यात्रा वृत्तांत: दक्कन का शहर औरंगाबाद

भारती पाठक

कभी कभी लगता है कि अब तक सोच समझ कर की गई यात्राओं की अपेक्षा वो यात्राएं ज्यादा आनंदायक रहीं जो अनायास बिना किसी खास तैयारी या पूर्व नियोजन के की गयीं और हो भी क्यों न जब अचानक कुछ मनचाहा हो जाए या मिल जाए तो मन कैसे खिल जाता है । ठीक यही हुआ हमारी पुणे यात्रा के आखिरी तीन दिनों में । पुणे गए हुए हमें 12 दिन हो चुके थे और 15 दिन की इस यात्रा में बाकी तीन दिन ही बचे थे तभी औरंगाबाद से सदाशिव काम्बले सर का फ़ोन आया कि “क्या औरंगाबाद आये बिना ही वापस चली जाओगी ?”
सदाशिव सर से मेरा परिचय उदयपुर में प्रशिक्षण के दौरान हुआ था जब हम काफी दिन साथ रहे थे । उनके शहर के इतने करीब आकर बिना मिले जाना भी ठीक नहीं लग रहा था । सोचा, ठीक ही कह रहे सर क्यों न लगे हाथ उनसे मिल ही लिया जाए और घूमना भी हो जाएगा । नेट पर देखा तो औरंगाबाद ऐतिहासिक रूप से काफी समृद्ध भी लगा और दूरी भी कुछ ख़ास नहीं थी करीब 235 किलोमीटर यानि एक दिन में घूम कर वापस भी आया जा सकता ।

पुणे से जाने का साधन देखा तो बस की अच्छी सुविधा थी । बच्चे लगातार यात्राओं से इतने थके थे कि उन्होंने साथ जाने से मना कर दिया । देवर की छुट्टियां ख़त्म हो गयी थी तो वो भी साथ आने में असमर्थ थे तो जाने वाले बचे मैं और पतिदेव जो एक तरह से अच्छा भी था कि हम अतिरिक्त जिम्मेदारी और चिंता के बिना कम समय में ज्यादा जगहें देख सकते थे ।

शिवशाही बस की सेवाएँ पहले भी एक दो बार ली थींऔर अनुभव अच्छा था तो सुबह 5 बजे की बस में टिकट कर ली और वापसी की टिकट रात 8:30 की । सर का घर वैसे तो औरंगाबाद से 25 किलोमीटर दूर वसुसाय गाँव में था लेकिन उन्होंने बताया कि वे औरंगाबाद में ही हमें मिलेंगे, फिर हमें औरंगाबाद घुमा कर गाँव जाएंगे । अगले दिन सुबह 4 बजे ही मैंने ओला बुक की जिसने हमें निश्चित बस स्टैंड पर समय से पहुंचा दिया ।

थोड़ी ही देर में बस आ गयी। मैंने अपनी सीट ली और आँखें मूँद ली क्योंकि सुबह 3 बजे से ही जगे होने के कारण बुरी तरह नींद आ रही थी । औरंगाबाद महाराष्ट्र राज्य का एक महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र होने के साथ साथ एक प्रमुख औद्योगिक शहर तथा शिक्षा केंद्र भी है । तमाम अन्य विशेषताओं के साथ ही ये अजन्ता और एलोरा की गुफाओं के लिए भी जाना जाता है जो कि विश्व धरोहरों में शामिल हैं । मध्यकाल में मुग़ल शासक औरंगजेब ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध यहीं बिताया था ।

Aurangabad, City of Gates

वहां से जब शहर में प्रवेश किया तो रास्ते में कई बड़े बड़े द्वार बने थे जिसके बारे में सदाशिव सर ने बताया कि पूरे औरंगाबाद में प्रवेश के लिए कुल बावन द्वार है तो इसे ‘बावन पुरी’ और ‘सिटी ऑफ़ गेट्स’ भी कहा जाता है । इनमें दिल्ली गेट, मखाई गेट, रोशन गेट और पैठन गेट आदि प्रमुख दर्शनीय गेट हैं जिनमें सबसे बड़ा, मजबूत और आकर्षक ‘भड़कल गेट’ है ।


