पुस्तक चर्चा/ Diary of Anne Frank का हिंदी अनुवाद

भारती पाठक
यह डायरी शताब्दी की महानतम डायरियों में से एक मानी जाती है जिसे करीब 76 वर्ष पूर्व एक 13 वर्षीय किशोरी अने फ्रांक ने लिखना शुरू किया । इस डायरी का विश्व की १७ भाषाओँ में अनुवाद किया गया । इस “द डायरी ऑफ़ अ यंग गर्ल” का हिंदी अनुवाद जाने माने कहानीकार और आलोचक प्रभात रंजन जी ने किया है । इनके प्रस्तुत अनुवाद की भाषा बेहद सरल और रोचक है जिसमें लेखिका के कच्चे-पक्के अनुभवों के साथ ही संवेदनशील और स्वाभाविक भावों की चुभन और अत्यंत हृदय-विदारक घटनाओं का सच्चा विवरण है जो पाठक को कहीं-कहीं विचलित भी करता है ।
अने फ्रांक ने जब 12 जून 1942 को अपने जन्मदिन पर मिली ये डायरी लिखनी शुरू की तो उसका उद्देश्य अपने अकेलेपन में इस डायरी रूपी मित्र को शामिल कर इसे नितांत निजी रखना था । इसके लिए उसने अपनी डायरी को ‘किटी’ नाम दिया और दैनिक जीवन की अनुभूतियों की हर छोटी बड़ी बातें बिना छिपाए उसे (डायरी को) ठीक उसी तरह बताने लगी जैसे कोई लड़की अपनी हमउम्र सहेली से कहती है ।
अने लिखती है कि “मेरे जैसे व्यक्ति के लिए डायरी लिखना वास्तव में एक विचित्र अनुभव है । न केवल इस कारण कि मैंने इससे पहले कभी कुछ भी नहीं लिखा है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि बाद में चलकर स्कूल में पढ़ने वाली एक तेरह वर्षीय बालिका के चिंतन में न तो मेरी न ही किसी और की दिलचस्पी होगी । खैर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । मैं लिखना पसंद करती हूँ और इससे भी बढ़कर मुझे इस बात की आवश्यकता अधिक है कि मैं अपने सीने से हर तरह की बात निकाल दूँ ।” अने ने ये भी कहीं पढ़ा था कि “कागज़ में मनुष्यों से ज्यादा धैर्य होता है ।”
अने अपने परिवार की और दोस्तों की लाड़ली है और जीवन में प्रसन्न रहने के लिए जो भी साधन चाहिए उससे संपन्न है । वह जिज्ञासु और चुलबुली भी है और सबके आकर्षण का केंद्र बने रहना चाहती है ।
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-45) के उस दौर में जब जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया तो इंग्लैंड और फ्रांस ने जर्मनी से युद्ध की घोषणा की, तभी से यहूदियों पर तरह-तरह के अत्याचार शुरू होते हैं । उन्हें यातना शिविरों में भेजा जाने लगा और जीवन जीने की बस न्यूनतम सुविधाएँ ही मुहैया करायी जा रही थीं । उन पर तरह-तरह के जुल्म ढहाए जा रहे थे और यातनाएं दी जा रही थीं । अपने 9 अक्टूबर 1942 की प्रविष्टि में अने लिखती है कि-
“हमारे अनेक यहूदी मित्र और परिचित लोगों को झुंडो में ले जाया जा रहा है । गेस्टापो उनसे बहुत ख़राब तरीके से पेश आ रही है । यदि हालैंड में इतना बुरा हाल है तो उन दूर-दराज के और असभ्य इलाकों का क्या होगा जहाँ जर्मन इन्हें भेज रहे हैं ? हमें लगता है कि इनमें से अधिकाँश लोग क़त्ल कर दिए जाते हैं । अंग्रेजी रेडिओ कहता है कि इन्हें गैस में डाल दिया जा रहा है । शायद मारने का सबसे शीघ्र तरीका है ।”
