फुलवारीशरीफ विधानसभा जहाँ से दल बदलने के बाद भी श्याम रजक को टिकट नहीं मिला

Balendushekhar Mangalmurty

पटना जिले और पाटलिपुत्र लोक सभा क्षेत्र में स्थित फुलवारी शरीफ विधानसभा सीट को इस बार नया विधायक मिलने वाला है. कारण, टिकट की आस में जदयू छोड़कर राजद में आये श्याम रजक को सीट बंटवारे में उम्मीदवारी नहीं मिली. चूँकि ये सीट माले को चला गया और अब महागठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर गोपाल रविदास को खड़ा किया गया है. जबकि जदयू ने इस बार अरुण मांझी को अपना उम्मीदवार बनाया है. अरुण मांझी इससे पहले 2010 में मसौढ़ी विधानसभा सीट से जीत चुके थे और जदयू में उभरते हुए दलित चेहरे थे. महादलित आयोग के अध्यक्ष रह चुके अरुण मांझी 2015 के विधानसभा चुनाव में मसौढ़ी से अपनी सीट गंवा बैठे जब जदयू, राजद और कांग्रेस के नए राजनीतिक समीकरण में राजद की रेखा देवी को अरुण मांझी की जगह टिकट मिल गया. रेखा देवी ने हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा की उम्मीदवार रेखा पासवान को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया. . 5 साल के बनवास के बाद वे विधानसभा में वापसी के लिए कमर कसे हुए हैं. पार्टी में श्याम रजक के ऊपर अरुण मांझी को तरजीह दिए जाने के विरोध में श्याम रजक ने जदयू छोड़ा. और अपनी पुरानी पार्टी को ज्वाइन करने के बाद जदयू और नीतीश कुमार पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हुए जमकर हमला बोला. पर लगता है श्याम रजक की राजनीति का सुनहरा दौर पीछे छूट चुका है. तभी  1995 से लगातार विधायक रहने के बाद भी राजद ने इस सीट के लिए श्याम रजक के पक्ष में जोर नहीं लगाया और अमूमन तीसरे नंबर पर आने वाली पार्टी माले को अपना समर्थन देना तय किया. इसके पीछे एक वजह साफ़ है, आने वाले लोकसभा चुनाव में राजद अपने उम्मीदवार के लिए माले समेत तमाम वामपंथी दलों का समर्थन चाहती है. फुलवारी शरीफ विधानसभा सीट में फुलवारी शरीफ और पुनपुन प्रखंड आते हैं. 2015 में यहाँ से श्याम रजक (94,094 वोट) चुने गए थे. उन्होंने हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के राजेश्वर मांझी (48, 381 वोट) को हराया था. जबकि माले उम्मीदवार जयप्रकाश पासवान ( 11 188 वोटों के साथ) तीसरे स्थान पर आये थे. 2010 में श्याम रजक ने राजद के उदय कुमार को पटखनी दी थी.

हालाँकि टिकट न मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए श्याम रजक ने कहा, हालांकि उन्होंने कहा कि पार्टी द्वारा टिकट नहीं दिये जाने से न तो वह परेशान हैं और न ही नाराज हैं. उन्होंने कहा कि अगर पार्टी (राजद) नेतृत्व चाहेगा तो वह पार्टी के लिये चुनाव प्रचार करेंगे. रजक ने कहा, ‘‘ मैं न तो टिकट पाने की इच्छा से राजद में शामिल हुआ था और न ही किसी से टिकट मांगी थी और न ही शामिल होने के समय में कोई आश्वासन दिया गया था.

