एक बिहारी कलाकार जिसने लम्बे संघर्ष के बाद बॉलीवुड में अपनी ख़ास पहचान बनायी…

नवीन शर्मा
फक्कड़पन और मस्तमौला मिजाज अभिनेता संजय मिश्रा के व्यक्तित्व का मूल स्वभाव है। इसकी जड़ें हम भगवान विश्वनाथ की नगरी काशी या कहे वाराणसी (बनारस) की मिट्टी में ढ़ूढ सकते हैं। वही बनारस जिसकी फिजां में संत कबीर के फक्कड़पन की विरासत घुली हुई है। इसकी गलियां भले ही टेढ़ी मेढ़ी भूलभुलैया जैसी भले हो लेकिन बहुत लोग सीधे सादे भी मिल जाएंगे। संजय ने अपना स्कूली जीवन इसी आबोहवा में बीताया था। इसी का गहरा असर इनके जीवन में दिखाई देता है।
बिहार के दरभंगा में हुआ जन्म
06 अक्टूबर 1963 को दरभंगा के पास नारायणपुर गांव में संजय मिश्रा का जन्म हुआ था। वे एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसकी तीन पीढ़ियां प्रशासनिक सेवाओं में रही हैं। इसके बावजूद संजय इस पारिवारिक विरासत को आगे ढोने के लिए राजी नहीं थे। वे घर के सबसे बड़े बेटे थे इस वजह से उनपर प्रशासनिक सेवा में ही जाने का बहुत दबाव रहा होगा, लेकिन संजय का तो लगता है पढ़ाई से 36 का आंकड़ा था। इसी कारण बड़ी मुश्किल से दूसरे प्रयास में दसवीं पास की थी। किसी तरह ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय(National School Of Drama) दाखिला लिया। यहां भी ये पढ़ाई को ज्यादा भाव नहीं देते थे।
मुंबई में संघर्ष की लंबी दास्तान
NSD से पढ़ाई पूरी करने के बाद फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए 1991 में मुंबई पहुंच गए । यहां उनको करियर की शुरूआत में ही अमिताभ बच्चन के साथ मिरिंडा का विज्ञापन करने का शानदार अवसर मिला, लेकिन इसके बावजूद उनका सफर सहूलियतों से भरा नहीं था बल्कि उसमें कई स्पीड ब्रेकर थे जिनको पार करते हुए इनकी गाड़ी धीरे-धीरे और हिचकोले खाते हुए ही गुजरनी थी।
डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के प्रसिद्ध धारावाहिक #चाणक्य(1992) में छोटी सी भूमिका मिली थी लेकिन NSD से अभिनय की तालिम लेकर निखरे संजय को जब एक सीन के लिए 28 रिटेक देने पड़े तो उनको सहज ही पता चल गया होगा कि यह डगर कांटों से भरी है। संजय मिश्रा ने यह चुनौती स्वीकार की और जुट गए संघर्ष में। शुरू के 15 साल कठिन संघर्ष के रहे।
‘Oh Darling! Ye hai India’(1995) से उन्हें बॉलीवुड में बड़ा ब्रेक मिला लेकिन इसके बाद भी सफलता की गाड़ी बहुत धीमी गति से चल रही थी। रामगोपाल वर्मा की सुपर हिट फिल्म सत्या Satya(1998) में भी इनको काम करने का मौका मिला।
1999 के विश्वकप क्रिकेट के टीवी प्रसारण में दर्शकों ने इन्हें #एपल_सिंह’ के नए किरदार में देखा। एपल सिंह का सेंस अॉफ ह्यूमर लाजवाब था और उसके बोल लोगों को खूब पसंद आए थे। संजय को जब फिल्मों में मनमाफिक रोल नहीं मिले तो इन्होंने टीवी की ओर वापस रुख किया।
पंकज कपूर के साथ “ऑफ़िस-ऑफ़िस” में शुक्ला के किरदार के साथ वे अगले कुछ सालों तक लगातार नज़र आते रहे। ये कॉमेडी सीरीयल काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। संजय मिश्रा को देश के कोने-कोने में लोग पहचानने लगे।
मुंबई छोड़ हृषिकेश चले गए, ढाबे में काम किया
पिता का देहांत होने पर संजय घर आए थे, लेकिन वे लौटकर मुंबई नहीं गए । बॉलीवुड से उनका पूरी तरह मोहभंग हो चुका था। वे ऋषिकेश चले गए, वहां कुछ वक्त तक उन्होंने एक ढाबे पर नौकरी की।
इसी दौरान फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी ने इन्हें बुलाया और ‘गोलमाल’(2006) में काम करने का मौका दिया। बॉलीवुड में शानदार वापसी हुई, हां यह और बात है कि गोलमाल के पहले ही यशराज फिल्म्स की ‘बंटी और बबली’(2005) से उन्हें ‘कुरैशी’ का यादगार किरदार मिल चुका था पर गोलमाल के बाद उनका सुनहरा दौर शुरू हो और फिर उन्होंने मुड़कर नहीं देखा।
संजय मिश्रा हालांकि 57 साल के हो गए हैं लेकिन वो इस उमर में ‘आंखों देखी’ जैसी फिल्म हीरो मटेरियल भी बन गए हैं। अभी हाल ही में OTT प्लेटफार्म Hotstar पर रिलीज़ ‘बहुत हुआ सम्मान’ भी इसी कड़ी की फिल्म है।
