रामबिलास पासवान के निधन से बिहार की इन सीटों पर राजनीतिक असर पड़ सकता है

Balendushekhar Mangalmurty

बिहार चुनाव बेहद दिलचस्प स्थिति में चला गया है. लोजपा और भाजपा का मकड़जाल जदयू के भारी पड़ता नज़र आ रहा है. बिहार में कुल 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के खिलाफ हर विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवार उतारने की घोषणा के बाद पहले चरण में लोजपा ने भाजपा से आए छह लोगों को टिकट दिया है। लोजपा ने भाजपा के नेता रहे राजेंद्र सिंह को दिनारा विधानसभा से , उषा विद्यार्थी को पालीगंज विधान सभा से टिकट दिया है. इन दोनों के अलावा भाजपा के झाझा के विधायक रवींद्र यादव, घोसी से भाजपा नेता राकेश सिंह, सासाराम से भाजपा नेता रामेश्वर चौरसिया, बांका के भाजपा नेता मृणाल शेखर को टिकट दिया है, वहीं जदयू नेता भगवान सिंह कुशवाहा को लोजपा ने जगदीशपुर से टिकट दिया है।

जदयू के कई शीर्ष नेताओं का मानना है कि ये पूर्व भाजपाई नेता भाजपा के इशारे पर ही लोजपा में शामिल हो रहे हैं। वहीँ अपनी सफाई में भाजपा नेताओं का कहना है कि यह सब इसलिए लोजपा में शामिल हुए क्योंकि इस बार इन्हें टिकट नहीं दिया जा रहा था. जदयू का मानना है कि भाजपा बिहार में भी महाराष्ट्र का फार्मूला दोहराना चाहती है जहां उसने 2014 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना से अधिक सीटें जीतकर मुख्यमंत्री पद हासिल कर लिया था।

अब ऐसे में बिहार के कद्दावर दलित नेता रामबिलास पासवान के देहांत के बाद ये बात सामने आ रही है कि लोजपा को सहानुभूति की लहर का फायदा होगा. दलित एकजुट होकर लोजपा के पक्ष मेंवोट कर सकते हैं, ऐसे में जदयू को नुकसान की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.

बिहार में कुल मिलाकर छह लोकसभा सीट अनुसूचित जातियों के लिए रिज़र्व हैं: गोपालगंज, हाजीपुर, समस्तीपुर, सासाराम, गया और जमुई.

बिहार में महादलित और दलित वोटरों की आबादी कुल 16 फीसदी के करीब है। रामबिलास पासवान इस जातिसमूह के सबसे बड़े नेता रहे हैं. उनके पीछे पासवान समुदाय हाथ बांधे खड़ा रहा है. ऐसे में नीतीश कुमार ने रामबिलास पासवान के आधार को कमजोर करने के लिए महादलितों के अलग वर्ग की घोषणा की. ऐसे में दलित वोट दो वर्गों में बंट गया. एक तरह लगभग 5 फीसदी पासवान वोट और दूसरी तरफ 10 फीसदी महादलित वोट. महादलितों के कल्याण के लिए चलाये गए तमाम कल्याणकारी योजनाओं से नीतीश कुमार राजनीतिक फायदा हुआ. महादलित वर्ग में जीतनराम मांझी, मुकेश सहनी आदि नए पुराने नेता प्रमुखता से उभर कर आये, जो रामबिलास पासवान को चुनौती तो नहीं दे सके, पर अपनी जमीन बनाने में एक हद तक सफल रहे. 2018 में पासावन जाति को महादलित वर्ग में शामिल कर दिया। और इस तरह से अब बिहार में दलित जातियों के बीच बंटवारा ख़त्म हो गया है.

