पुस्तक चर्चा/ मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास “चाक”

भारती पाठक
सबमें सच को ज्यों का त्यों कहने की हिम्मत नहीं होती और उससे भी कहीं अधिक सच सुनने की । लेकिन मैत्रेयी पुष्पा एक ऐसी लेखिका हैं जिनमें सच को देखने की भी हिम्मत है और उसे बिना लाग-लपेट कहने की भी । एक स्त्री होकर उन्होंने ग्रामीण जीवन के उस जघन्य पहलू को दुनिया के सामने उद्घाटित किया जहां अच्छे अच्छे जाने से घबराते हैं ।
अपने निर्भीक लेखन और बेबाक बयानों के लिए वे अक्सर चर्चाओं में भी रहती हैं । इस पुरुष प्रधान देश और समाज में तमाम अन्य कार्यों के साथ ही लेखन का कार्य भी स्त्रियों के लिए वरेण्य नहीं माना जाता । इस मानसिकता का विरोध कर मैत्रेयी जी ने अकेले दम पर सबसे लोहा लेते हुए न केवल उन अनछुए पहलुओं को उठाया है बल्कि हवा के विपरीत जाकर साहित्य जगत में अपनी शीर्ष उपस्थिति दर्ज करायी है ।
३० नवम्बर १९४४ को अलीगढ के सिकुर्रा गाँव में जन्मी मैत्रेयी जी का बचपन बड़ी विपन्नता में गुजरा । इस कटु यथार्थ को भुगतते और महसूसते मन की झलक उनके साहित्य में उभर कर आती हैं । उन्होंने जो कुछ भी लिखा वो मात्र कल्पना नहीं बल्कि वास्तविकता के ठोस धरातल से उपजा हुआ सत्य है जिसे वही समझ सकता है जो अपनी जड़ों से जुडा हो और उसके सुख दुःख को भोगा हो । साथ ही जिसमें समाज के कुरूप सत्य को भी स्वीकारने का उतना ही साहस हो जितना सुन्दरता को ।
हिन्दी साहित्य से एम ए मैत्रेयी जी के साहित्य में स्त्री विमर्श की गहरी छाप है । संभवतः हिंदी की इकलौती लेखिका जिन्होंने ग्रामीण परिवेश को ही अपनी कथाओं का आधार बनाया और वो भी किसी रूमानी सन्दर्भ में नहीं बल्कि सामंतवादी व्यवस्था का गाँव जहाँ आज भी स्त्रियों को सबसे निचले पायदान पर रखा जाता है । उनका मानना है कि “गाँव की औरत ज्यादा मजबूत होती हैं क्योंकि वे तमाम दिक्कतों के बीच जीने का तरीका निकाल लेती हैं ।”
इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं चिन्हार, गोमा हंसती है, ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चक, त्रिया हठ, गुनाह बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); गुडिया भीतर गुडिया ( आत्मकथा ),कस्तूरी कुंडली बसै; खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज) आदि । इन्हें हिंदी अकादमी का साहित्यकार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का महात्मा गाँधी सम्मान, प्रेमचंद सम्मान सहित अनेक विशिष्ट सम्मान दिए गए हैं । वे दिल्ली की हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष भी रह चुकी हैं ।
आज हम इनके बहुचर्चित उपन्यास “चाक” की चर्चा करेंगे जिसमें अतरपुर गाँव के पुरुषों के सामंतवादी व्यवहार के बीच स्त्रियों द्वारा अपने अस्तित्व को संजोने और उनकी मुखर हिस्सेदारी की जीती जागती कहानी है । सदियों से ग्रामीण औरतों के अनपढ़ और असभ्य होने की मान्यता को चुनौती देते आज की औरतों के तेवर इस उपन्यास में हर जगह दिखाई देते है ।
कहानी शुरू होती है जब रेशम के पति के देहांत के छह माह बाद घर वालों को पता चलता है कि वह गर्भवती है । परिवार वालों के तमाम समझाने के बावजूद न तो वह बच्चे के पिता का नाम बताती है न ही गर्भ गिराने को तैयार होती है । यहाँ तक कि अपने जेठ से विवाह के लिए भी तैयार न होकर वह अपने दम पर बच्चे को जन्म देना और पालना चाहती है । अचानक एक दुर्घटना होती है और रेशम की मौत हो जाती है । रेशम की ममेरी बहन सारंग भी उसी गाँव में ब्याही है और उसकी रेशम से अन्तरंग मित्रता थी । सारंग ही नहीं सारा गाँव जानता है कि यह दुर्घटना नहीं हत्या है यहाँ तक कि जिस महिला ने ये घटना अपनी आँखों देखी वह भी मुकर जाती है और अपराधी सिर उठाकर पूरे गाँव में शान से घूमता है ।
