पासवान की राजनीति ने अपने गाँव, समाज, जाति और इलाके से सिर्फ लिया, दिया कुछ नहीं

Pushya Mitra
1996-97 तक रामविलास पासवान हमारे हीरो हुआ करते थे। हाजीपुर में सबसे अधिक मार्जिन से चुनाव जीतने के उनके किस्से किंवदंतियों की तरह सुनाये जाते थे। बाद में पता चला कि वह जेपी की अपील का असर था कि वे इतने अधिक मार्जिन से जीते।
फिर धीरे-धीरे वे निगाह से उतरते चले गये। कभी उन्हें अपने समाज के लिए लड़ते, आवाज उठाते नहीं देखा। उन्होने अगर कोई जमीनी संघर्ष किया होगा तो वह काफी पहले की बात रही होगी।
अपने राज्य, समाज और जमीनी सवालों से कटते चले गये। कुर्सी से जुड़ते चले गये। राजनीति में कुनबा परस्ती को खूब जगह दी। समाजवादी विचारों को तो उन्होने कब छोड़ दिया पता ही नहीं चला।
उनके गाँव गया तो पता चला कि वे अपने गाँव भी कई सालों से नहीं आये हैं।
फिर खबर मिली कि अपने छोटे भाई के श्राद्ध में 2019 में शहरबन्नी गये थे, मगर वे अपने उस घर तक नहीं गये, जहां उनकी परित्यक्ता पत्नी राजकुमारी देवी उनके नाम को अगोरते हुए जी रही हैं।
वैसे तो उन्होने अपने मन्त्री पद का इस्तेमाल करते हुए अपने गाँव में दरवाजे तक पहुंचने के लिए सीमेंट की सड़क बनवा दी है। एक भव्य रेस्ट हाउस भी बनवा दिया है। यह सब सेल के सीएसआर फंड की वजह से हुआ है। मगर इतने बड़े राजनेता, कई टर्म केन्द्रीय मन्त्री रहने के बावजूद नदियों के पेट में बसे अपने दुर्गम इलाके की तस्वीर नहीं बदल सके। वह आज भी फरकिया है, पूरी दुनिया से फरक इलाका। जहां न सड़क है, न बिजली, न ढंग के स्कूल, न अस्पताल। बरसात में वह इलाका तीन महीने पानी में डूबा रहता है और अक्सर भीषण नौका दुर्घटना होती रहती हैं।
इसके बावजूद उनके निधन पर उनका इलाका फरकिया उदास है। उनके गाँव शहरबन्नी में कल रात खाना नहीं पका। उनकी परित्यक्ता पत्नी राजकुमारी देवी जिन्हें उन्होने तकनीकी कारणों से तलाक दे दिया था का रो रोकर बुरा हाल था।
वे अपने गाँव, इलाके, समाज और जाति के सबसे बड़े और प्रभावी व्यक्ति थे। इसी वजह से उनका गाँव, इलाका, समाज और उनकी जाति उन पर गर्व करती रही। मगर उनकी राजनीति ने अपने गाँव, समाज, जाति और इलाके से सिर्फ लिया, दिया कुछ नहीं। फिर भी जाने वालों को अलविदा ही कहा जाता है।

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