यात्रा वृतांत: मुन्नार, केरल का ‘दार्जिलिंग’

Bharti Pathak 
भारत के दक्षिण पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और सहयाद्रि पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य एक खूबसूरत भूभाग स्थित है जिसे केरल के नाम से जाना जाता है यहाँ की राजधानी तिरुअनंतपुरम है और यहाँ मलयालम भाषा बोली जाती है । अपनी संस्कृति और भाषा वैशिष्ट्य के कारण दक्षिण भारत के चार राज्यों में केरल प्रमुख स्थान रखता है । भूमध्यरेखा से केवल 8 डिग्री की दूरी पर स्थित होने के कारण केरल में मौसम गर्म है लेकिन वन एवं पेड़ पौधों तथा वर्षा की अधिकता के कारण मौसम समशीतोष्ण रहता है । यहाँ की धरती की उच्च निम्न स्थिति भी जलवायु पर बड़ा प्रभाव डालती है ।
वैसे भी घूमने के शौकीनों को कौन सा मौसम या बाधाएं रोक पाती हैं तो इस बार हमने सर्दियों में केरल के सुप्रसिद्ध हिल स्टेशन “मुन्नार” जाने का कार्यक्रम बनाया । कहा जाता है मुन्नार का अर्थ है तीन नदियां जो मधुरपुजहा, नल्लाथन्नी और कुंडाली नदियों के अजीब से संगम क्षेत्र को प्रदर्शित करता है । यह केरल के इडुक्की जिले में स्थित एक क़स्बा या नगर है जो अपनी हरियाली, ऊँचे नीचे पहाड़ और प्राकृतिक सुन्दरता के चलते पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है । जीवन की भागदौड़ और प्रदूषण से मुक्त यह जगह सबका मन मोह लेती है ।
देश के सभी प्रमुख शहरों से मुन्नार पहुँचा जा सकता है हालाँकि मुन्नार तक ट्रेन की सुविधा नहीं है । यहाँ निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन एर्नाकुलम जोकि 140 किलोमीटर की दूरी पर है जबकि 120 किलोमीटर पर अलुवा स्टेशन भी है लेकिन यहाँ सभी ट्रेने नहीं रुकती । निकटतम एअरपोर्ट कोचीन है जिसकी दूरी यहाँ से 105 किलोमीटर है । यहाँ से आगे जाने के लिए तमाम प्राइवेट टैक्सी और पोस्ट-पेड व प्री-पेड वाहन मिल जाते है ।
हमें बंगलुरु से मुन्नार जाना था जिसकी दूरी करीब 480 किलोमीटर है यानि करीब 10 घंटे का सफ़र तो सेमी स्लीपर बस में टिकट बुक की गयी थी और होटल भी पहले से बुक था, यानि हमारे पहुँचने पर होटल की गाड़ी हमे लेने आने वाली थी । अगर परिवार के साथ हैं तो होटल पहले से बुक रहने से सुविधा रहती है वरना जाने पर भी होटलों के विकल्प उपलब्ध हैं । मुन्नार वैसे तो सभी मौसमों में घूमने के लिए एक अच्छा विकल्प है लेकिन फिर भी बारिश के मौसम में जाना सुविधाजनक नहीं होता । हमारी बस बेंगलुरु के शांतिनगर बस स्टॉप से रात में 9 बजकर 2 मिनट पर थी जो सही समय पर मिल गयी और शुरू हुआ एक नयी जगह को देखने के रोमांच का सफ़र ।
रात करीब एक बजे बस कोयेम्बटूर में रुकी जहाँ ड्राइवर को खाना खाना था । थोड़ा अजीब लगा कि इतनी रात को खाना लेकिन फिर सोचा उसका अपना मामला हम क्या कर सकते है लेकिन नींद खुल गयी तो हमें भी कुछ भूख जैसी लग गयी थी । साथ में लोगों ने इडली और सांभर के साथ डोसा भी खाया और मैंने एक कॉफ़ी पी । असली दक्षिण भारतीय कॉफ़ी जो स्टील की मुड़े कोरों वाली गिलास और साथ में एक कटोरी में आई थी । बस करीब आधे घंटे रुकी रही, फिर चली तो सोते जागते रास्ता कटा ।
