हिन्दी के आलोचक: मार्क्सवादी ऋषि आचार्य रामविलास शर्मा

प्रोफ़ेसर अमरनाथ

(कोलकता विश्विद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष)

कलकत्ता विश्वविद्यालय का भाषा विज्ञान विभाग देश का सबसे पुराना भाषा विज्ञान विभाग है। यहाँ सुनीति कुमार चाटुर्ज्या और सुकुमार सेन जैसे भाषा वैज्ञानिक अध्यापन कर चुके हैं। एक दिन मैने उस विभाग के एक प्रतिष्ठित और वरिष्ठ प्रोफेसर से पूछा कि क्या वे भाषाविज्ञान के क्षेत्र में रामविलास शर्मा के अवदानों से परिचित हैं ? तो उन्होंने उनके अवदानों से ही नहीं, उनके नाम से भी अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। मैं हतप्रभ था, सोचने लगा कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र में रामलविलास शर्मा की स्थापनाएं इतनी महत्वपूर्ण हैं कि यदि उन्होंने अपनी किताबें अंग्रेजी में लिखी होतीं तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति के भाषा वैज्ञानिक के रूप में प्रतिष्ठा मिली होती और कलकत्ता विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग के पाठ्यक्रम में भी उन्हें जरूर शामिल किया गया होता.
रामविलास शर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के गोल्डमेडलिस्ट थे, डॉक्टरेट थे और बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे किन्तु उन्होंने अपना सारा महत्वपूर्ण लेखन अपनी जातीय भाषा हिन्दी में किया। उन्होंने भाषाविज्ञान की किताबें हिन्दी में लिखकर यहां के बुद्धिजीवी वर्ग की औपनिवेशिक जड़ मानसिकता पर प्रहार तो किया ही, अपनी जाति के प्रति त्याग की एक अद्भुत मिशाल कायम की।
उत्तर प्रदेश के ऊँचगाँव सानी, जिला उन्नाव में जन्मे रामविलास शर्मा ( 10.10.1912 – 30.5.2000) हिन्दी के महान आलोचक, भाषा वैज्ञानिक, निबंधकार, कवि, अनुवादक और चिंतक हैं. वे ऋग्वेद और मार्क्स के गहरे अध्येता, इतिहास वेत्ता और राजनीति-विशारद हैं। उन्हें सभ्यता समीक्षक कहा जा सकता है। उन्होंने सौ से अधिक पुस्तकों की रचना की है। उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं, प्रेमचंद’, ‘प्रेमचंद और उनका युग’, ‘भारतेदु हरिश्चंद्र’, ‘भारतेन्दु युग और हिन्दी भाषा की विकास परंपरा’, ‘निराला की साहित्य साधना’ (तीन खण्ड) ‘स्वाधीनता और राष्ट्रीय साहित्य’, ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’, ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना’, ‘मार्क्स और पिछड़े हुए समाज’, ‘भारत में अंग्रजी राज और मार्क्सवाद’, ‘संस्कृति और साहित्य’, ‘प्रगति और परंपरा’, ‘लोक जीवन और साहित्य’, ‘आस्था और सौन्दर्य’, ‘साहित्य : स्थाई मूल्य और मूल्यांकन’, ‘प्रगतिशील साहित्य की समस्याएं’, ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’, ‘सन् सत्तावन की राज्यक्रान्ति और मार्क्सवाद’, ‘कथा विवेचना और गद्य-शिल्प’, भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद, ‘भारतीय सौन्दर्यबोध और तुलसीदास’, ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’(दो खण्ड), ‘भाषा और समाज’, ‘भारत की भाषा समस्या’, ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’ ( तीन खंड), ‘स्वाधीनता संग्राम : बदलते परिप्रेक्ष्य’, ‘मार्क्स, त्रात्सकी और एशियाई समाज’, ‘पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद’, ‘भारतीय नवजागरण और यूरोप’, ‘इतिहास दर्शन’, ‘भारतीय साहित्य की भूमिका’, ‘गाँधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ’, ‘मेरे साक्षात्कार’, ‘आज के सवाल और मार्क्सवाद’, ‘पाश्चात्य दर्शन और सामाजिक अंतर्विरोध- थेल्स से मार्क्स तक’, ‘लोकजागरण और हिन्दी साहित्य’, ‘रूप तरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि’, ‘प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल’ आदि।