श्याम रजक की राजनीति की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर दलितों को एकजुट करने के लिए भी श्याम रजक ने एक अलग संगठन बनाया है. श्याम रजक अखिल भारतीय धोबी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. जेडीयू में रहते हुए श्याम रजक गुजरात के जिग्नेश मेवाणी के साथ मुलाकात कर अपने इस एजेंडे के विस्तार पर काम करने की कोशिश में जुटे हैं. श्याम रजक यूपी, एमपी और राजस्थान के दलित नेताओं से भी नजदीकी बढ़ाने की कोशिश में जुटे रहे हैं. माना जाता है कि जीतन राम मांझी की तरह ही श्याम रजक भी महादलितों को लेकर एक अलग किस्म की राजनीति एजेंडा सेट करने की कवायद में है.

श्याम रजक की गिनती कभी लालू यादव के सबसे करीबी नेताओं में होती थी. उन्हें लालू का खास कहा जाता था और उनके साथ रामकृपाल यादव की जोड़ी लालू के राम-श्याम के रूप में प्रचलित थी. वक्त और सियासत के चलते श्याम रजक आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का साथ छोड़कर नीतीश कुमार के करीब आ गए थे. श्याम रजक 2009 में जेडीयू में शामिल हुए थे. श्याम रजक 2010 में जेडीयू के कोटे से विधायक चुने गए और नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. इसके बाद 2015 में महागठबंधन से विधायक तो बने लेकिन मंत्री पद नहीं मिला. हालांकि, महागठबंधन का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद नीतीश कुमार ने श्याम रजक को अपनी कैबिनेट में जगह दी थी.

22 जुलाई 1954 को जन्‍मे श्‍याम रजक का लंबा राजनीतिक सफर है. छात्र राजनीति से श्याम रजक ने अपना सियासी सफर शुरू किया था और 1974 में हुए जेपी आंदोलन में भी श्‍याम रजक ने भाग लिया था. आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाते हुए वो जेल भी गए थे. श्याम रजक पहली बार राजद के टिकट पर 1995 में विधायक बने थे. इसके बाद उन्होंने कभी सियासत में पलटकर नहीं देखा और आगे बढ़ते गए. 1995 के बाद 2000, फरवरी 2005 और नवंबर 2005 में राजद से विधायक बने. इस दौरान लालू यादव से लेकर राबड़ी देवी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे, लेकिन 2010 के चुनाव से एक साल पहले उन्होंने जदयू का दामन थाम लिया. 2010 और 2015 के चुनाव में जदयू प्रत्याशी के तौर पर विधायक बने. श्याम रजक अखिल भारतीय धोबी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और बिहार विधानसभा में फुलवारी शरीफ सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं. सामाजिक कार्यों में श्‍याम रजक की काफी रुचि है. साउथ अफ्रिकन इंटरनेशन ट्रेड एक्जीबिशन में भाग लेने हेतु दक्षिण अफ्रीका का भ्रमण करने वाले श्‍याम रजक ने पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के नेतृत्व में कन्याकुमारी से दिल्ली तक पदयात्रा की थी. इसी तरह, श्याम रजक ने पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ अमृतसर से दिल्ली तक पदयात्रा की थी. वहीं, ओडिशा के कालाहांडी में भूख से मरने के कारण वहां भी पदयात्रा कर इन्‍होंने सहायता कार्य में मुख्‍य भूमिका निभाई.

फुलवारी शरीफ विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिमों और दलितों/ महादलितों की अच्छी खासी संख्या है. दलित/ महादलित वोटों के बिखराव की वजह से मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. पटना की फुलवारी शरीफ में बिहार का मुस्लिम संगठन इमारत-ए-शरिया का दफ्तर हैं. खानकाह-ए-मुजिबिया भी है, जहां के सर्वेसर्वा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना वली रहमानी हैं. इस वजह से यहां बिहार के बड़े-बड़े मुस्लिम नेताओं और धर्म गुरुओं का आना जाना लगा रहता है. इस बार भाजपा के साथ होने की वजह से अरुण मांझी भाजपा के कोर वोटर्स के समर्थन की उम्मीद करेंगे. पर राजद, कांग्रेस और माले के कोर वोटर्स के एक जुट होने से इस बार कुछ अलग परिणाम भी आ जाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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