वो जो हममें तुममें क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो…

बेगम अख्तर के जीवन के संघर्ष की दास्तान भी उतनी ही दर्द में डूबी हुई है जितनी उनकी आवाज। उनकी जिंदगी के कई ऐसे स्याह पक्ष हैं जिनको याद करना बेगम अख्तर के लिए बहुत ही दर्दनाक रहा होगा लेकिन वो मनहूस साये उनका पीछा नहीं छोड़ते थे ।
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 7 अक्टूबर 1914 को जनमी बेगम अख्तर के बचपन का नाम बिब्बी था। वो #फैजाबाद के शादीशुदा वकील असगर हुसैन और तवायफ मुश्तरीबाई की बेटी थीं। मुश्तरीबाई को जुड़वा बेटियां पैदा हुई थीं। चार साल की उम्र में दोनों बहनों ने जहरीली मिठाई खा ली थी। इसमें बिब्बी तो बच गईं लेकिन उनकी बहन का देहांत हो गया था। असगर ने भी मुश्तरी और बेटी बिब्बी को छोड़ दिया था जिसके बाद दोनों को खुद ही जिंदगी में संघर्ष किया। बिब्बी का पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता था। एक बार शरारत में उन्होंने अपने मास्टरजी की चोटी काट दी थी। मामूली पढ़ाई के बावजूद उन्होंने उर्दू शायरी की अच्छी जानकारी हासिल कर ली थी। सात साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था। उन्होंने कई उस्तादों से संगीत की शिक्षा ली। 13 साल की उम्र में बिब्बी को अख्तरी बाई के नाम से जाना जाने लगा था।
बिहार के एक राजा ने किया दुष्कर्म
उसी समय बिहार के एक राजा ने कद्रदान बनने के बहाने उनसे दुष्कर्म किया। इस हादसे के बाद अख्तरी गर्भवती हो गईं और उन्होंने छोटी सी उम्र में बेटी सन्नो उर्फ शमीमा को जन्म दिया। दुनिया के डर से इस बेटी को अपनी छोटी बहन बताया करती थीं। बाद में दुनिया को पता चला कि यह उनकी बहन नहीं बल्कि बेटी है।
संगीत की शिक्षा
बेगम अख्तर ने पटना में महान सारंगी वादक #उस्ताद_इम्दाद_खान और बाद में पटियाला के अता मोहम्मद खान से प्रशिक्षण लिया । इसके बाद मां के साथ कलकत्ता की यात्रा की और लाहौर के मोहम्मद खान, अब्दुल वाहीद खान जैसे शास्त्रीय दिग्गजों से संगीत सीखा, और आखिरकार वह उस्ताद झान् खान के शिष्य बन गयी। 15 साल की उम्र में अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम से पहली बार मंच पर उतरीं। यह कार्यक्रम बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए कोलकाता में हुआ था। कार्यक्रम में भारत कोकिला सरोजनी नायडू भी मौजूद थीं। वे अख्तरी बाई के गायन से बहुत प्रभावित हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया।
अकेलेपन से डर और चेनस्मोकिंग
अख्तरी बाई अकेलेपन से बहुत घबराती थीं। वो अपने होटल के कमरे में अकेले जाने से डरती थीं। क्योंकि अकेले में उन्हें पुरानी यादें घेर लेती थीं। उन्होंने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए शराब और सिगरेट पीना शुरू कर दिया। यहां तक की वो एक चेन स्मोकर बन गईं। सिगरेट के कारण ही बेगम अख्तर ने ‘पाकीज़ा’ फिल्म छह बार देखी थी। दरअसल, सिगरेट पीने के लिए उन्हें सिनेमाहॉल से बाहर जाना पड़ता था और वापस लौटने तक फिल्म आगे बढ़ चुकी होती थी। इस पर वो दोबारा फिल्म देखने जातीं और इस प्रकार पूरी फिल्म छह बार में देख सकीं।
फिल्मों का सफर