ऊँचे-नीचे पहाड़ी रास्तों पर रात में कुछ खास दिख भी नहीं रहा था । फिर आँख खुली तो सवेरा हो गया था और प्रकृति का वैभव देखकर हमारी आँखें खुली की खुली रह गयीं । कहीं तो सड़क के दोनों तरफ हरियाली ही हरियाली तो कहीं पहाड़ और जंगल । वैसे भी भगवान का अपना देश केरल (गाड्स ओन कंट्री) दुनिया भर में प्रसिद्ध है उस पर चाय बागानों और पहाड़ी जलवायु के कारण मुन्नार को “दार्जिलिंग ऑफ़ केरल” भी कहते हैं ।
यात्राओं को रोमांचक यूँ ही नहीं कहते ये हमें उस यात्रा में पता चला जब अच्छी भली यात्रा में एक खतरनाक मोड़ पर बस खाई में गिरते-गिरते बची । ड्राईवर की सूझ-बूझ से सबकी जान बची । जल्दी से सबको बस से उतारा गया और शुरू हुआ प्रयास बस को सीधा करने का । ये एक आरामदायक बस थी जिसका नीचे का हिस्सा मोड़ते समय सड़क को छू जा रहा था जिसके कारण बस मुड़ नहीं पा रही थी और रास्ता भी ब्लाक हो गया था । पूरे तीन घंटे की मेहनत के बाद बस सीधी हो पाई । जो बस 7 बजे मुन्नार पहुँचने वाली थी वो 10 बजे अभी मुन्नार से 25 किलोमीटर पहले ही खड़ी थी । बच्चे भूख से बिलखने लगे । खैर राम राम कर बस चली और एक ढाबे पर रुकी तो सबने हाथ मुंह धोकर नाश्ता किया ।
करीब 12 बजे हम मुन्नार पहुंचे । होटल की गाड़ी आकर जा चुकी थी और दोबारा मंगाने में समय की बर्बादी को देखते हुए हमने एक दूसरी गाडी की और होटल पहुंचे । साफ सुथरा कमरा और होटल स्टाफ के आत्मीय व्यवहार से आधी थकन दूर हो गयी । अभी हमारे पास आधा दिन था घूमने को तो फटाफट नहा-धोकर तैयार हुए और 800 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से दोनों दिनों के लिए एक बड़ी गाड़ी बुक कर ली । वैसे होटल वाले भी उचित दर पर कार आदि की व्यवस्था करा देते हैं इसके अलावा पूरे मुन्नार शहर में विभिन्न दुकानों के अलावा ट्रैवल एजेंसी आउटलेट भी हैं तो विकल्पों की कमी नहीं आपके पास । ऐसे पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर कार या कोई और वाहन रिज़र्व करके ही घूमना सुविधाजनक होता है ।
सबसे पहले हम केरल स्पाइस विलेज देखने गए जो होटल से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर था । “केरल स्पाइस विलेज” एक बहुत बड़े क्षेत्रफल में फैला मसालों के उत्पादन का स्थान है । जिसमें टिकट लेकर प्रवेश करना होता है । इसमें अन्दर जाने के लिए विलेज की अपनी गाडी है जो भीतर लेकर जाती है वहां जहाँ से मसालों का बगीचा शुरू होता है । वहां उतर कर फिर ऊँचे नीचे टीलों पर चल कर जाना पड़ता है । एक गाइड साथ होता है जो सभी चीजो को दिखाता है और साथ ही आपके जिज्ञासु प्रश्नों का उत्तर भी देता है । वहां कोई भी फूल या फल तोड़ना या बाहर लाना मना है ।
दूर-दूर तक फैली मसालों की उस पहाड़ी को देखना मनोहारी लगा । करीब एक घंटे लगे वहां घूमकर देखते फिर बाहर आये तो विलेज के ही स्पाइस शॉप में कुछ मसाले खरीदे जो दोस्तों को उपहार के रूप में भी दिए जा सकते थे । ये दुकान काफी बड़ी थी जहाँ पर आर्डर लेकर आपके शहर में डाक या कुरिअर द्वारा मसाले भिजवाने की भी सुविधा उपलब्ध थी ।