अने के परिवार को भी एक अन्य परिवार के साथ एक गुप्त स्थान पर रहना पड़ता है । यह आठ लोगों का समूह है जिसमें अने भी है । ये सभी साथ रहते हैं और हंसी ख़ुशी, मन मुटाव, लड़ते झगड़ते और हर पल आने वाले खतरे से बाखबर कैसे अपने दिन बिताते हैं ये अने ने अपनी डायरी में विस्तार से लिखा है । इसमें अने ने अपनी किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलावों के अनुभवों को भी क्रमवार लिखा है ।
शुरू के पन्नों में जहाँ उसकी डायरी में तमाम मासूमियत से भरी बातें लिखी हैं वहीँ जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं वह अपने लेखन को लेकर गंभीर भी होती जाती है और भविष्य में उसे किताब के रूप में छपवाना भी चाहती है । अपने आपको और अपनी परिस्थितियों को अने ने इतने जीवंत रूप में लिखा है कि पढ़ते हुए पाठक स्वयं को उसी कोठरी में उसके आसपास के लोगों के बीच घुटता हुआ पाता है जहाँ कोई भी आवाज करना मना है । दिन भर बिल्डिंग से गुजरते हवाई जहाजों की बमबारी में कभी भी सब कुछ ध्वस्त हो जाने का खतरा मंडरा रहा है और गोलियों की आवाजें दिन-रात सोने नहीं देती हैं । खाने के लिए भोजन बहुत अल्प मात्रा में है, वो भी आलू या मांस के साथ ब्रेड मक्खन और चेरी या कभी-कभार किसी अवसर विशेष पर केक ।
अने ने कई बार अपने साथ के लोगों के बारे में ही नही अपने माता-पिता के स्वभाव से आहत हो कर उनके बारे में भी बहुत निर्मम टिप्पणियाँ इस डायरी में की है । साथी फान डान परिवार के लड़के पीटर को लेकर बचपन से ही उसके मन में कोमल भावनाएँ हैं जिन्हें वो अपने पिता से भी नहीं छिपाती । हाँ माँ से उसकी बिल्कुल नहीं बनती क्योंकि हर किशोर होती लड़की की तरह उसे भी माँ दुश्मन ही लगती है ।
इतने सब के बावजूद जो हतप्रभ करने और यातना देने की बात है वह है उसकी जीवन को लेकर सकारात्मकता और भविष्य के सपनों के बीच हर पल जीवन के लिए संघर्ष की कुरूपता । एक सनक भरी इच्छा के चलते जर्मनी में रहने वाले यहूदियों के लिए जिंदगी दिनों- दिन बदतर होती जा रही थी लेकिन अने का बालमन कहीं-न-कहीं उम्मीद से भरा है कि एक दिन सब अच्छा हो जायेगा और वे सब अपनी पहले जैसी सामान्य जिंदगी जियेंगे । एक किशोरी ने, जो जीना चाहती है, एक लेखिका बनने के सपने संजोती है दुनिया में हो रही उथल- पुथल और अपनी कशमकश भरी जिंदगी के बारे में इस डायरी में पूरी ईमानदारी से लिखा है ।
अने की डायरी में आखिरी प्रविष्टि 1 अगस्त 1944 की है । 4 अगस्त 1944 को वहां रहने वाले आठों लोगों (अने समेत ) और उनकी सहायता कर रहे दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया । उन्हें पहले एम्स्टर्डम की एक जेल में, फिर हालैंड के उत्तर में यहूदियों के एक शिविर में भेज दिया गया जहाँ मिस्टर फान डान को गैस देकर मार दिया गया । मिसेज फान डान किसी यातना शिविर में और पीटर की मृत्यु आस्ट्रिया की मृत्युदौड़ में जबरन शामिल किये जाने से हुई ।
अने की माँ एक यातना शिविर में थकान और भूख से तथा अने और उसकी बहन की मृत्यु मार्च 1945 के आरम्भ में महामारी फ़ैलने से उसके 16वें जन्मदिन से ठीक तीन महीने पहले हुई । एक मात्र बचे अने के पिता को बाद में अने की डायरी मिली जिन्होंने उसके सपने को पूरा करने के लिए इसका प्रकाशन कराया कि उनकी बेटी का सन्देश सारे संसार में फैले ।

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