने बयानों से चर्चा में बने रहने वाले जीतनराम मांझी के लिए विवाद कोई नयी बात नहीं है. फेक बीएड डिग्री मामले में आरोपी रह चुके, गया के होटल में बेटे के सेक्स स्कैंडल के छींटे- तमाम परेशानियों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने वाले मांझी पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का ताजा आरोप लग रहा है. पर वे बेफिक्र हैं. लोजपा पर भी यही आरोप है. 2015 के चुनाव में 20 सीटों पर चुनाव लड़कर एक सीट पर जीत हासिल करने वाले और कुल 8 लाख 64 हज़ार वोट पाने वाले मांझी और उनकी पार्टी का मुकाबला चिराग पासवान और लोजपा से है, जो 42 सीटों पर लड़कर 2 सीट पर जीत हासिल कर कुल 18 लाख 40 हज़ार वोट हासिल किया था.

फिलहाल मुख्य लड़ाई जहाँ नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए और तेजस्वी ज्यादा के नेतृत्व में महागठबंधन के बीच है, वहीँ एक बेहद महत्वपूर्ण लड़ाई प्रदेश में दलित नेतृत्व के लिए जीतनराम मांझी और चिराग पासवान के बीच भी है. इस लड़ाई में एक की हार उसके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा सकती है. फिलहाल बिहार 10 नवंबर का इन्तजार कर रहा है. देखें ऊंट किस करवट बैठता है !!


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