शाम हो चली थी और कहीं जाना बेकार था तो ड्राईवर हमें सनसेट पॉइंट दिखाने ले गया जो हमारे होटल के रास्ते में ही था । ये व्यू पॉइंट और बहुत से व्यू पॉइंट की तरह ही था जहाँ खड़े होकर यादगार तस्वीरें ली जा सकती हैं । वहां से डूबते सूरज का नजारा अद्भुत प्रतीत हुआ, हालांकि केरल जैसे प्राकृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में ऐसे नज़ारे आम हैं । होटल पहुंचे तो भूख लग आई थी, खाना खाया और बेसुध सोये क्योंकि बस में भी रात सोते जागते बीती थी ।
सुब जल्दी ही आँख खुल गयी तो बाहर का नजारा देखने लायक था । रात में हुई हलकी बारिश से मौसम सुहावना हो चला था । जल्दी ही तैयार होकर बाहर आये तो गाड़ी वाला आ चुका था । पहले ही बताया की पूरा मुन्नार देखने लायक है जैसे हरी-भरी पहाड़ियां और गरजते झरने, लेकिन फिर भी कुछ खास जगहें ऐसी हैं कि मुन्नार जाकर अगर वहां नहीं गए तो फिर क्या देखा ! तो सबसे पहले हम पहुंचे “मुन्नार हाइडेल पार्क” जो शहर से बस 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।
यह एक काफी बड़ा पार्क है जिसमें खूबसूरत मानव निर्मित झील है और बोटिंग की भी सुविधा है । तरह-तरह के सुन्दर फूलों के साथ ही लवर्स और सुसाइड पॉइंट भी था । अब ये मेरी समझ के बाहर है कि प्रेम के स्थल तो ठीक, ये आत्महत्या के स्थल क्यों बनाये जाते हैं जबकि जीवन में प्रेम के लिए ही समय कम होता है । चूंकि पार्क में बच्चों के मनोरंजन के लिए तमाम झूले और जानवरों के स्टेचू भी थे तो बच्चे बड़े खुश । हमने 1 घंटे का समय वहां बिताया, तस्वीरें ली और स्मृति में भी उन्हें सुरक्षित किया ।
वहां से चले तो कुण्डला डैम पहुंचे जो शहर से करीब २७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यह समुद्र तल से 1700 मीटर की उंचाई पर स्थित है । तीन तरफ ऊँचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरी इस झील की सुन्दरता देखते ही बनती है । यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं तो इस स्थान की सुन्दरता से सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकते । 1946 में “पल्लिवासल हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट” के लिए बना यह एशिया का पहला आर्क डैम है जिससे तेज आवाज में गिरता पानी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है ।
पर्यटकों को रिझाने वाली तरह तरह की दुकानें, खाने-पीने की वस्तुएं और लकड़ी के खिलौनों की तमाम सारी दुकानें थी वहां । टिकट काउंटर पर बोटिंग के लिए टिकट उपलब्ध थे । पैडल बोट के 100 रूपये प्रति व्यक्ति और अधिकतम सवारी 3 जबकि चप्पू बोट के 150 रुपये तथा बोट पर अधिकतम सवारी 4 । हमने तो पैडल बोट चुना क्योंकि बच्चों की इच्छा थी । वैसे ये आप की इच्छा कि क्या चुनें लेकिन वहां जाएँ तो बोटिंग जरूर करें । बेहद सुन्दर झील के साथ ही खूबसूरत नज़ारों को देख कर नीरस से नीरस व्यक्ति मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता ।
