पिछले पचास सालों में बिहार की दलित राजनीति के सबसे कद्दावर नेता थे रामबिलास पासवान

Balendushekhar Mangalmurty

रामबिलास पासवान पासवान के देहांत के साथ बिहार की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया है. वे लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ बिहार की राजनीतिक तिकड़ी और साथ ही पिछले पचास सालों में बिहार की दलित राजनीति के सबसे कद्दावर नेता थे. वे लालू यादव और नीतीश कुमार के सीनियर थे, उन्होंने इन दोनों नेताओं से पहले अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. इन दोनों के विपरीत वे जेपी आंदोलन की उपज नहीं थे. एक बेहद साधारण दलित परिवार में जन्मे रामबिलास पासवान ने अपनी राजनीतिक समझ बूझ से बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनायी. वे जीवन भर देश की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों से दूर रहे, लेकिन दोनों दलों चाहे वो कांग्रेस हो, या भाजपा के साथ उन्होंने राजनीतिक तालमेल बनाकर रखा. हालाँकि उन्होंने गुजरात दंगों के मामले पर वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दे दिया था, पर वे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में बतौर मंत्री विभाग सँभालते नज़र आये और नरेंद्र मोदी की कई मौकों पर भूरी भूरी प्रशंसा भी करते नज़र आये.

वे इतनी ही आसानी से यूपीए सरकार के साथ गठबंधन करते नज़र आये. दलित परिवार से आये पासवान ने शिक्षा का महत्त्व अपने जीवन में काफी पहले समझ लिया था. वे एक पढ़े लिखे राजनेता थे जो जमीनी राजनीति की समझ बखूबी रखते थे और गँवई अंदाज़ में भाषण देकर आम जनता से जुड़ जाते थे. वे एक charismatic लीडर थे. उनकी अपनी राजनीतिक आभा रही. इस मामले में वे लालू यादव के समकक्ष नज़र आते थे. जातियों के इर्द गिर्द बुने बिहारी समाज में बिहार की दलित जातियों पर और खासकर पासवान ( दुसाध जाति ) पर उनकी पकड़ रस्क पैदा करने वाली थी. इसी पकड़ को कमजोर करने के लिए नीतीश कुमार ने बिहार में महादलित जातियों की परिकल्पना की. उन्होंने महादलित आयोग बनाया और महादलित जातियों के वर्ग से सिर्फ पासवान जाति को अलग रखा.

इस वर्गीकरण के खिलाफ पासवान ने हमेशा आवाज उठायी. पर नीतीश कुमार को इस सोशल इंजीनियरिंग का फायदा हुआ. पिछले तीन दशकों से रामबिलास पासवान हमेशा सत्ता के गलियारे में रहे. और बिहार की राजनीति में भी सरकार गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. लालू यादव ने उनकी इसी पैनी राजनीतिक समझ पर व्यंग कसते हुए उन्हें ‘ मौसम वैज्ञानिक’ करार दिया. पर उनकी बिहार का मुख्यमंत्री बनने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अधूरी रह गयी. पहले लालू यादव और फिर बाद में नीतीश कुमार और इन दोनों का दूसरे दलों के साथ समझौता – इसने राम बिलास पासवान के इरादों पर पानी फेर दिया. हारकर उन्होंने केंद्र की राजनीति में अपने लिए जगह बनायी. बिहार का मुख्यमंत्री बनने के अधूरे सपने को उन्होंने अपने बेटे चिराग पासवान को सौंपा है.

आज जब बिहार चुनाव के ऐन मौके पर रामबिलास पासवान का देहांत हो गया है, तो उनके बेटे चिराग पासवान ने इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए भाजपा के साथ मिलकर बड़ा दांव खेल दिया दिया है और नीतीश कुमार के सामने उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा चैलेंज उपस्थित कर दिया है. 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा करके और एनडीए के सिर्फ एक घटक जदयू और नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खड़ा करके और दूसरे घटक भाजपा के खिलाफ न केवल चुप्पी लगाकर, बल्कि भाजपा से आये तमाम नेताओं को टिकट देकर उन्होंने बहुत राजनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन किया है. आज रामबिलास पासवान को अपने बेटे पर गर्व हो रहा होगा.

बिहार के एक सुदूर देहांत में जन्मे रामबिलास पासवान:

रामबिलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को खगड़िया के सुदूर देहात शहरबन्नी में हुआ था. पिता जामुन पासवान की तीन संतानों में रामविलास सबसे बड़े थे, उसके बाद पशुपति पारस और रामचंद्र पासवान। उनके भाई रामचंद्र पासवान का देहांत हो चुका है. पिता ने तीनों भाइयों को काफी गरीबी में पाला, लेकिन आंबेडकर से प्रभावित रामबिलास पासवान ने अपनी शिक्षा पर ध्यान दिया और उन्होंने एमए और एलएलबी तक की शिक्षा हासिल की. उस दौर में ये एक अभूतपूर्व उपलब्धि कही जा सकती है. वे इतने पर ही नहीं रुके. बल्कि उन्होंने प्रशासनिक सेवा परीक्षा में भी सफलता पायी और डीएसपी के लिए चयनित हुए. पर उनकी जिंदगी की दिशा बदल गयी जब वे समाजवादी नेता राम सजीवन के संपर्क में आए. 1969 में वह अलौली विधानसभा से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर सफलतापूर्वक चुनाव लड़े और बिहार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 50 सालों के बेहद लम्बे और शानदार राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई.

अपने लम्बे राजनीतिक कार्यकाल में रामबिलास पासवान ने लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक मतों से जीतने का विश्व रिकॉर्ड भी बनाया, जिसे बाद में नरसिम्हा राव ने तोड़ा. इतना ही नहीं, रामविलास देश के 6 प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट में मंत्री रहे. वो केंद्र में 6 बार मंत्री बने. सबसे पहले 1989 में पहली बार केन्द्रीय श्रम मंत्री, फिर 1996 में रेल मंत्री, 1999 में संचार मंत्री, 2002 में कोयला मंत्री, 2014 में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री और 2019 में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री बने.

राजनीति में रहते हुए उनके दो ऐसे फैसले थे जो आगे चलकर मील का पत्थर साबित हुए. इसमें पहला फैसला हाजीपुर में रेलवे का जोनल कार्यालय खुलवाना था जबकि दूसरा फैसला केन्द्र में अंबेडकर जयंती पर छुट्टी घोषित कराने का था.

उनकी शादी 1960 में राजकुमारी देवी के साथ हुई थी. उन्होंने दूसरी शादी 1983 में रीना शर्मा से की. चिराग पासवान उनकी दूसरी पत्नी रीना शर्मा उर्फ़ रीना पासवान के बेटे हैं. अब उनकी राजनीतिक विरासत सँभालने की जिम्मेवारी उनके बेटे चिराग पासवान पर आ गयी है. उनके विरोधी और राजनीतिक विश्लेषक की राय है कि 50 सालों तक बिहार की राजनीति में ध्रुवतारे की तरह रहने के बावजूद उनकी राजनीतिक सोच कांशीराम की तरह वृहद् नहीं हो सकी और वे परिवार से बाहर नहीं निकल सके. ऐसे में बिहार में दलित आंदोलन के इतिहास में उनका योगदान बहुत सराहनीय नहीं कहा जाएगा, हालाँकि अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा के लिए आने वाले दौर में युवा नेताओं के प्रेरणाश्रोत बने रहेंगे.

 

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