क्या चिराग पासवान को उपेंद्र कुशवाहा की तरह नीतीश की नाराज़गी भारी पड़ने वाली है?

Balendushekhar Mangalmurty 

क्या खेल का पटाक्षेप समय से पहले हो गया? क्या लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उन्हें भारी पड़ी? क्या पिता की तरह सत्ता की चाभी अपने कानों में रखने की चाह उन्हें ले डूबने वाली है? क्या नीतीश कुमार के साथ गेम करना भाजपा को दुधारी तलवार पर चलना लग रहा था? क्या चिराग पासवान को उपेंद्र कुशवाहा की तरह नीतीश की नाराज़गी भारी पड़ने वाली है? क्या चिराग पिता के देहांत के बाद खाली हुए शून्य को भरने में असफल होंगे?
कई तरह के सवाल हैं जो उठने लगे हैं हालिया राजनीतिक डेवलपमेंट्स के चलते.

पहले नीतीश कुमार के सामने परेशानी आयी जब लोजपा एनडीए से बाहर निकल गया और फिर चिराग पासवान ने 143 सीटों पर लड़ने की घोषणा कर दी और एनडीए के घटक जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ 7 निश्चय जो कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजना रही है, में भ्रष्टाचार के खिलाफ, Covid 19 के दौरान समस्यायों से निपटने से बिहार प्रशासन की तथाकथित अक्षमता को लेकर नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. इसके बाद भाजपा के कई वरीय नेता जिसमे राजेंद्र सिंह, उषा विद्यार्थी, रामेश्वर चौरसिया आदि शामिल थे, लोजपा में शामिल होने लगे. इन्हे लोजपा ने जदयू के खिलाफ मैदान में उतार दिया. इस दौरान चिराग पासवान एनडीए के दूसरे घटक भाजपा के खिलाफ शांत रहे, और लगातार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ़ करते रहे. और पर्याप्त विधायक चुनकर आने की स्थिति में भाजपा के साथ मिलकर प्रदेश में लोजपा-भाजपा सरकार बनाने की बात करते रहे. जाहिर है, ये ऐसा गेमप्लान था, जो बिहार में सभी को दिख रहा था. इस गेमप्लान को समझने के लिए किसी चाणक्य की बुद्धि की जरुरत नहीं थी. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी ने प्रेस कांफ्रेंस में चिराग पासवान से सवाल भी किया कि लोजपा बताये उन्हें दलितों के लिए किये गए नीतीश कुमार के किस कल्याणकारी योजना से दिक्कत है. राजनीतिक विश्लेषकों को लग रहा था कि चिराग पासवान की इतनी महत्वाकांक्षा के पीछे भाजपा नेतृत्व का हाथ है. जब से यानि 2005 से प्रदेश में भाजपा और जदयू ने मिलकर सरकार बनायी है, तो भाजपा राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होते हुए भी बिहार सरकार में जूनियर पार्टनर बनी रही और नीतीश कुमार इस सरकार का चेहरा बने रहे. अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने के लिए भाजपा ने कई कदम भी उठाये. प्रदेश में राजद के माय समीकरण में सेंध लगाने के लिए यादवो को साधने के प्रयास के तहत भूपेंद्र यादव को प्रदेश का प्रभारी बनाया, उससे पहले उजियारपुर लोकसभा के सांसद नित्यानंद राय को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया और केंद्र सरकार में होम मिनिस्ट्री में डिप्टी मिनिस्टर बनाया. समय समय पर भाजपा के अंदर से कई नेताओं ने ये आवाज उठायी कि अगला मुख्यमंत्री भाजपा से हो. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों को चिराग के वक्तव्य और उठाये गए कदम के पीछे भाजपा की शय नज़र आ रही थी.

ये तमाम राजनीतिक डेवलपमेंट्स जाहिर है, नीतीश कुमार को नागवार गुजर रहे थे. राजनीति के पक्के खिलाड़ी नीतीश कुमार की नज़रों से भाजपा और लोजपा का गेम छुपा हुआ नहीं था. प्रदेश में नीतीश कुमार की बराबरी का कोई सशक्त चेहरा नहीं होने के चलते नरेंद्र मोदी के चेहरे पर भर विधानसभा चुनाव लड़ने को मज़बूर भाजपा को जल्द समझ आ गया कि वो आग से खेल रही है. ऐसे में उसने चिराग पासवान को नरेंद्र मोदी, भाजपा का सिम्बल आदि इस्तेमाल करने से रोकने की हिदायत देनी शुरू की. पिता रामबिलास पासवान के देहांत के बाद अपने पिता के उत्तराधिकारी चिराग पासवान के लिए पिता के रिक्त स्थान को भरना एक बहुत बड़ा चैलेंज बनता जा रहा है. सवाल है क्या वे पिता की तरह अपनी राजनीतिक योजनाओं में सिद्धहस्त हो सकेंगे? क्या पासवान वोट के अलावा वे अन्य जातियों के वोट को साध सकेंगे?

हालिया डेवलपमेंट्स इसकी तस्दीक नहीं करते. भाजपा ने हाल में भागलपुर में रोहित पांडेय को अपना उम्मीदवार बनाया, अब लोजपा ने अलिखित समझौता तोड़ते हुए इसी सीट पर डिप्टी मेयर राजेश वर्मा को बतौर अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है.

राजेश वर्मा ने जुलाई में लोजपा की सदस्यता ग्रहण की थी. इससे पहले वैशाली के लालगंज और पूर्वी चम्पारण के गोविंदगंज सीट पर भाजपा ने लोजपा के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे. समस्तीपुर जिले की रोसरा विधानसभा सीट पर भी लोजपा ने भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. इस सीट पर चिराग पासवान के चचेरे भाई कृष्ण राज को टिकट दिया गया है. कृष्ण राज 15 अक्टूबर को नामांकन करेंगे.

कुल मिलाकर लोजपा के गेमप्लान में भाजपा लोजपा का साथ छोड़कर नीतीश कुमार का साथ देती नज़र आ रही है. ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा का उदाहरण याद आ रहा है, जिनकी अधिक सीटों की मांग और कुशवाहा वोट पर एकाधिकार के दावे ने उन्हें नीतीश की नाराज़गी झेलने पर मज़बूर कर दिया था. फिर एनडीए से निकलकर वे महागठबंधन में चले गए. वहां भी उनकी दाल नहीं गलने पर वे आज ओवैसी के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं. फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक भविष्य पर अँधेरा छाता दिख रहा है.
ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि क्या बिहार में राजनीति में सीधे सीधे नीतीश कुमार का विरोध चिराग पासवान को भारी पड़ने वाला है? क्या अपने पिता की तरह बिहार में सरकार गठन की चाभी अपने कानों पर रखने की चाह आने वाले समय में चिराग पासवान की राह मुश्किल करने वाली है?
सवाल कई हैं. इनका जवाब बिहार की जनता 10 नवम्बर को दे देगी अपना मुख्यमंत्री चुनकर.


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