हमारी गाड़ी डैम को पार करके आगे खड़ी थी तो पैदल ही गाडी तक आये और अगले पॉइंट की ओर चले यानि “मुट्टूपेट्टी डैम” जो कुंडला डैम से करीब 9 किलोमीटर आगे जाकर है । यह बाँध इडुक्की जिले के महत्वपूर्ण बांधों में से एक है जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर बिजली बनाने के लिए किया जाता है । बाँध द्वारा बने झील के नीले पानी को देखकर मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रहा जा सकता ।
कहते हैं समय हो तो इंतज़ार करके हाथियों का झुण्ड भी यहाँ देखा जा सकता है जो पानी पीने आते रहते हैं । यह झील भी घने जंगलों वाली पहाड़ियों से घिरी है जो स्वप्नलोक का सा अनुभव कराती है । झील के किनारे-किनारे कई तरह की दुकानें भी हैं जो आपकी सुविधा की चीजें उपलब्ध कराती हैं । झील पर बोटिंग की भी सुविधा है लेकिन हम बोटिंग पहले ही कर चुके थे तो आगे चले जो था “ईको पॉइंट” ।
पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक जगहों पर देखे गए ईको पॉइंट (यानि जोर से आवाज लगाने पर वही आवाज पलट कर हमें सुनाई दे ) जैसा ही था बस दृश्य कुछ अलग ही शांत और हरा-भरा यहाँ तक कि झील का पानी भी हरे होने के एहसास जैसा और यहाँ झील के ऊपर आसमान में नीचे से गुजरते बादल पर बनती आकृतियां अत्यधिक लुभावनी लगती हैं ।
वहां से चलकर हम जहाँ गए उस जगह को “टॉप स्टेशन” कहते हैं जहाँ तक गाडी नहीं जाती तो हमें भी उतर कर कुछ दूर पैदल चलना पड़ा । फिर जहाँ पहुंचे वो एक काफी ऊँची जगह थी जहाँ से 360 डिग्री में देखा जा सकता था यानि चारों ओर । उड़ते बादल, ऊँचे-नीचे पहाड़, चाय के हरे-भरे बागान और उड़ते पंछियों का गान । थोड़ा समय वहां बिताकर खुद से मुलाकात की जा सकती है और कोई भरोसा नहीं कि मन कवि हो जाये । थोड़ी देर बाद हम आगे चले ।
मुन्नार जाकर अगर चाय के बागान नहीं देखे तो क्या देखा, यानि हम पहुँच गए थे “कानन देवन हिल्स” जहाँ ‘टाटा टी’ के चाय बागान हैं । कानन देवन हिल्स प्लांटेशन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड की एक अनूठी विशेषता भागीदारी प्रबंधन प्रणाली का कार्यान्वयन है जो कंपनी प्रबंधन में कर्मचारियों की भागीदारी सुनिश्चित करती है । दूर-दूर तक फैली चाय बागानों की हरियाली मन मोह लेती है । यहाँ हमने चाय की फैक्ट्री का भ्रमण किया जिसका टिकट 100 रु. प्रति व्यक्ति था । भीतर शीशे की खिड़कियों से दूर से ही चाय बनाने के तरीकों को दिखाया जाता है, साथ ही भिन्न-भिन्न प्रकार की चाय बनाने के तरीकों के बारे में भी विस्तार से बताया जाता है । बाहर आये तो चाय की फैक्ट्री की ही दुकान से कॉफ़ी पी और कुछ चाय और कॉफ़ी के पैकेट्स लिए साथ ही हैण्डमेड चॉकलेट्स भी जो आपको मुन्नार में हर जगह मिल जाएँगी ।