संजय ने एक इंटरव्यू में बताया कि ”मैं अलग-अलग चीजों को आजमाना बंद नहीं करूंगा, क्योंकि मैं यह देखना चाहता हूं कि दर्शक मेरे प्रयोगों पर किस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं। मुझे पता है कि वे मेरी फिल्मों से कुछ अलग पाने की उम्मीद करते हैं और यह मेरा प्रयास है कि हर बार ऐसा करूं।’
दम लगा के हइईशा में सहज अभिनय
आयुष्मान खुराना और भूमि पेंडकर के लीड रोल वाली फिल्म दम लगा के हइईशा में संजय मिश्रा ने आयुष्मान के पिता का रोल किया था। इस किरदार को उन्होंने बहुत ही सहज ढंग से निभाया था। वे जब तब अपने निठल्ले बेटे को मारने के लिए चप्पल उठा लेते हैं। ये अनुठी अदा उस निम्न मध्यम वर्ग के पिता के किरदार को एकदम स्वभाविक बना देथी है।
झारखंड के रहने वाले फिल्म निर्देशक अविनाश दास #avinas_das की फिल्म #अनार_कली_अॉफ_आरा में संजय मिश्रा ने एक अय्याश कुलपति (वीसी) की भूमिका भी सहज ढंग से निभाई थी। वो एक ठरकी बुड्ढे के रोल में जमते हैं।
निर्देशक नील माधव पंडा की फिल्म कड़वी हवा’ में संजय मिश्रा ही लीड रोल में हैं। छोटे से गांव में अंधा किसान (संजय मिश्रा) ऐसे सूखाग्रस्त गांव रहता है, जहां कभी कभार ही बारिश होती है, इस किसान के बेटे मुकुंद ने भी खेती के लिए बैंक से कर्ज लिया हुआ है जो अब फसल बर्बाद होने की वजह से लौटा नहीं पा रहा है। दरअसल, इस गांव में खेती करने से किसान हिचकिचाते हैं, वजह बैंक से कर्ज लेकर अगर खेती कर भी ली जाए तो बारिश न होने की वजह से पूरी खेती बर्बाद हो जाती है।पिछले कई सालों से इस गांव के किसानों की खेती बारिश ना होने की वजह से चौपट हो चुकी है , इस वजह से यहां के किसान बैंक लोन नहीं चुका पा रहे और इसी दबाव में एक के बाद एक किसान आत्महत्या कर रहा हैं। संजय मिश्रा अपने इस किरदार को पूरी शिद्दत से निभाते हैं।
अब इनके लिए भी लिखे जाते हैं किरदार
इन 25 सालों में उन्होंने जितनी फिल्में कीं, उन्हें करके वे बहुत खुश हैं और उन्हें अच्छा लगता है जब लोग विशेष रूप से उनके लिए भूमिकाएं लिखते हैं। वे कहते हैं, ‘इससे पहले कि मैं कोई फिल्म चुनूं, लेखक और निर्देशक मेरे लिए फिल्में चुनते हैं। वे मुझसे यह कहते हुए संपर्क करते हैं कि उनके पास मेरे लिए एक आदर्श भूमिका है और वे चाहते हैं कि मैं ही उस फिल्म को करूं, क्योंकि मैं उस किरदार के लिए उपयुक्त हूं। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।’ ये करीब करीब वैसा ही मौका है जैसा अमिताभ बच्चन के साथ हो रहा है।
‘बंटी और बबली’, ‘गोलमाल’, ‘वेलकम’, ‘ऑल द बेस्ट : फन बिगिन्स’ और ‘दिलवाले’ जैसी फिल्मों में संजय मिश्रा ने हास्य किरदार निभाए हैं। ने ‘सत्या’, ‘आंखों देखी’, ‘मसान’, ‘दम लगा के हईशा’ और ‘कड़वी हवा’ जैसी गंभीर फिल्मों में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया है।
उनके शब्दों में, ‘लोग मुझे कॉमेडी में देखना पसंद करते हैं और मुझे अपनी फिल्मों के लिए बहुत प्यार मिला है। मैंने कॉमेडी करना कभी बंद नहीं किया और न ही कभी करूंगा। लेकिन अब मैं कॉमेडी के नाम पर ‘कुछ भी’ नहीं करना चाहता। मैं इसके बारे में बहुत स्पष्ट हूं। मैं कई फिल्मों को अस्वीकार कर चुका हूं, जो मुझे ठीक नहीं लगीं। कुछ फिल्में तो ऐसी हैं, जिनसे ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्मकार ऐसी फिल्म बनाकर खुद का मजाक बना रहे हैं।
फिल्म इंडस्ट्री में संजय मिश्रा का 25वां साल है और अब तक उन्होंने अलग-अलग जॉनर में कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया है। इस साल भी उनके पास अच्छी खासी फिल्मों का तांता लगा है, जिनमें सामाजिक थ्रिलर ‘ग्वालियर’, ‘कामयाब’और हॉरर कॉमेडी ‘भूल भुलैया 2’ शामिल हैं।
अच्छा खाना भी बनाते हैं, फोटोग्राफी के शौकीन
संजय मिश्रा के साथ कड़वी हवा और हाल ही में रीलीज हुई फिल्म बहुत हुआ सम्मान में साथ काम कर चुके आर्ट डॉयरेक्टर #प्रभात_ठाकुर संजय मिश्रा के व्यक्तित्व की कुछ खास बताते बताते हैं। वे बताते हैं कि संजय बहुत बढ़िया खाना बनाते हैं। कई बार वे यूनिट के साथियों को भी बनाकर खिलाते हैं। इनको फोटोग्राफी का भी शौक है। इनके पास कई तरह के कैमरे भी हैं। इनको म्यूजिक सुनना भी पसंद है। इनके पास संगीत का अच्छा खासा कलेक्शन भी है।

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