ऐसी घटनाओं के लिए अतरपुर तो बस एक नाम है । गाँवों में ये दुर्घटनाएं आम हैं जो विशेषकर उन्हीं औरतों के साथ घटित होती हैं जो गाँव समाज के अलिखित कानूनों को मानने से मना कर देती हैं । “इस गाँव के इतिहास में दर्ज दास्तानें बोलती हैं – रस्सी के फंदे पर झूलती रुकमणी, कुएं में कूदने वाली रामदेई, करबन नदी में समाधिस्थ नारायणी ….. ये बेबस औरतें सीता मैया की तरह भूमि प्रवेश कर अपने शील सतीत्व की खातिर कुर्बान हो गयीं । ये ही नहीं न जाने कितनी……. बूढी खेरापतिन जिसका जीवन गाँव की पुरोहिताई करते बीता है, इसी तरह की कथाएं सुनाती हैं ।”
अतरपुर जाट किसानों का गाँव है और जैसा है वैसा ही बने रहना चाहता है । वह हर बदलाव का विरोधी है । यथास्थिति में जब जब परिवर्तन होता है तब कुछ मूल्य और विश्वास टूटते हैं । हर विकास परम्परागत मान्यता को बदलता और तोड़ता है । “ इतिहास कागज़ के पन्नों पर उतरने से पहले मानव शरीरों पर लिखा जाता है ।”
रेशम की हत्या से आहत सारंग आवाज उठाती है तो परत दर परत ऐसे खौफनाक चेहरे और कारनामे सामने आते हैं जो गाँव के लोगों की सीधी सादी छवि से मुखौटा उतार फेंकते हैं । सारंग का उच्च शिक्षित पति रंजीत, जो गाँव की भलाई के बारे में सोचता है और शहर में नौकरी न करके गाँव की उन्नति के लिए काम करना चाहता है, सारंग का साथ तो देता है लेकिन धीरे धीरे गाँव की राजनीति के दलदल में उसके गाँव की भलाई करने के सपने टूटने लगते हैं और वह भी उसी रंग में रंग जाता है ।
विधवा रेशम को मारने वाला डोरिया सारंग का दुश्मन बन जाता है । वह उसके बेटे चन्दन को भी जान से मारने की धमकी देता है जिससे आतंकित रंजीत कहता है कि “सारंग, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ, अब तो हमें माफ़ कर दो । मैं कायर हूँ, डरपोक हूँ, हिम्मत वाला हूँ, या लड़ाकू हूँ ? मुझे कुछ याद नहीं । मेरे बच्चे पर रहम खाओ – सारंग अपनी बहन पर चन्दन को न्योछावर मत करो ।”
चन्दन को उसके चाचा के पास शहर भेज दिया जाता है । ममतामयी, भावुक सारंग पुत्र वियोग में घुलने लगती है । वह रात दिन डोरिया से बदला लेने के बारे में सोचती रहती है जिसने उसे उसके पुत्र से अलग कर दिया । रंजीत भी कुछ न कर पाने की वजह से चिड़चिड़ा हो जाता है । बेटे की दूरी से दुखी सारंग स्कूल में आये नए मास्टर के विचारों से प्रभावित हो उसके करीब जाने लगती है तो गाँव के लोग तरह-तरह की बातें फैलाना शुरू कर देते हैं । बिना सारंग का पक्ष जाने और उसके शोक संतप्त ह्रदय को शांति देने की जगह रंजीत भी उसे ही दोषी मान लेता है । दोनों के बीच की ये मानसिक दूरी सारंग को श्रीधर के और करीब ले जाती है । गाँव के प्रधान के बहकावे में आकर रंजीत श्रीधर पर हाथ उठा देता है ।
कई बार सारंग भी पति को कष्ट में देख अपने संघर्ष पथ से विचलित हो सोचती है कि “मैं दूसरी औरतों की तरह क्यों नहीं रहती ? मैं जो कर रही हूँ गाँव में और कोई क्यों नहीं कर रही ? जो बातें गलत हैं उनको औरतें गलत भी मानती हैं, पर मर्दों की दुनिया में दखल नहीं देतीं । मैं घूंघा सिराना भूलकर अखाड़े पर कान आँखे टाँगे रही । लोक रीति भूल जाना…. खता नहीं क्या ?”