सबसे पहले हम पहुंचे “पनचक्की” जिसे पानी मिल भी कहते हैं जिसका निर्माण सरदार मलिक अम्बर ने कराया था । भीतर चारदीवारी के बीचों-बीच एक छोटा सा पक्का तालाब जैसा बना था (जिसमेंफिलहाल पिछले वर्षों में बारिश कम होने के कारण पानी नहीं था ) लेकिन इसमें पानी 6 किलोमीटर दूर जटवाड़ा से मिट्टी की पाइप के जरिये आता है । थोड़ा सा आगे चलने पर दाहिनी तरफ थी वो प्रसिद्ध पनचक्की जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं । यह मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला में डाली गयी वैज्ञानिक विचार प्रक्रिया को प्रदर्शित करता है । जिसमें पानी के माध्यम से उर्जा उत्पन्न करने के लिए बनाया गया था । इसके चेंबर में लोहे का विशाल पंखा दिख रहा था । इससे उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग आटे के मिल को चलाने में किया जाता था जिसमें सूफी संतों के लिए अनाज पीसा जाता था । इसी परिसर में बाबा शाह मुसाफिर की मज़ार भी है जिनका औरंगजेब बड़ा आदर करता था । वहां घूमने में कुछ 20 मिनट का समय लगा फिर हम बीबी का मकबरा देखने निकले ।

पनचक्की से बीबी का मकबरा लगभग 2 किलोमीटर दूर है । गाड़ी पार्किंग में लगाकर हम अन्दर गए । मौसम काफी गर्म था जबकि अभी सुबह के 10:30 ही बजे थे । जिसने ताजमहल देखा है वो बीबी का मकबरा देखकर अचंभित हुए बिना नहीं रह सकता क्योंकि दोनों का ढांचा हुबहू एक सा है । इसीलिए इसे “दक्कन का ताजमहल” भी कहते हैं । इसे मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने अपनी बीबी दिलरस बानो बेग़म ( रूबईया दुर्रानी ) की याद में बनवाया था । वास्तुकला सामान्य और रखरखाव भी कुछ उपेक्षित सा लगा ।  करीब २५ एकड़ के क्षेत्र में फैले इस मकबरे का बस गुम्बद वाला हिस्सा ही संगमरमर का है बाकी सामान्य ईटों और प्लास्टर से बना है । हाँ एक बात जो बड़ी रोचक लगी मुझे वो ये कि भीतर की सड़कें जो इंटों की बनी थी बेहद कलात्मक तरीके से अलग अलग आकृतियों में थी । बताते हैं इस मकबरे का डिजाइन अत्तुल्लाह द्वारा बनाया गया था जिनके पिता उस्ताद अहमद लाहोरी को ताजमहल के मुख्य आर्किटेक्ट के तौर पर पहचाना जाता है । कुछ तकनीकी खामियों और कम धनराशि खर्च कर बनाए गए इस मकबरे को “गरीबों का ताजमहल” भी कहा जाता है ।

मकबरे के पीछे की ओर कुछ दूरी पर “औरंगाबाद की गुफाएं” भी दिख रही थीं । ये शहर के उत्तर दिशा में हरी-भरी पहाड़ियों की गोद में स्थित 12 गुफाओं का समूह है जो लगभग तीसरी शताब्दी तक पुरानी हैं । बताते हैं कि यहाँ की वास्तुकला और मूर्तिकला में तांत्रिक प्रभावों को देखा जा सकता है । अधिकतर गुफाएं विहार यानि आवासीय कक्ष हैं जबकि तीसरी और सातवीं गुफा अत्यंत आकर्षक हैं । यहाँ की मूर्तियाँ अभी भी काफी अच्छी स्थिति में है ।

वहां से निकल कर हम दौलताबाद के लिए निकले । दौलताबाद जिसका प्राचीन नाम देवगिरी है मुहम्मद बिन तुगलक की राजधानी थी। देवगिरी का किला पहुंचते करीब 12 बज गए थे और धूप सिर पर आ गयी थी । दूर से देखने पर पहाड़ी पर स्थित खंडहर जैसे दिखते इस किले पर शायद सरकार की नज़र नहीं पड़ी अब तक क्योंकि इसे संरक्षण के लिए जितने प्रयास होने चाहिएं वो होते दिख नहीं रहे थे, हालांकि कुछ काम चल रहा था । दीवारे कमजोर हो कर गिर रहीं हैं और धीरे-धीरे एक प्राचीन धरोहर खोने की कगार पर है । यहाँ घूमने के लिए पूरा दिन चाहिए तो हमने थोड़े में निबटाया और एलोरा की गुफाएं देखने के लिए निकल पड़े ।  दौलताबाद अंजीर उत्पादन के लिये भी प्रसिद्द है ।  ज्योतिबा फुले का गाँव मारिवाडा और संत एकनाथ जी भी इसी क्षेत्र से थे जो यहाँ पूजनीय माने जाते हैं । पैठण, जो औरंगाबाद की एक तहसील है और अपनी पैठणी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है ।

