यात्रा-वृत्तांत: श्री जगन्नाथ धाम पुरी

भारती पाठक
हालांकि यात्रा के लिए धार्मिक स्थल का चुनाव भले ही बहुत ही आत्मिक तोष देने वाला हो लेकिन यात्रा की कसौटियों पर कोई बहुत सुखद स्थिति तो नहीं क्योंकि मंदिरों में भीड़ और लम्बी लाइनों का ध्यान आते ही घबराहट होने लगती है । यात्रा तो मुक्ति और स्वच्छंदता का पर्व हैं । लेकिन कहते हैं न कि ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा’ ।
हुआ यूँ कि धार्मिक स्थलों के भ्रमण के शौकीन पतिदेव पुरी जाने की तैयारी कर रहे थे और मुझसे पूछ लिया कि चलना हो तो कहो तुम्हारा टिकट भी कर लूँ ।  हाँ कर दिया मैंने और बन गयी जाने की योजना । ट्रेन मुगलसराय जक्शन से थी तो हम एक दिन पहले ही बनारस पहुँच गए ।  शाम में दशाश्वमेध घाट पर आरती देखी, सुबह गंगा स्नान किया । अगले दिन हम 11 बजे स्टेशन पहुंचे लेकिन कुहरे के चलते लेट होती गयी ट्रेन शाम 6 बजे आई । अगले दिन सुबह 9 बजे हम पुरी पहुँच गए ।
पुरी उड़ीसा राज्य का विश्व प्रसिद्ध नगर है जो भारत के चार पवित्रतम स्थानों ( चार धाम ) में से एक है । यह भगवान् जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पवित्र नगरी है ।  पुरी भारत के सभी बड़े शहरों से रेल व बस यातायात से जुड़ा है । यहाँ का निकटतम एअरपोर्ट भुवनेश्वर में है जो कि यहाँ से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । भुवनेश्वर उड़ीसा राज्य की राजधानी भी है तो उस लिहाज से एक व्यवस्थित और दर्शनीय शहर है । पुरी रेलवे स्टेशन खासा बड़ा, कलात्मक और साफ़ सुथरा था । बाहर पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पूछताछ केंद्र और पर्यटन विभाग का कार्यालय भी था जहाँ से शहर में रुकने और घूमने से सम्बंधित किसी भी तरह की जानकारी आसानी से उपलब्ध थी । चूंकि ये एक प्रमुख धर्मिक पर्यटन स्थल है तो लोकल गाइड भी बहुत मिल जाते हैं स्टेशन के बाहर ही जो आपके रहने और घुमाने की व्यवस्था कुछ शुल्क लेकर कर देते हैं । उन्हें आप अपनी समझदारी और बजट के हिसाब से चुन सकते हैं । हमारे साथ एक साथी थे जो पहले भी कई बार पुरी आ चुके थे तो कोई खास दिक्कत नहीं हुयी और ऑटो करके हम स्वर्गद्वार के लिए निकले जहाँ अधिकतर होटल हैं ।
होटल पहले से बुक नहीं था तो इस यात्रा में थोडा समय होटल तलाशने में भी नष्ट हुआ । खैर देर आये लेकिन दुरुस्त आये, एक होटल मिल ही गया जो समुद्र के किनारे ही था, जहाँ से उसकी लहरों का गर्जन पूरे समय सुना जा सकता था और सच कहूँ तो ये बहुत ही रोमांचक अनुभव था ।  होटल ढूँढने से लेकर उसमें शिफ्ट होने तक दोपहर हो गई और भूख लग आई थी तो सबसे पहले नहा-धोकर नीचे रेस्टोरेंट में भोजन किया । थोड़ी देर कमरे में आकर आराम किया फिर घूमने निकल पड़े।
जगन्नाथ मंदिर
पुरी आने का प्रमुख उद्देश्य भगवान् जगन्नाथ के दर्शन करना ही था तो पहले वहीँ के लिए निकले ।  ऑटो वाले ने हमें मंदिर से 500 मीटर पहले उतारा क्योंकि वहां से आगे सवारियों का जाना मना था । यह एक काफी खुली जगह थी फोरलेन सड़क से भी थोड़ी ज्यादा चौड़ी जिसके दोनों तरफ कलात्मक स्थानीय क्राफ्ट की दुकानें थी और बीच में पैदल चलने का रास्ता ।   उस दिन देखा तो समझ आया कि कैसे रथ यात्रा के महत्त्व को ध्यान में रख कर ही मंदिर के आगे काफी खुली जगह रखी गयी है । ये दिसम्बर की 29 तारीख थी लेकिन मौसम बसंत जैसा ही था, अमूमन समुद्री किनारों वाले शहरों जैसा । काफी भीड़ थी वहां और वजह पूछने पर पता चला कि सालभर यहाँ ऐसी ही भीड़ रहती है ।
वैष्णव सम्प्रदाय का यह मंदिर भगवान् विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है । मंदिर का प्रांगण काफी बड़ा था । मुख्य द्वार के दाहिनी ओर प्रसाद घर बने थे जहाँ से दर्शनोपरान्त प्रसाद लिया जा सकता था । मंदिर का कुल क्षेत्र लगभग 37000 वर्गमीटर में फैला है । कलिंग शैली के मंदिर निर्माण की स्थापत्यकला के बेहतरीन उदाहरण इस मंदिर में शिल्प का अद्भुत प्रयोग किया गया है । यह भारत के भव्यतम स्मारकों में से एक है । वक्ररेखीय आकार के मुख्य मंदिर शिखर पर भगवान् विष्णु का सुदर्शन चक्र मंडित है जिसे ‘नीलचक्र’ भी कहते है । यह अष्टधातुओं से बना है । मुख्यद्वार पर ही सोलह किनारों वाला एक स्तम्भ है । मुख्य भवन लगभग 20 फुट ऊँची दीवार से घिरा है ।
