यात्रा-वृत्तांत/ समुद्र तटों का वैभवः गोवा

Bharti Pathak
गोवा अपने मनमोहक समुद्र तटों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है । चमकती रेत, आसमान छूते नारियल के पेड़, ऊँची-ऊँची समुद्री लहरें और सी फ़ूड ..बस गोवा का नाम लेते ही आँखों मे ये सब घूम जाते।
हालांकि गर्मी में गोवा जाना कोई बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं है लेकिन जिसे घूमने की धुन उसे क्या जाड़ा क्या गर्मी । वैसे लोगों का सामान्य विचार होता है कि पर्यटन स्थलों के खास सीजन में ही कहीं जाना चाहिए लेकिन इसके उलट मुझे लगता है कि घूमने का असली मज़ा बिना सीजन के कहीं जाने में है क्योंकि कम भीड-भाड में जगहों को ज्यादा अच्छी तरह देखा जा सकता है ।
पुणे पहुँच कर एक दिन तो सफ़र की थकान उतारने और गप्पें मारने में बिताया । अगले दिन शाम चार बजे की ट्रेन थी पुणे से मडगांव के लिए, तो तीन दिन गोवा में बिताने के हिसाब से पैकिंग की । बच्चों ने अपने स्विमिंग कास्टयूम रखे, वैसे भी वे गोवा घूमने से ज्यादा होटल के स्विमिंग पूल में स्विमिंग करने को लेकर उत्सुक थे कि घर की तरह उनकी स्विमिंग में कोई बाधा नहीं होगी । अगले दिन ओला बुक करके समय से दो घंटे पहले स्टेशन के लिए निकल पड़े ।
अगले दिन सुबह 7 बजे ट्रेन मडगांव पहुंची तो वहीँ रह रही भांजी रागिनी अपने पति के साथ हमें लेने स्टेशन पर मौजूद थी । हमारी टीम में बच्चों और बड़ों समेत कुल 11 लोग थे। उनके घर पहुँच कर हम सब नहा-धोकर तैयार हुए, नाश्ता किया और होटल पता किया जो कि नार्थ गोवा में था और मडगांव से करीब 50 किलोमीटर दूर । नाश्ता करके हमने एक बड़ी गाड़ी रिज़र्व की और नार्थ गोवा के लिए निकल पड़े ।
गोवा के दो जिले हैं मार्गो और पणजी जिन्हें क्रमशः दक्षिण गोवा जो कि पुराना गोवा भी कहा जाता है और उत्तरी गोवा जो नया गोवा के नाम से प्रचलित है ।  प्राकृतिक सौंदर्य प्रेमियों के लिए दक्षिण गोवा स्वर्ग है लेकिन युवा पीढ़ी को लुभाने वाली चीजें उत्तरी गोवा में ज्यादा उपलब्ध हैं ।
1498 में वास्को डी गामा पहला यूरोपीय था जो समुद्र के रास्ते यहाँ पहुंचा क्योंकि तुर्कों द्वारा पारंपरिक स्थल रास्तों को बंद कर दिया गया था । अन्य यूरोपीय शक्तियां भी उसके अभियान से प्रभावित होकर भारत आने के लिए मार्ग तलाशने लगीं । 1510 में पुर्तगाली सेना ने यहाँ के राजा को पराजित कर कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और सोलहवीं सदी के मध्य तक पुर्तगालियों ने आज के गोवा क्षेत्र में पूरी तरह अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी । प्राचीन कहानी की माने तो कहते हैं कि गोवा की रचना भगवान् परशुराम ने की थी । उन्होंने अपने कुल्हाड़े से समुद्र को कई योजन पीछे धकेल दिया था ।  उत्तरी गोवा में ही स्थित भूरे रंग के पहाड़ को परशुराम का हवन स्थल कहा जाता है । ऐतिहासिक दृष्टि से गोवा के बारे में सबसे पहले महाभारत में लिखा गया था । उस समय गोवा का नाम “गोपराष्ट्र” यानि “गाय चराने वाले का देश” हुआ करता था । माना जाता है कि गोवा उसी “गोपराष्ट्र” का अपभ्रंश है । 19 दिसम्बर 1961 को भारतीय सेना ने यहाँ आक्रमण कर इस क्षेत्र को मुक्त कराया और गोवा भारत में शामिल हुआ । इसके उप क्षेत्र दमन और दीव को भारत में संविधान के एक संघीय क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया लेकिन 30 मई 1987 को गोवा 56वां संशोधन के तहत इसे अलग राज्य का दर्जा दिया गया और गोवा भारत का 25वां राज्य बना । क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे छोटा और जनसँख्या के हिसाब से चौथा सबसे छोटा राज्य है । यह अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और बेहतरीन समुद्री किनारों के लिए विश्वविख्यात है । यहाँ छोटे बड़े लगभग 40 बीच हैं जिसे देखने बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ आते रहते हैं ।
