बिहार विधानसभा चुनाव 2020: बिक्रम विधानसभा से क्या सिद्धार्थ सिंह अपनी सफलता दोहरा पाएंगे?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

पाटलिपुत्र लोक सभा क्षेत्र में बहुचर्चित बिक्रम विधान सभा सीट आता है. इस ग्रामीण लोक सभा क्षेत्र में अन्य विधानसभा सीट हैं- दानापुर, मनेर, फुलवारी, मसौढ़ी और पालीगंज. बिक्रम विधानसभा सीट में नौबतपुर, बिक्रम ब्लॉक के अलावा बिहटा ब्लॉक के कौड़िया, बिंदौल, कुंजवा, मच्छलपुर लाइ, सैदाबाद, वज़ीरपुर, नाघर, यमुनापुर और तारानगर पंचायत आते हैं. तीन लाख से ऊपर मतदाता वाले विधानसभा क्षेत्र में लगभग 1 लाख 58 हज़ार पुरुष मतदाता और 1 लाख 47 हज़ार महिला मतदाता हैं.

बिहटा विधानसभा से अलग होकर1957 में स्वतंत्र अस्तित्व में आने के बाद बिक्रम विधानसभा क्षेत्र की पहली महिला विधायक मनोरमा देवी चुनी गईं। वो 1957 और 1962 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर विजयी हुई थी। 1967 में कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार महावीर गोप यादव ने जीत हासिल की. लेकिन १९६९ में पहली बार कांग्रेस की जीत का सिलसिला टूटा जब भारतीय क्रांति दल ( 1967 में चरण सिंह के द्वारा गठित, 1977 चुनाव के बाद पार्टी का विलय जनता पार्टी में हो गया) के उम्मीदवार खदेरन सिंह इस सीट से चुने गए. 1972 में खदेरन सिंह फिर लौटे, इस बार कांग्रेस ओ के टिकट पर. 1977 में जनता पार्टी की लहर से बिक्रम विधानसभा सीट भी अछूता नहीं रहा और जनता पार्टी के उम्मीदवार कैलाशपति मिश्रा को यहाँ से जीत हासिल हुई. कैलाशपति मिश्रा आगे चलकर बिहार भाजपा के भीष्म पितामह कहलाये.

1980 से 1995 तक लगातार चार चुनाव में यहाँ से सीपीआई के उम्मीवार को जीत हासिल हुई. 2000 में फिर से हवा बदली. इस बार भाजपा के राम जनम शर्मा विजयी हुई. 2005 और 2010 में भाजपा के अनिल कुमार ने जीत हासिल की. 2015 में जदयू, राजद और कांग्रेस का महागठबंधन भाजपा उम्मीदवार के लिए भारी पड़ा. और 2010 में लोजपा से चुनाव लड़ चुके सिद्धार्थ सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर बाजी मारी. बीजेपी के अनिल कुमार दूसरे स्थान पर रहे, माले उम्मीदवार तीसरे स्थान पर छिटक गए.

तीन लाख से अधिक मतदाताओं में एक चौथाई से अधिक करीब 1.10 लाख भूमिहार मतदाता हैं. इन पर दोनों गठबंधनों की नजर है. साथ ही क्षेत्र में करीब 75,000 की आबादी यादव, 16,000 वैश्य, 16,000 अल्पसंख्यक व करीब 40,000 आबादी महादलितों वोटरों की है.

पटना से सटे बिक्रम विधानसभा की समस्यायों की बात करें तो 17 वर्षों से बिक्रम को ट्राॅमा सेंटर का इंतजार है. ट्राॅमा सेंटर करीब 17 वर्षों से बन कर तैयार है, किंतु अभी तक चालू नहीं हो सका. वहीं, बिक्रम बाजार स्थित लगभग तीन एकड़ में फैला डाकबंगला जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है. बिक्रम का गांधी आश्रम, जहां गांधी जी तीन बार आये, उसे भी अभी तक पर्यटन स्थल नहीं बनाया जा सका.

हालाँकि चुनावी अखाड़े में  तमाम दलीय व निर्दलीय उम्मीदवार हैं, पर मुख्य मुकाबला महागठबंधन की तरफ से कांग्रेस के उम्मीदवार सिद्धार्थ सिंह और एनडीए की तरफ से भाजपा उम्मीदवार अतुल सिंह के बीच है. दोनों भूमिहार जाति से आते हैं, और भाजपा नेता अनिल कुमार के टिकट के दावे को दरकिनार करके यूथ विंग के अध्यक्ष अतुल सिंह को टिकट दिया गया है.
बिक्रम विधान सभा क्षेत्र में पहले चरण में चुनाव होना है, जहाँ सिद्धार्थ सिंह को राजद और माले के पारम्परिक वोटों के अलावा भूमिहार जाति के वोटों का आसरा है, वहीँ अतुल सिंह नीतीश कुमार के सुशासन की छवि और नरेंद्र मोदी की इमेज के आधार पर वोटरों को साधने का प्रयास करेंगे.

 


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.