मुकेश सहनी की पार्टी VIP में भी लोजपा की तर्ज पर भाजपा नेताओं की एंट्री

बिहार विधान सभा चुनाव 2020 में बिहार की राजनीतिक तस्वीर सिद्धांतविहीन और विचलित कर देने वाली होती जा रही है. अवसरवादिता खुल कर सामने आ रही है, और सिद्धांतों को, आदर्शों को ताक पर रख दिया गया है. सबसे पहले लोजपा ने एनडीए से बाहर निकलकर 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा की. चिराग पासवान ने विशेष तौर पर नीतीश कुमार पर निशाना साधा और भाजपा को साधने के लिए उस पर चुप्पी लगा ली. फिर भाजपा के कई नेता लोजपा में शामिल होने लगे और उन्हें टिकट भी दे दिया गया है. अब वे जदयू के खिलाफ लड़ेंगे. वहीँ अब यही प्रक्रम मुकेश सहनी की पार्टी के साथ भी दोहराया जा रहा है. सबसे पहले मुकेश सहनी राजद नेता तेजस्वी यादव पर धोखाधड़ी का आरोप लगाकर महागठबंधन से बाहर निकले. बकौल उनके, “हमारे साथ 25 सीट एवं उपमुख्यमंत्री का वादा करके अंधेरे में रखकर अंतिम समय में पीठ में छुरा घोंपने का काम किया गया.”

फिर वे एनडीए में शामिल हुए. जहाँ जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को जदयू ने अपने हिस्से से 7 सीटें दीं, वहीँ भाजपा ने मुकेश सहनी के दल वीआइपी को अपने हिस्से से 11 सीटें दी हैं. पर भाजपा के लिए वीआइपी लोजपा की तरह एक और फ्रंट बनता नज़र आ रहा है. अंतर इतना ही है कि जहाँ लोजपा के सिम्बल पर भाजपाई नेता जदयू के खिलाफ लड़ते नज़र आएंगे, वहीँ वीआइपी के सिम्बल पर लड़ते भाजपाई नेता एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर लड़ते नज़र आएंगे. ऐसी स्थिति में चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर विधायकों के इधर से उधर जाने, और हॉर्स ट्रेडिंग की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता.

ताजा उदाहरण के तौर पर भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे हरि सहनी अब वीआइपी नेता हो गए हैं. इसी तरह पूर्व एमएलसी सह भाजपा नेता मिश्री लाल यादव ने भी वीआइपी का दामन थाम लिया है. बताया जाता है कि वीआइपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश सहनी ने हरि सहनी को केवटी तथा मिश्री लाल यादव को अलीनगर से अपना उम्मीदवार बनाया है. 3 नवंबर और 7 नवंबर को होने वाले दूसरे और तीसरे चरण के चुनाव के लिए अगर और भाजपाई नेता वीआइपी और लोजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़ते हैं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी.

कौन हैं मुकेश सहनी?
गौरतलब है कि बिहार में अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) की आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा निशाद समुदाय का है, इसलिए इसे एक अहम वोट बैंक की तरह देखा जा रहा है, वहीं बिहार की 5 प्रतिशत आबादी मल्लाहों की है.
सवाल भी उठ रहे हैं हमेशा की तरह. आखिर मुकेश सहनी के बड़े बड़े सम्मेलनों के पीछे किसकी आर्थिक ताकत है. कौन है जो मुकेश सहनी को प्रमोट कर रहा है.

मुकेश, बिहार में दरभंगा जिले के सुपौल बाजार के मूल निवासी हैं. 19 साल की उम्र में वे घर से भागकर मुंबई गए थे हालांकि, कुछ समय के लिए वे लौट आए पर उन्हें गांव रास न आया. वे फिर मुंबई चले गए. शुरुआत में उन्होंने एक कॉस्मेटिक स्टोर में सेल्समैन की नौकरी की. यहीं मुकेश के दिमाग में फिल्मों, सीरियल्स और शोज के सेट्स बनाने के बिजनेस का ख्याल आया. उनके लिए सबसे बड़ा मौका तब आया जब, नितिन देसाई ने उन्हें शाहरुख खान स्टारर ‘देवदास’ का सेट बनाने के लिए आमंत्रित किया. इस धंधे में शुरुआती सफलताएं मिलने के बाद उन्होंने ‘मुकेश सिनेवर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी बनाई. इन्होंने इस सफल कारोबार से महज कुछ ही समय में खूब नाम और पैसा कमाया.

मुकेश साहनी, मल्लाह जाति के हैं. वे निषाद विकास संघ नाम के एक संगठन के मुखिया भी हैं. गौर हो कि बिहार में मछुआरों व नाविकों की जाति में आने वाले मल्लाह, साहनी, निषाद, बिंद जैसी अति पिछड़ी जातियों की आबादी करीब 5% है. बिहार में इस समय इनका कोई बड़ा नेता नहीं है. मुकेश ने फूलन देवी के नाम पर इन्हें बीजेपी और एनडीए के लिए बिहार में लामबंद किया था. उस समय साहनी के प्रचार वाले विज्ञापनों में फूलन देवी और मल्लाह जाति के ही एक शहीद जुब्बा साहनी की फोटो लगी देखी जा सकती थी. एनडीए के पोस्टर्स में मुकेश का परिचय देते हुए उनके नाम के साथ ‘सन ऑफ मल्लाह’ भी जरूर लिखा रहता था. बीजेपी को भरोसा था कि इनकी वजह से पार्टी और गठबंधन को मल्लाहों का 5 प्रतिशत वोट जरूर मिलेगा, हालाँकि 2015 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को महागठबंधन के हाथों करारी हार मिली थी.


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