बिहार में अनुसूचित जातियों के लिए रिज़र्व लोकसभा सीट पर पासवान परिवार और लोजपा का अधिपत्य है. वहीँ कुछ अन्य जिलों में दलित वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. समस्तीपुर, खगड़िया, जमुई, वैशाली और नालंदा में महादलित वोटों की अच्छी खासी आबादी है।

हाजीपुर सीट पर रामबिलास पासवान का पारम्परिक वर्चस्व रहा है. रामविलास पासवान खुद हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते रहे हैं. 2019 में उनके भाई पशुपति कुमार पारस यहां से चुनाव लड़े और जीते. हाजीपुर में करीब साढ़े तीन लाख से ज्यादा दलित वोटरों की संख्या है। इस संसदीय क्षेत्र में 7 विधानसभा सीट हैं जिसमें हाजीपुर, महुआ, राजापाकर, जंदाहा, महनार, पातेपुर और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र आते हैं. राजापाकर सुरक्षित सीट है और यह जेडीयू के खाते में गया है. जदयू ने महेंद्र राम को अपना उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर लोजपा ने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। जाहिर है, जदयू की राह आसान नहीं होने वाली है. इस सुरक्षित लोक सभा सीट के अन्य विधानसभा सीटों पर दलित वोटों की अच्छी धमक है.

सुरक्षित लोक सभा सीट जमुई से चिराग पासवान खुद सांसद हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा क्षेत्र आते हैं- तारापुर, शेखपुरा, सिकंदरा, जमुई, झाझा और चकाई जमुई जिले की 2 सीटें जेडीयू के खाते में गई है। झाझा और चकाई, चिराग ने दोनों ही सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। झाझा से रविंद्र यादव को टिकट दिया है और चकाई से संजय कुमार मंडल को दिया है। दलित वोटों के साथ-साथ चिराग ने यहां अतिपिछड़ी जातियों के वोट में सेंधमारी की कोशिश की है।

हालाँकि नीतीश कुमार का गृह जिला नालंदा सुरक्षित लोक सभा सीट नहीं है, पर इस जिले में दलित वोटरों की अच्छी खासी संख्या है. नालंदा लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा सीट आते हैं-अस्थावां, बिहारशरीफ, राजगीर, इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, और हरनौत. नालंदा में महादलितों की आबादी साढ़े 4 लाख के करीब है. वर्तमान में नालंदा लोकसभा क्षेत्र की 7 में से 6 विधानसभा सीटें जदयू के पास है। राजगीर सुरक्षित सीट है। लोजपा ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है.

खगड़िया रामबिलास पासवान का गृह जिला है. उन्होंने खगड़िया के अलौली सीट से ही अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी. खगड़िया में दलित वोटर करीब 4 लाख के करीब हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें आती हैं-सिमरी बख्तियारपुर, हसनपुर, अलौली, खगड़िया, बेलदौर और परबत्ता। अलौली सुरक्षित सीट पर जदयू ने साधना सदा को अपना उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर लोजपा कड़ी टक्कर देने की तैयारी में है. पासवान के गृहजिला में लोजपा को सहानुभूति लहर के फायदा मिलने से इंकार नहीं किया जा सकता.

समस्तीपूर सुरक्षित लोक सभा सीट से सांसद हैं रामविलास पासवान के भतीजे प्रिंस राज सांसद हैं. लगभग ३.5 लाख की दलित आबादी वाले इस लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें आती हैं. कल्याणपुर और रोसड़ा सुरक्षित सीटें हैं। कल्याणपुर सुरक्षित सीट से जदयू के उम्मीदवार महेश्वर हजारी हैं। लोजपा इस सीट पर जदयू को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में है. वहीं, रोसड़ा बीजेपी के खाते में गया है। बीजेपी के खिलाफ एलजेपी ने कोई उम्मीदवार नहीं दिया है, तो इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है.

इन लोकसभा क्षेत्रों के बाहर भी अन्य विधानसभा सीटों पर लोजपा रामबिलास पासवान के देहांत के चलते एक जुट होने की उम्मीद लगाकर बैठी होगी, इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता.


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