बेगम अख्तर ने फिल्मी करियर की शुरुआत एक दिन का बादशाह में अभिनय से की थी लेकिन दुर्भाग्य से उनकी यह फिल्म नहीं चल सकी। इसके कुछ समय बाद वो लखनऊ लौट आईं। वहां पर उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक महबूब खान से हुई। वे बेगम अख्तर की प्रतिभा से काफी प्रभावित थे महबूब खान ने मुंबई बुलाया। अबकी बार मुंबई जाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिल्मों के साथ साथ है स्टेज पर अपने गायकी का जलवा दिखातीं रहीं और मल्लिका-ए-गजल के नाम से पहचानी जाने लगी।
बेग़म अख्तर गजल, ठुमरी और दादरा गायन शैली की बेहद लोकप्रिय गायिका थीं। उन्होंने ‘वो जो हममें तुममें क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो’, ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’, ‘मेरे हमनफस, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दवा न दे’, जैसी कई दिल को छू लेने वाली गजलें गायीं हैं।
पति ने गाना छुड़ाया
अख्तरी बाई गायन के साथ अभिनय भी करती थीं। 1939 में उन्होंने फिल्म जगत से नाता तोड़ा और लखनऊ आकर रहने लगीं। यहां आकर उन्हें उनका प्यार मिला। 1945 में उन्होंने परिवार के खिलाफ जाकर बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से शादी कर ली। तभी से उनका नाम बेगम अख्तर पड़ गया। पति के कहने पर उन्होंने गाना छोड़ दिया था। गाना छोड़कर शायद बेगम अख्तर ने अपनी जान को छोड़ दिया था, इसीलिए वो बीमार रहने लगीं। सिगरेट बहुत पीती थीं इसलिए उन्हें फेफड़े की बीमारी के साथ डिप्रेशन की समस्या हो गई।
ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ से दोबारा गान् शुरू किया
संतान ना पैदा होने के कारण वो बहुत दुखी रहने लगी थीं। तब डॉक्टरों ने कहा कि गाने से उनकी बीमारी ठीक हो सकती है। तब पति की रजामंदी के बाद 1949 में वे ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ से जुड़कर गायन की दुनिया में वापस आ गईं।
हज को गईं पैसे खत्म हुए, गाकर जमा किए रुपये
एक बार बेगम अख्तर एक संगीत सभा में भाग लेने मुंबई गईं। वहीं उन्होंने अचानक तय किया कि वो हज करने मक्का जाएंगी। जब तक वो मदीना पहुंची, उनके सारे पैसे खत्म हो चुके थे। उन्होंने जमीन पर बैठकर नात पढ़ना शुरू कर दिया। लोगों की भीड़ लग गई और इस तरह उन्होंने पैसे जमा किए। हज से आने के बाद दो साल तक बेगम अख्तर ने शराब को हाथ नहीं लगाया, मगर धीरे-धीरे फिर से पीना शुरू कर दिया।
स्टेज प्रोग्राम में तबीयत बिगड़ी, निधन
30 अक्टूबर 1974 को बेगम अख्तर अहमदाबाद में मंच पर गा रही थीं। तबीयत खराब थी, अच्छा नहीं गाया जा रहा था। ज्यादा बेहतर की चाह में उन्होंने खुद पर इतना जोर डाला कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा, जहां से वे वापस नहीं लौटीं। हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। लखनऊ के बसंत बाग में उन्हें सुपुर्दे-खाक किया गया। उनकी मां मुश्तरी बाई की कब्र भी उनके बगल में ही थी।
फिल्मों में गायन
मुमताज बेगम (1 9 34), जवानी का नशा (1 9 35),
एक दिन के लिए राजा (1 9 33, निर्देशक: राज हंस)
अमीना (1 9 34), रूप कुमारी (1 9 34), नसीब का चक्कर (1 9 36), अनार बाला (1 9 40, निर्देशक: ए एम खान), रोटी (1 9 42), जलसागर (1 9 58, निर्देशक: सत्यजीत रे)।
पुरस्कार –
1968 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री
1975 में मरणोपरांत पद्म भूषण
1972 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

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