प्राकृतिक सौंदर्य से लदे-फदे रास्तों से चलते करीब डेढ़ घंटे में हम होटल पहुँच गए । शहरी चकाचौंध से दूर तमाम पेड़ों से घिरा होटल बाहर से बिलकुल किसी कॉलोनी के घर जैसा लग रहा था लेकिन भीतर से काफी शानदार । कमरे में ही खाना आर्डर किया और फिर आराम । शाम को आसपास घूमने की योजना बनी । थोड़ी ही दूरी पर चौराहा था जहाँ घूमने के लिए किराए पर स्कूटी उपलब्ध थी । वैसे तो कार या बड़ी गाडी भी रिज़र्व करके घूमने का भी विकल्प है लेकिन गोवा में घूमने का असली मज़ा तो स्कूटी या बाइक से ही है सोच कर हमने चार स्कूटी 350 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से किराए पर ली ।
स्कूटी लेकर हम सबसे पहले बागा बीच पहुंचे जो होटल से कुछ 3 किलोमीटर की दूरी पर था । बागा बीच गोवा के सर्वाधिक लोकप्रिय बीचों में से एक है । अरब सागर में बहने वाली बागा क्रीग के नाम पर इसका नाम बागा रखा गया है । काफी लम्बे चौड़े इस समुद्री तट पर वाटर स्पोर्ट्स भी हो रहे थे । समुद्री खाना, पीना और नाच गाने के इंतज़ाम वाले तरह तरह के आकर्षक प्रचार करते बीच साइड रेस्टोरेंट भी काफी संख्या में थे । बच्चे पानी की तरफ गए तो पूरी तरह भीग कर आये और मुझे उनके लिए कपडे खरीदने जाना पड़ा । यहाँ के स्ट्रीट साइड बाज़ार काफी दूर तक फैले हैं जहाँ तरह-तरह के कपडे जूते, चप्पलें, खिलौने और स्विमिंग से सम्बंधित सामान खरीदा जा सकता है । ये सामान इतने आकर्षक हैं कि आपका पर्स खाली हो जाये लेकिन मन न भरे ।
समुद्र के किनारे लहरों में डूबते हुए सूरज को देखना सचमुच अनोखा अनुभव होता है जब इतनी शांति होती है कि लहरों की आवाज से अलग कुछ भी सुनाई नहीं देता और सब उसकी सुन्दरता में डूब जाते है । हम भी अँधेरा होने पर वहां से निकले । होटल से थोड़ी दूर पर एक शाकाहारी भोजनालय मिल गया जहाँ हमने भोजन किया और होटल वापस आये ।
चिड़ियों की चहचहाहट से सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी । अभी सब सो ही रहे थे और मेरे सिवा चाय का खास शौक़ीन कोई नहीं था तो बिना किसी को जगाये नहा-धोकर मैंने स्कूटी उठाई और निकल पड़ी गोवा की सुबह देखने । सुबह के 6:30 बजे थे और ज्यादा चहल-पहल नहीं थी सडकों पर, वैसे भी गोवा का दिन नहीं, रात देखने वाली होती है । कई किलोमीटर चलने पर एक रोड साइड दुकान दिखी जहाँ गर्मागर्म चाय उपलब्ध थी । चाय पीकर फिर आगे बढ़ी तो रुकने की इच्छा नही हो रही थी । सड़क के दोनों तरफ हरे भरे पेड़ और नीचे लाल मिटटी दूर दूर दिखते जंगल रोमांच सा अनुभव करा रहे थे तो बिना रुके काफी दूर तक चलती चली गयी । प्रकृति के मोह में बंधी जाने कितनी दूर पहुँच गयी तभी मोबाइल की घंटी से ध्यान भंग हुआ। पतिदेव का फ़ोन था ।
कलंगेट बीच
सुबह बच्चों को बागा फिर से ले जाने का वादा था । वे अपने कपड़े साथ लेकर बीच जाने के लिए निकले। सुबह भीड़ कम थी और मौसम बहुत सुहावना तो बच्चों ने खूब मजे किये, रेत पर घरौंदे बनाये, सीपियाँ इकट्ठी की और लहरों के साथ जम कर खेले । वहां से लौट कर आते ही सब होटल के पूल में कूद पड़े । दिन के 11 बज गए थे लेकिन धूप ऐसी जैसे दोपहर हो गयी हो । होटल में ही मंगा कर खाना खाया और बिना आराम किये “कलंगेट बीच” देखने निकल पड़े । बीच पर पहुँच कर दिखी कलंगेट रेजीडेंसी । यह होटल गोवा टूरिस्म कारपोरेशन की संपत्ति है जहाँ रुकने की ठीक-ठाक व्यवस्था है । बीच स्ट्रीट काफी लम्बी दूरी में थी और दोपहर के बावजूद बहुत भीडभाड़ थी वहां । तरह तरह के स्विमिंग के कपड़े, समुद्री सीपियाँ, शंख, रेनकोट, रंग बिरंगे छाते और भी बहुत कुछ आकर्षक चीजों की दुकानें और उनपर उतनी ही आकर्षक भीड़ ।