उनकी रचनात्मक पुस्तकों में ‘चार दिन’ (उपन्यास), ‘पाप के पुजारी’ (नाटक), ‘महाराजा कठपुतली सिंह’ (प्रहसन), ‘अपने धरती अपने लोग’ (तीन खंड, आत्मकथा), ‘बुद्ध वैराग्य तथा प्रारंभिक कविताएं’, ‘सदियों से सोए जाग उठे’ आदि ( कविताएं), ‘मित्र संवाद’, ‘अत्र कुसलम् तत्रास्तु’ ( पत्र साहित्य ) आदि प्रमुख हैं। उन्होंने ‘समालोचक’नामक पत्र का संपादन भी किया है और प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के रूप में लेखकों के संगठन का सफलता पूर्वक नेतृत्व भी किया है।
अपनी मान्यताओं के बारे में डॉ. शर्मा लिखते हैं कि “मेरा उन लोगों से मतभेद है जो साहित्य को समाजहित या अहित से परे मानकर केवल रूप की प्रशंसा करके आलोचना की इति कर देते हैं. उनके लिए बिहारी और तुलसीदास समान रूप से वंदनीय हैं………. यदि दरबारों में राजाओं की चाटुकारिता करते हुए भी श्रेष्ठ साहित्य रचा जा सकता था तो इसे संत कवियों की सनक ही माननी चाहिए कि वे दरबारों में आनंदपूर्वक समय न बिताकर चिमटा बजाते हुए रूढ़िवादियों का विरोध सहन करते रहे.” (संस्कृति और साहित्य, भूमिका, पृष्ठ- 6-7)
रामविलास शर्मा की इतिहास दृष्टि मार्क्सवादी है. वे इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करते हैं. सामंती और पूँजीवादी व्यवस्था में लिखे गए साहित्य की मूल प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए वे प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी तत्वों की अलग -अलग पहचान बताते हैं. उन्होंने प्रत्येक युग के महत्वपूर्ण कवियों व साहित्यकारों की रचनाओं को परखकर उनमें सामाजिक जीवन की गतिमयता के लिए जितना पोषक और स्वास्थ्यकर है, उतने को पूरी शक्ति और विश्वास के साथ प्रस्तुत किया है. इसीलिए प्राचीन काल से लेकर आजतक के साहित्यकारों में उन्होंने कबीर, तुलसी, मीरा, भारतेन्दु, महावीरप्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद, वृन्दावनलाल वर्मा, निराला, प्रसाद, नरेन्द्र शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध और नागार्जुन आदि को महत्व देते हुए अपने सिद्धाँतों को व्यावहारिक स्तर पर पुष्ट किया है. हिन्दी साहित्य के इतिहास के पूरे ढांचे को वे बदल देने का प्रयास करते हैं. उदाहरणार्थ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आदि काल और मध्यकाल को अलग- अलग रखा है. रामविलास जी दोनो को सामंती युग के अंतर्गत रखते हुए कहते हैं, “ शुक्ल जी का आदिकाल वास्तविक मध्यकाल है. हिन्दी जनपदों के इतिहास का सामंतकाल है.” इसी तरह आचार्य शुक्ल ने जिसे पूर्व मध्यकाल कहा है उसे वे ‘लोकजागरण काल’ कहते हैं क्योंकि इस काल में सामंती ढांचे के भीतर व्यापारिक पूँजीवाद के विकास के फलस्वरूप नए आर्थिक संबंध विकसित हो चुके थे और एक नई सांस्कृतिक चेतना भक्त-कवियों के माध्यम से जागृत हो चुकी थी. उनके अनुसार 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम के समय जो राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई थी, भारतेन्दु काल उससे सीधे जुड़ा हुआ है.