कैलाश मंदिर

औरंगाबाद से एलोरा की दूरी करीब 30 किलोमीटर की है और सड़क कहीं-कहीं पहाड़ी घुमावदार है जहाँ से दूर-दूर तक फैली पहाड़ी गुफायें मन को ललचा रही थीं। बताते हैं यलगंगा नदी के नाम पर ही इन गुफाओं का नाम एलोरा रखा गया । वहाँ पहुंचते हमें 2 बज गए । विश्व धरोहर में शामिल  इन गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के शासकों द्वारा पांचवीं और दसवीं शताब्दी में किया गया था । यहां 34 गुफाएं हैं जिसमें हिन्दू, जैन और बौद्ध गुफा मंदिर बने हैं जिनमें क्रम संख्या 1-12 में बौद्ध गुफाएं, 13-29 में हिन्दू गुफाएं और 30-34 में जैन गुफाएं हैं जो आस- पास ही बनी हैं । इनमें सबसे मुख्य 16 नंबर की गुफा काफी बड़ी है जहाँ कैलाश मंदिर स्थित है । विशाल कैलाश मंदिर को बनाना उसके शिखर से शुरू किया गया था । ये मंदिर और गुफाएं जिस तरह इतने विशाल पहाड़ को काट कर बनाई गई हैं सहज विश्वास नहीं होता कि ये मानव निर्मित हैं ।

घृषनेश्वर महादेव का मंदिर

कालान्तर में इन गुफाओं में स्थित मंदिरों को काफी नुकसान भी पहुँचाने की कोशिश की गयी जिनके चिन्ह दीवारों और विशाल मूर्तियों की टूट-फूट में देखे जा सकते हैं। कुछ यादगार तस्वीरें कैमरे में भी लीं और स्मृतियों में भी कैद किया, फिर वहां से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित घृषनेश्वर महादेव का मंदिर देखने गए । यह मंदिर भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है ।
किसी मान्यता के अनुसार मंदिर में पुरुषों का प्रवेश बनियान, कमीज और बेल्ट वगैरह उतार कर ही करना होता है । सभा मंडप 24 खम्भों पर सुन्दर नक्काशी से तराश कर बनाया गया है जिसमें भव्य नंदिकेश्वर स्थापित हैं । यहाँ की एक विशेषता और है कि कुल 21 गणेश पीठों में से एक प्रसिद्ध पीठ ‘लक्ष्यविनायक’ यहीं है ।
दर्शन करते और मंदिर का इतिहास जानते शाम हो चली थी तो वहां से हम सर के गाँव गए ।

रूखे-सूखे हरियाली विहीन रास्ते को देखते हुए मुझे आभास हो रहा था कि जैसे वर्षों से सूखाग्रस्त इलाके में घूम रहे हों । पानी की एक-एक बूँद का संचय करना और किफायत से खर्च करना मैंने वहीं पहली बार देखा जब पीने का पानी भी आधा गिलास आया, वजह ये कि जितना पीना हो पी लें और जरूरत हो तो फिर ले लें लेकिन जरा भी पानी बर्बाद न हो । सचमुच मन कचोट रहा था कि कितना पानी बर्बाद करते हैं लोग कहीं-कहीं और यहाँ इतनी दिक्कत । उनके परिवार में माता पिता और बच्चों के अलावा उनके कुत्ते का व्यवहार भी हमारे प्रति काफी सहृदय था । साढ़े आठ बजे की बस थी हमारी और औरंगाबाद वहां से 25 किलोमीटर दूर । तो जल्दी से खाना खाया जो उनकी माता जी ने बड़े ही प्रेम से बनाया था । फिर स्नेहपूर्वक हुई पारंपरिक विदाई के बाद सर हमें बस स्टैंड तक पहुँचाने आये जहाँ हमने भावुक विदा ली, दुबारा आने के लिए क्योंकि अभी अजंता देखना बाकी था । बहुत बार स्नेह के धागे शायद ऐसे ही जुड़ जाते हैं जो जीवन पर्यंत बांधे रखते हैं । वैसे भी यात्रायें जगहों से ही नहीं व्यक्तियों से भी जोड़ती हैं


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