दोपहर हो चली थी और हमारा अगला पड़ाव था रोज गार्डन जहाँ 30 रुपये का टिकट लेकर प्रवेश होता है । हम भी भीतर गए । एक से एक बेहतरीन फूलों के पौधे फूलों सहित मानो हमारा स्वागत कर रहे हों । बाहर से यह गार्डन सड़क से लगा एक नर्सरी जैसा दिखता है लेकिन भीतर जाने पर सीढ़ी नुमा फूलों भरा बगीचा और दूर तक फैले पहाड़ । वहां तरह-तरह के पोज देकर लोग फोटो खिंचवा रहे थे तो हम भी पीछे नहीं रहे और हनीमून कपल की तरह कुछ तस्वीरे खिंचा ही लीं । वहां के रेस्टोरेंट में पैटीज खाईं, कॉफ़ी पी और निकल पड़े अगली जगह देखने । वैसे भी दोपहर बीत रही थी और शाम को ही हमारी वापसी की बस थी तो जल्दी ही हमें एक-दो और जगहों तक घूम कर होटल जाना था और वहां से बस स्टैंड भी ।
अगली कुछ जगहों को हमने बस कार रोक कर दूर से ही देखा जिनमें कुछ शूटिंग पॉइंट थे जहाँ कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों की शूटिंग हुई, ऐसा ड्राईवर ने बताया । मुन्नार में एक और महत्वपूर्ण जगह जहाँ हम नहीं जा पाए वो है “एराविकुल्म राष्ट्रीय उद्यान” जहाँ जाने से पहले अच्छा-खासा नाश्ता करके जाएँ और साथ में लंच पैक लेकर भी जाएँ । यह पार्क सुबह 7:30 से शाम 4 बजे तक खुला रहता है । सीजन में यहाँ टिकट के लिए लम्बी लाइन लगती है हालाँकि अब ऑनलाइन टिकट भी मिलने लगे हैं । यहाँ घूमने के लिए आपका शारीरिक रूप से फिट होना जरूरी है क्योंकि यहाँ अनाइमुड़ी चोटी पर भी चढ़ना होता है जो पश्चिमी घाट की सबसे ऊंची चोटी है । हमने ये सारी जानकारी अपने कार ड्राइवर से ली ।
होटल लौटते हुए हम शहर के बीच स्थित कारमेल चर्च भी गए जो यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थल में से एक है । यहाँ की कांच की रंगबिरंगी कारीगरी और अद्भुत शांति निश्चय ही हमारी तरह आपको भी बहुत पसंद आएगी । शाम हो चली थी, होटल पहुँच कर चेकआउट किया और उसी कार वाले से हमें बस स्टॉप तक छोड़ने को कहा, लेकिन रास्ते में कहीं भोजन कराकर ।
जिस जगह वो हमें भोजन के लिए लेकर गया वो कोई रेस्टोरेंट नहीं बल्कि केरल का स्थानीय भोजनालय था जहाँ के डोसे और इडली के साथ अनियन उत्तपम का स्वाद आज भी होठों पर जीभ फेरने पर मजबूर करता है । भोजन पारंपरिक केले के पत्ते पर परोसा गया था और खाने के बाद पत्तलों को मोड़ने के ढंग का भी अर्थ हमें वहीँ पता चला यानि अगर आपने पत्तल अपनी ओर मोड़ी मतलब भोजन अच्छा लगा और अगर बाहर की ओर मोड़ी तो अच्छा नहीं लगा । ज्यादातर यहाँ दक्षिण भारतीय भोजन ही मिलता है लेकिन मांसाहारियों के लिए मछली और मीट भी मिल जाता है और मीठे में स्वादिष्ट केक और बेक्ड पकवान । कॉफ़ी के तो क्या कहने, चलते-फिरते हर जगह उपलब्ध ।
भोजन से तृप्त होकर हम स्टेशन पहुंचे तो सेमी स्लीपर बस तैयार थी जो अगले दिन भोर में ५ बजे हमें शांतिनगर बंगलुरु पहुँचाने वाली थी । इतने सुन्दर प्रदेश को देखने की तृप्ति के साथ हम अपने बंगलूरु के ठिकाने को लौट चले यह सोचते हुए कि सचमुच भ्रमण हमें शारीरिक, मानसिक ही नहीं आत्मिक संतुष्टि देकर कितना समृद्ध करता है । तो चलिए अब चलें घर ……….।

[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.