बुरी तरह घायल श्रीधर की सेवा करती आनंदमग्न सारंग कहती है, “श्रीधर, अगर तुम्हारी आँखें इस देह को देख कर आनंद पाती हैं तो जी भर कर देखो मुझे, मेरी सुन्दरता सार्थक हुई । भोग करने से तुम्हारे प्राण तृप्त होते हों तो आओ रात बाकी है अभी ।”
लेखिका का एक इंटरव्यू सुना था मैंने जिसमें इसी संवाद का जिक्र करते हुए उनका कहना था कि सारंग का भाव श्रीधर को देह सुख देना या पाना नहीं बल्कि उसे मृत्यु समान पीड़ा के दुःख से निकालना है । श्रीधर एक ईमानदार मास्टर है जो स्कूल में भ्रष्टाचार होने नहीं देता । सारंग के लिए वो एक मास्टर नहीं गाँव का स्कूल है जिसे ठीक से चलाने के प्रयास में उसकी ये हालत हुई और उसके पास फिलहाल उसकी देह के अलावा अपना कुछ नहीं जो उसे दे सके । वो उसे स्वस्थ देखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है, ठीक वैसे ही जैसे युद्ध क्षेत्र में नर्स सैनिकों को बचाने के लिए उन्हें हर तरह से सांत्वना देती है । यानि स्त्री के देह समर्पण का कोई ठोस आधार होना चाहिए हालांकि ये प्रसंग यौन सुचिता की बनी-बनायी धारणा को तोड़ते हैं ।
रंजीत और श्रीधर के बीच भटक रहे उसके मन की स्थिति को जानते हुए उसके ससुर कहते है कि “मास्टर से तू प्रेम के कारण बंधी है तो रंजीत से मोह के जरिये । मोह को काटने के लाख जतन करते हैं हम, कटता है क्या ?”
गाँव में चुनाव के दिन आते हैं और प्रधान इस बार रंजीत को उम्मीदवार बनाना चाहते हैं जबकि श्रीधर और भंवर आदि सारंग को चुनाव लड़ने को प्रेरित करते हैं । सारंग मना करते हुए कहती है कि- “तुम्हारे विचार से बेड़ियाँ, हमारे चलते सुख शांति । इतना समझ लो कि ढीली बेड़ी ही पाँव ज्यादा काटती है । मैं अपने घर इसी हैसियत से रह सकती हूँ, बस । ज्यादा कुछ करुँगी तो घर की बहू होने का हक भी छीन लिया जाएगा ।”
लेकिन अंतत उसे पर्चा भरना ही पड़ता है । उधर रंजीत पर्चा नही भर पाता तो बौखलाया हुआ चन्दन को फिर अपने भाई के पास शहर भेजना चाहता है और विरोध करने पर सारंग से मार पीट पर उतारू हो जाता है । तब बेटे के लिए सारंग उग्र हो बन्दूक उठा लेती है और गोली चलाते हुए रंजीत को ललकारती है कि “असल मर्द है तो छू चन्दन को ।”
सारंग को नाम वापस लेने के लिए डराया धमकाया जाता है लेकिन वो हार नही मानती तब उसे हराने के लिए साम दाम दंड भेद सभी उपाय किये जाते हैं । सारंग का व्यक्तिगत संघर्ष धीरे-धीरे सामाजिक संघर्ष का रूप ले लेता है । पुरुष प्रधान सामंती समाज के विरुद्ध खड़े होकर वह साहस के साथ न सिर्फ उनका सामना करती है बल्कि स्त्रीमुक्ति का अनूठा आदर्श प्रस्तुत करती है । उपन्यास के अंत में रंजीत का भी मोह भंग होता है और वह वापस सारंग के पास लौट आता है ।
उपन्यास के सभी पात्रों में जहाँ आपसी रिश्ता, लगाव और प्रेम भरा व्यवहार उन्हें एक दूसरे से जोड़े रखता है वहीँ स्वभावजनित इर्ष्या, भय, लालच, द्वेष और अति महत्वाकांक्षा उन्हें आपस में उलझाये भी रखता है । यही इस उपन्यास की विशेषता भी है । भाषा सरल, सहज है जो उपन्यास की कड़ियों को जोड़ने में सहायक है ।
मैत्रेयी जी के लेखन की यही विशेषता होती है कि कहानियां या उपन्यास कल्पना नही वरन यथार्थ प्रेरित होते हैं जो सहज ही पाठक को बाँध लेते हैं । बहुत सारे ऐसे संवाद और प्रसंग भी उपन्यास में हैं जिसमें स्त्री स्वतंत्रता और विमर्श के कई आयामों को अपनी जगह सही सिद्ध करने के तर्कों के चलते इस उपन्यास को लिखने पर लेखिका को तीखी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा लेकिन सच के साहस ने उन्हें अपनी विचारधारा के प्रति अडिग रखा ।
जिन्होंने गाँव के जीवन और वहां की राजनीति को करीब से नहीं देखा वे संभवतः उपन्यास की कुछ बातों और घटनाओं पर आपत्ति कर सकते हैं या उससे अलग राय रख सकते हैं लेकिन जो गाँव से परिचित हैं वो सहज ही इस उपन्यास में स्वयं को कहीं न कहीं मानसिक संघर्ष करते पाएंगे ।
चाक जो लगातार घूमता हुआ मिटटी को नए-नए आकार में गढ़ता है यहाँ स्त्री चेतना को गढ़ता और नयी आकृति देता हुआ प्रतीत होता है । वह उपन्यास के नाम को सार्थक करता है तो जिन्हें यथार्थ देखना, सुनना और समझना पसंद है उनके लिए यह पठनीय किताब है ।

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