ये काफी व्यवस्थित सा बीच है जो पर्यटकों की संख्या को ध्यान में रख कर सभी सुविधाओं से युक्त था ।  बीच की सुनहरे रंग की रेत की वजह से इसे “गोल्डन बीच” भी कहते हैं । तमाम तरह के वाटर स्पोर्ट्स हो रहे थे जिन्हें देखना मजेदार था । हमने भी थोड़ी देर लहरों के साथ-साथ जीवन का लुत्फ़ लेते लोगों का शोर सुना, घूमे और फिर वहां से बाहर आये और वागाटर बीच के लिए निकल पड़े ।
कलंगेट से वागाटर बीच की दूरी करीब 9 किलोमीटर की है और रास्ता बेहद खूबसूरत । भीडभाड़ से अलग हरे-भरे पेड़ों और इक्का-दुक्का घरों के बीच से निकलते हम वागाटर बीच पहुंचे । यह बाकी समुद्री तटों की अपेक्षा कम भीड़ वाली जगह है । इसमें सफ़ेद रेत, काली लावा चट्टानें, नारियल और खजूर के पेड़ों की सीधी कतारें हैं और हाँ बहुत सारे केकड़े भी । व्यक्तिगत रूप में मुझे ये बीच सबसे अधिक अच्छा लगा जिसकी वजह थी वहां बिखरी शांति । भीड-भाड़ से दूर बच्चों को भी ये जगह कुछ ज्यादा ही पसंद आई वे देर तक वहां खेलते रहे ।
वहां से चल कर हम अंजुना बीच गए जो वागाटर से साढ़े चार किलोमीटर दूर है । यह बीच अपनी अलग ही विशेषता के लिए पहचाना जाता है । नारियल के पेड़ों से घिरे और लाल रेत वाले इस तट को खासकर “हिप्पियों का बीच” कहा जाता है । यह तट युवाओं के बीच ख़ासा लोकप्रिय है । बताते हैं कि चांदनी रातों में यहाँ हिप्पियों की पार्टियाँ होती हैं जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक यहाँ आते हैं । हिप्पी तो इक्का-दुक्का दिखे लेकिन साहसिक खेल जैसे बंजी जम्पिंग, पैराग्लाइडिंग और विंड सर्फिंग करते लोगों को वहां देखना काफी रोमांचकारी अनुभव रहा । तभी फोन आया कि हमारे बाकी साथी भी घूमने निकल रहे हैं और “चपोरा फोर्ट” पर मिलना है ।
चपोरा वहां से दूर नहीं था तो हम निकले चपोरा के लिए । मोबाइल पर लोकेशन की सुविधा के चलते रास्ता भटकने का डर नहीं था सो थोड़ी ही देर में हम चपोरा फोर्ट पहुँच गए । चपोरा फोर्ट का निर्माण पुर्तगालियों ने हिन्दू आक्रमणों से अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सन 1617 में किया था । इसी किले के साथ निर्मित अर्गुदा का किला आक्रमण में नष्ट हो गया लेकिन इसके खँडहर भी इसकी कहानी बताते हैं । ‘दिल चाहता है’ मूवी के एक सीन में इस किले का भी दृश्य है । तब से भी यह किला लोगों की नज़रों में ज्यादा आ गया । खासकर युवाओं में इसे लेकर भारी क्रेज़ दिखता है ।
सामान्य आकार से काफी बड़ी लाल ईटों से बनी सीढियों से चढ़कर ऊपर जाना काफी मेहनत और स्टेमिना मांगता है । ऊपर खँडहर और उबड़-खाबड़ जमीन के अलावा जो सबसे आकर्षक बात है ऊपर से दिखता नीचे दूर दूर तक फैला समंदर । वहां से वागाटर बीच का खूबसूरत नज़ारा देखना भी काफी सुखद लगता है ।
सारा दिन घूमने से हुई थकान उतारने का इससे बेहतर उपाय क्या कि थोड़ी देर स्विमिंग पूल में बिताया जाये तो होटल पहुँच कर कपडे बदले और काफी समय पूल में ही बिताया । रात के खाने के समय तक सब आ चुके थे । तय हुआ कि खाना बाहर खायेंगे तो निकल पड़े किसी अच्छे रेस्टोरेंट की तलाश में । सब तो खाने के चक्कर में थे और मेरा मन “फेनी” में अटका था । आखिर गोवा आये और यहाँ की फेनी का स्वाद नही लिया तो क्या फायदा ।  फेनी लोकल शराब को कहते हैं जो सिर्फ गोवा में ही बनाई जाती है । यह दो तरह की होती है एक नारियल से बनी और दूसरी काजू से ।दिनभर की थकान की वजह से अच्छी नींद आई ।