आलोचना के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के महत्व की प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना‘ नामक पुस्तक लिखी और उसमें उन्होंने शुक्ल जी पर विभिन्न आलोचकों द्वारा लगाए गए आक्षेपों का समुचित उत्तर दिया. उन्होंने शुक्ल जी की आलोचना -दृष्टि तथा उनके आलोचना- कर्म का मूल्यांकन करते हुए यथास्थान शुक्ल जी की असंगतियों की ओर भी संकेत किया है और बताया है कि किस तरह शुक्लजी के बाद हिन्दी आलोचना वैज्ञानिक ढंग से विकसित हुई है।
रामविलास शर्मा ने प्रेमचंद को बहुत महत्व दिया है। इसका मुख्य का कारण यह है कि प्रेमचंद ने जनता को अपनी कला का शक्ति-स्रोत माना है। वे इस बात के प्रमाण हैं कि जनता से अलग रहकर महान साहित्य की रचना संभव नहीं है। उनकी दृष्टि में प्रेमचंद ऐसे विरले लेखक हैं जिनकी रचनाओं से बाहर के साहित्य- प्रेमी हिन्दुस्तान को पहचानते हैं।
निराला के साहित्य की समीक्षा रामविलास शर्मा के समीक्षक व्यक्तित्व के चरम उत्कर्ष का प्रमाण है। उन्होंने तीन खण्डों में निराला की साहित्य साधना लिखकर जो ऐतिहासिक कार्य किया है उस तरह का आलोचना कार्य दूसरा नहीं दिखाई देता। विचारधारा, भावबोध, कला, गद्य साहित्य और परंपरा शीर्षकों के अंतर्गत उन्होंने निराला के साहित्य की विशद समीक्षा की है।
रामविलास शर्मा ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की कमजोरियों को पहचाना, साम्राज्यवादियों की साजिशों का पर्दाफाश किया तथा भारत को एक भाषायी क्षेत्र प्रतिष्ठापित किया। उन्होंने भाषा के विकास को लेकर पहले से प्रचलित एक जननी भाषा संस्कृत और उससे विकसित आधुनिक भारतीय भाषाओं की अवधारणा को खारिज किया। उन्होंने बताया कि भाषाओं का विकास वंश-वृक्ष की तरह नहीं हुआ है अपितु भाषाओं का विकास नदी की धारा की तरह होता है। जिस तरह पहाड़ों के बीच से निकलने वाली नदी जब समुद्र तक की यात्रा पूरी करती है तो उसके मार्ग के बीच-बीच में अनेक छोटी-बड़ी नदियाँ मिलती और उसमें समाहित होती रहती है। उसी तरह भाषाओं का भी विकास होता है। हम जितना ही अपने अतीत में जायेंगे, भाषाओं की संख्या बढ़ती जाएगी। आज जो भी भाषायें जीवित हैं उनका विकास संस्कृत से नहीं बल्कि उन्हीं के पुराने रूपों से हुआ है।
हिन्दी जाति के गठन और उसके विकास पर रामविलास शर्मा का काम अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार किसी जाति के गठन में जो चार चीजें आवश्यक होती हैं वे हैं – सामान्य भाषा, सामान्य प्रदेश, सामान्य संस्कृति और सामान्य आर्थिक जीवन। इन चारो में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामान्य भाषा है। रामविलास शर्मा ने इस विषय पर विस्तार से और इसके हर पहलू पर लिखा और अन्तिम दिनों तक इस मुद्दे पर सक्रिय बने रहे। उन्होंने गणों से सामंतयुगीन लघुजातियों और फिर पूँजीवादी महाजाति के निर्माण का विस्तृत और प्रामाणिक अध्ययन किया है और निष्कर्ष निकाला है कि प्राक्सामंतीय जनों और सामंतयुगीन लघुजातियों के विघटन और एकीकरण से महाजातियों का निर्माण होता है। रामविलास शर्मा का दृढ़ मत है कि जो लोग हिन्दी जाति का अस्तित्व अस्वीकार करते हैं और हिन्दी भाषा की एकता खण्डित करना चाहते हैं, वे कहीं न कहीं भारत की राष्ट्रीय एकता का भी विरोध करते हैं। कारण यह कि इस राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का माध्यम हिन्दी ही है।
रामविलास शर्मा अकेले ऐसे आलोचक हैं जिनकी आलोचना प्रक्रिया में केवल साहित्य ही नहीं होता, बल्कि वे समाज, इतिहास, राजनीति आदि को एक साथ लेकर उसका मूल्यांकन करते हैं। उनके मूल्यांकन की कसौटी यह होती है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है।
रामविलास शर्मा के अनुसार यदि भारत के इतिहास का सही-सही मूल्यांकन करना है तो हमें अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना होगा। अँग्रेजों ने जान-बूझकर भारतीय इतिहास को नष्ट किया है। भारत में व्याप्त जाति, धर्म के अलगाव का जितना गहरा प्रकटीकरण अँग्रेजों के आने के बाद होता है, उतना गहरा प्रभाव पहले के इतिहास में मौजूद नहीं है। समाज को बाँटकर ही अँग्रेज इस महान राष्ट्र पर शासन कर सकते थे और उन्होंने वही किया भी है।
हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के विषय में रामविलास शर्मा की स्थापनाएं प्राय: स्वीकार कर ली गई हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र,महावीरप्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, निराला, रामचंद्र शुक्ल आदि के बारे में जो छवि रामविलास जी ने निर्मित की है वह लगभग सर्वस्वीकृत है। हाँ, सुमित्रनंदन पंत, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल और मुक्तिबोध पर उन्होंने जो लिखा है वह हिन्दी के बौद्धिक जगत में विवादास्पद बना हुआ है। किन्तु, अपनी ईमानदारी, चरित्र और विचारों के प्रति आस्था को लेकर वे असाधारण रूप से निर्विवाद हैं।
अपनी कथनी और करनी में साम्य के लिए मशहूर रामविलास शर्मा को अपने जीवनकाल में अनेक सम्मान मिले। सम्मान के साथ धनराशि भी मिलती थी। उन्हें जितने सम्मान मिले, उसका सम्मान तो उन्होंने स्वीकार कर लिया, किन्तु कोई धनराशि ग्रहण नहीं की। सारा धन उन्होंने हिन्दी के विकास अथवा बच्चों के शिक्षार्थ दान कर दिया। यहां तक कि जब उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला तो पुरस्कार के साथ उन्हें पंद्रह दिन तक सोवियत संघ की यात्रा का निमंत्रण भी मिला। उन्होंने सम्मान लिया और यात्रा ठुकरा दी। रामविलास शर्मा ऐसे साहित्यकार हैं जो कभी विदेश नहीं गए। उनका कोई चित्र किसी नेता या मंत्री के साथ नहीं मिलता। जब उन्हें व्यास सम्मान मिला तो खुद बिड़ला जी उन्हें वह सम्मान देने उनके घर गए। यह बिड़ला जी का बड़प्पन भी था और डॉ. शर्मा के प्रति उनका सम्मान भी।
मार्क्सवाद को रामविलास शर्मा सिद्धांत से अधिक चिंतन पद्धति मानते हैं। इसीलिए मार्क्सवाद से संबंधित उनकी कई अवधारणाएं सामान्य मार्क्सवादियों को नहीं पचतीं। उदाहरणार्थ सर्वहारा की तानाशाही का सिद्धांत वे नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि सर्वहारा का वर्चस्व व्यवस्था में हो, तानाशाही में नहीं, क्योंकि किसी भी स्थिति की तानाशाही अंतत: तानाशाही को ही बढ़ावा देती है। मार्क्सवादी सिद्धांतकार के रूप में उनका योगदान यह है कि उन्होंने इस चिंतन पद्धति का उपयोग स्वतंत्र रूप से भारतीय संदर्भ में किया और हिंदी के पाठकों के दिमाग से यह भ्रम दूर कर दिया कि मार्क्सवाद विदेशी विचारधारा है। उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए वेदों सहित तमाम संस्कृत साहित्य को पढ़ना होगा और उन्होंने उनका गहन अध्ययन भी किया। रामविलास शर्मा ऐसे मार्क्सवादी हैं जिन्होंने ऋग्वेद पर ग्रंथ लिखे। जिन्हें वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास जैसे कवि सबसे ज्यादा पसंद हैं। उन्होंने बताया कि तुलसी का पूरा साहित्य ही सामंतवाद विरोधी मूल्यों से भरा पड़ा है। इसके लिए उन्होंने ‘तुलसी-साहित्य के सामंत विरोधी मूल्य’ नाम से लंबा निबंध लिखकर आलोचकों का मुँह बंद कर दिया।
रामविलास शर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, शताब्दी सम्मान, शलाका सम्मान, भारत भारती सम्मान आदि बहुत से सम्मान मिल चुके हैं। किन्तु उनके लेखन, वैचारिक प्रतिबद्धता और आचरण को देखते हुए सारे पुरस्कार और सम्मान छोटे पड़ जाते हैं। इन सबके प्रति वे निस्पृह थे। उनके लेखन को केन्द्र में रखकर कई पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें रविभूषण लिखित ‘रामविलास शर्मा का महत्व’विशेष उल्लेखनीय है। ‘दस्तावेज’, ‘वसुधा’, ‘कल के लिए’, ‘उद्भावना’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’आदि पत्रिकाओं ने उनके ऊपर विशेषांक प्रकाशित किए हैं।
ऐसे लेखक, जो इस समाज को सुन्दर बनाने के लिए अपनी कलम का सर्वोत्तम इस्तेमाल करते हैं और व्यवस्था से कभी समझौता नहीं करते, उनमें रामविलास शर्मा अन्यतम हैं।
हम जन्मदिन के अवसर पर साहित्य और समाज के प्रति आचार्य रामविलास शर्मा के महान योगदान का स्मरण करते हैं और अपने को उस परंपरा में पाकर गौरव का अनुभव करते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.