बक्सर की सीट पर सब इंस्पेक्टर से रॉबिनहुड डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को मात खानी पड़ी

आखिर ये तय हो गया कि वीआरएस लेकर राजनीति के मैदान में उतरे बिहार पुलिस के डीजीपी और नीतीश कुमार के प्रिय अधिकारीयों में से एक गुप्तेश्वर पांडेय इस बार बिहार विधानसभा चुनाव के अखाड़े में अपनी किस्मत नहीं आजमा रहे. गुप्तेश्वर पांडेय की राजनीतिक महत्वाकांक्षा रही है. इससे पहले भी वे वीआरएस लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाने उतरे थे, उस समय वे भाजपा से टिकट तलाश रहे थे. पर टिकट नहीं मिला. फिर फिर से नौकरी में आ गए. बिहार सरकार ने वीआरएस वापस लेने का उनका आवेदन स्वीकार कर लिया और वे इस तरह से बिहार पुलिस के सर्वोच्च पदाधिकारी बन गए.

इस बार अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नीतीश कुमार के गुडबुक में बने रहने के लिए कई ऐसे काम किये जो प्रोफेशनल नहीं कहे जा सकते. उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत सुसाइड केस को इस तरह से प्रचारित किया मानो उसकी ह्त्या हुई हो. भावनाओं का ज्वार खड़ा किया. टीवी स्क्रीन के सामने विधवा विलाप किया, सुशांत सिंह की गर्ल फ्रेंड रिया चक्रवर्ती को उसकी ‘औकात’ बतायी. और इस तरह से उन्होंने मीडिया में अपने आप को प्रोजेक्ट किया. अब एम्स के ये कह देने पर कि सुशांत सिंह की हत्या नहीं हुई, बल्कि उन्होंने आत्महत्या की थी, डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का खेल सामने आ गया है.

आपको याद होगा कि गुप्तेश्वर पांडेय से सीबीआई ने नवरुणा काण्ड में पूछताछ की थी. बिहार की विधि व्यवस्था पर चुप्पी लगाकर दूसरे प्रदेश के मामले में हुंकार भरने वाले गुप्तेश्वर पांडेय इस बार राजनीति के मैदान में सब इंस्पेक्टर से मात खा चुके हैं. गुप्तेश्वर पांडेय और परशुराम चतुर्वेदी में काफी समानताएं है. दोनों ने राजनीति में आने के लिए पुलिस महकमे से वीआरएस लिया, दोनों ब्राह्मण हैं और दोनों का गृह जिला बक्सर है.सब-इंस्पेक्टर के पद से वीआरएस लेने के बाद परशुराम चतुर्वेदी बीजेपी से जुड़े और गुप्तेश्वर पांडेय ने जदयू का दामन थामा.

राजनीतिक महत्वाकांक्षा की वजह से गुप्तेश्वर पांडेय ने बिहार चुनाव की घोषणा से ठीक पहले 22 सितंबर को वीआरएस लिया तो उनके बक्सर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के कयास लगने लगे. वीआरएस लेने से पहले उन्होंने जदयू के बक्सर यूनिट के अध्यक्ष से बंद कमरे में लंबी चर्चा की थी.

इसके बाद परशुराम चतुर्वेदी एक्टिव हुए और उन्होंने भी पटना की ‘परिक्रमा’ शुरू कर दी. चतुर्वेदी ने 2008 में ही वीआरएस ले लिया था. फिलहाल वह भाजपा किसान मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य है. इसके अलावा चतुर्वेदी के पिता जगत लाल चतुर्वेदी कांग्रेस से चार बार विधायक रह चुके हैं और उन्हें केंद्रीय मंत्री व स्थानीय सांसद अश्वनि कुमार चौबे का भी आशीर्वाद प्राप्त था. उन्हें इसका फायदा मिला. इसके अलावा एक और बात जो उनके पक्ष में गयी, वो ये कि बक्सर भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है. सुखदा पांडेय वर्ष 2000 से वहां से तीन बार विधाय़क बन चुकी हैं. पिछले विधानसभा चुनाव बीजेपी ने यह सीट कांग्रेस के हाथों गंवा दी थी. इस बार भाजपा और जदयू के एक साथ आ जाने के कारण इस बात की प्रबल संभावना थी कि एनडीए में सीटों के बंटवारे में यह सीट भाजपा के खाते में जाएगी और 6 अक्टूबर को हुआ भी यही. इसके बाद भी गुप्तेश्वर पांडेय बक्सर सीट पाने की जुगाड़ में लगे रहे, लेकिन 7 अक्टूबर को बीजेपी ने यहां से परशुराम चतुर्वेदी को उम्मीदवार बनाकर उनकी उम्मीदों पर तुषारापात कर दिया।

गुप्तेश्वर पांडेय को उम्मीद थी कि अगर बक्सर बीजेपी को मिल भी गई तो इसी जिले की बगल की सीट शाहपुर से वह मैदान में उतर जाएंगे, लेकिन यह सीट भी भाजपा के पास चली गई. जदयू को बक्सर जिले में दो सीटें डुमरांव और राजपुर (सुरक्षित) मिली. जदयू ने डुमरांव सीट पर अंजुम आरा को अपने प्रत्याशी के तौर पर उतारा है.

गुप्तेश्वर पांडेय का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा, इस पर राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं.


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