सुबह उठकर फिर से सब बागा गए और सुबह की सैर का मज़ा लिया । थोड़ी शापिंग भी की । करीब 9 बजे हमने होटल छोड़ा और सामान सहित पणजी के लिए निकले जहाँ से शाम 6 बजे पुणे के लिए हमारी बस थी यानि आज का सारा दिन पणजी घूमने के लिए था । होटल वाले ने बताया गाडी रिज़र्व करने से अच्छा बस से जाना है, कम खर्चीला और सुविधाजनक भी रहेगा तो हमने गोवा ट्रांसपोर्ट की बस पकड़ी और पणजी के लिए निकल पड़े । दूरी कुल 18 किलोमीटर तो आधे घंटे में ही हम पणजी पहुँच गए । बस पणजी बस स्टैंड पहुंची तो वहीँ के लॉक रूम में हमने सामान जमा किया और लोकल बस पकड़ कर निकल पड़े घूमने । पणजी मंडोवी नदी के तट पर स्थित है और गोवा की राजधानी भी है । यह मडगांव और वास्को डी गामा के बाद गोवा का तीसरा सबसे बड़ा शहर है । पणजी का अर्थ है “ बाढ़ कभी नहीं” । यहाँ घूमते हुए मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया लाल फूलों से लदे गुलमोहर ने जो सडकों पर बहुत ही व्यवस्थित तरीके से लगाया गया है ।
सुन्दर लाल छतों वाली इमारतें, साफ़ सुथरे चर्च, खूबसूरत विला देखते हुए हम पहुंचे “मिरामार बीच” जिसका पुर्तगाली अर्थ है “समुद्र को निहारना” । सड़क से उतर कर थोड़ी दूर पैदल चलकर जाना पड़ा । रास्ता कम घने जंगल से होकर था और पहुंचे तो अरब सागर का खूबसूरत नज़ारा सामने था । ये वो जगह है जहाँ मंडोवी नदी अरब सागर में मिलती है । चांदी की तरह चमकती रेत पर शाम को टहलने वालों की काफी भीड़ रहती है । आस पास काफी अच्छे होटल भी हैं जहां रुक कर इन बीचों पर शाम को टहलने का मज़ा लिया जा सकता है । यहाँ आने का सबसे अच्छा समय नवम्बर से मार्च है जब बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं ।
अगुआड़ा का किला
यहाँ पास ही ‘डोना पाउला’ और ‘अगुआड़ा का किला’ भी है जो गोवा के खास दर्शनीय स्थलों में से है । वहां से टैक्सी लेकर हम पहुंचे डोना पाउला जो कि वहां से 3 किलोमीटर है । डोना पाउला की भी कहानी है जिसके अनुसार पुर्तगाली शासन में गोवा के वायसराय की बेटी डोना को किसी मछुआरे से प्रेम हो गया । उससे विवाह की इजाजत न मिलने पर डोना ने एक चट्टान से कूद कर ख़ुदकुशी कर ली । बीच पर बनी उसी चट्टान को लवर्स पैराडाइस कहा जाता है । डोना के ही नाम पर इस बीच का नाम भी रख दिया गया । दोपहर की वजह से भीड़ उतनी ज्यादा तो नहीं थी फिर भी पानी के साहसिक खेलों के शौक़ीन यहाँ वहां थे ही । समय कम था और वहां से अगुआदा फोर्ट की दूरी काफी थी तो वहीँ से हम वापस हो लिए ।
अगुआदा का किला पुर्तगाली संस्कृति का परिचय देता किला है जो मंडोवी नदी के किनारे ही है । अगुआ का पुर्तगाली में अर्थ है “पानी”, चूंकि ये पानी के पास बना इसलिए ये अगुआदा कहा जाने लगा । कहते है किले में वास्तुकला के बेहतरीन नमूने देखे जा सकते है, जिसे हम इस बार समय कम होने की वजह से नहीं देख पाए । वैसे भी इस बार ये किला ही नहीं कसीनो में जाना भी बड़े ग्रुप की वजह से नहीं हो पाया जिसे अगली बार के लिए छोड़ दिया । टैक्सी की और बस स्टैंड पहुंचे । थोड़ा समय वहीँ घूमते हुए बिताया । बस सही समय पर थी तो अपनी अपनी सीट ली और निकल पड़े खट्टी मीठी यादों के साथ अपने घोसले की ओर ।

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