दर्शन करते हुए हमने ध्यान से देखा तो उनकी भव्यता मानो उनसे आँखें हटाने से ही मना कर रही हों । भगवान् जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ मानो सजीव हो बोल पड़ने को थीं । वैसे तो यहाँ नियमित भव्य पूजा अर्चना होती है और कई वार्षिक त्यौहार भी होते है लेकिन रथ यात्रा सबसे अधिक प्रसिद्ध है जो कि अषाढ़ शुक्ल पक्ष की तृतीया को यानि जून या जुलाई में पड़ता है । इसमें तीन विशाल रथों पर इनकी ५ किलोमीटर लम्बी शोभा यात्रा निकाली जाती है । इसे देखने देश-विदेश के लाखों भक्त और पर्यटक आते हैं । इस मंदिर का एक बड़ा आकर्षण यहाँ की रसोई है जो भारत की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है । भगवान् का महाप्रसाद तैयार करने के लिए यहाँ 500 रसोइये और 300 सहायक एक साथ काम करते हैं । यहाँ बनाये जाने वाले 56 व्यंजन धार्मिक पुस्तकों के निर्देशानुसार बनाए जाते हैं जो पूरी तरह शाकाहारी और बिना लहसुन प्याज के होते हैं । इस भोग को मिटटी के पात्रों में बनाया जाता है । इसके लिए मिट्टी के सात पात्र एक के ऊपर एक रखते हैं और लकड़ी के चूल्हे पर पकाते हैं ।
खास बात यह है कि सबसे ऊपर वाले पात्र का भोजन सबसे पहले पकता हैं और सबसे नीचे वाले का सबसे बाद में । रसोई के पास ही दो कुएं हैं जिन्हें गंगा और जमुना कहा जाता है जिसके जल का प्रयोग भोज पकाने में किया जाता है । यह प्रक्रिया प्रतिदिन (365 दिन) अनवरत चलती है ।  मंदिर के शिखर पर मौजूद झंडा रोज बदला जाता है । यह झंडा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है ।  मंदिर से प्रसाद लेकर हम बाहर आये और मसाला चाय की खुशबू ने ध्यान आकर्षित किया तो जाहिर है बिना पिए नहीं रहा गया । टहलते हुए हम ऑटो स्टैंड तक आये और फिर वापस होटल ।
अगले दिन सुबह हमारी योजना भुवनेश्वर घूमने की थी सो जल्दी ही तैयार होकर नाश्ता किया और एक कार रिज़र्व करके निकल पड़े । हालांकि भुवनेश्वर के लिए राज्य परिवहन की बस के अलावा भुवनेशवर दर्शन की ए सी और नॉन ए सी बसें भी निश्चित समय पर चलती हैं जो घुमा-फिरा कर शाम तक वापस पुरी छोड़ देती हैं जिसका किराया क्रमशः 400 और 250 रुपये प्रति व्यक्ति है ।
हम समूह में थे और साथ में बच्चे तो वाहन रिज़र्व कर के जाना ज्यादा सुविधाजनक था । भुवनेश्वर को मंदिरों का शहर भी कहते हैं तो सबसे पहले हम कोणार्क पहुंचे । मंदिर से करीब 500 मीटर पहले से ही वाहनों का जाना मना है तो हम पैदल मंदिर तक गए जहाँ सड़क के दोनों ओर सजी तरह-तरह के क्राफ्ट की दुकानें लुभा रही थीं जिनमें हाथी दांत की बनी चूड़ियाँ, तरह-तरह की कलाकृतियां और मोतियों से बनी ज्वेलरी भी थी लेकिन पहले वो मंदिर देखना था जिसके लिए इतनी दूरी तय की ।
कोणार्क का सूर्य मंदिर
कोणार्क पुरी से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्रसिद्ध सूर्य मंदिर के रूप में जाना जाता है जो भारत के चुनिन्दा सूर्य मंदिरों में से है । सूर्य देव को समर्पित इस मंदिर से भी जुड़ी कई पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं । कहते हैं कि श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को उनके शाप से कुष्ठ रोग हो गया तो साम्ब ने यहीं कोणार्क के चंद्रभागा तट पर वर्षों तपस्या कर सूर्य देव को प्रसन्न किया । सूर्यदेव ने उन्हें रोग मुक्त किया तब साम्ब ने उसी चन्द्रभागा तट पर मिली सूर्य की मूर्ति को स्थापित किया । तब से यह स्थान इतना पवित्र माना जाने लगा । सामने लाल बलुआ पत्थरों और काले ग्रेनाइट से बेहतरीन नक्काशीदार मंदिर को देख कर हम भी दंग रह गए । कलिंग शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के राजा नृसिंह देव द्वारा कराया गया जिसे बारह सौ वास्तुकारों ने बारह वर्ष के अथक परिश्रम से तैयार किया । यहाँ सूर्यदेव रथ के रूप में विराजमान है जिसे बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुए निर्मित किया गया है । अब सात में से एक ही घोडा बचा है बाकी सभी धीरे धीरे नष्ट होते गए हालांकि अवशेष देखे जा सकते हैं । इसमें बने बारह चक्र (पहिये ) साल के बारह महीनों और उन चक्रों में आठ अर ( तीलियाँ ) दिन के आठों पहरों को दर्शाते हैं ।
स्थानीय लोग सूर्य देव को ‘बिरंची नारायण’ कहते हैं । मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है जिसके दो मंडप ढह चुके हैं, तीसरा मंडप जिसमें मूर्ति रखी हैंउसे भी अंगेजों ने मंदिर को बचाने के उद्देश्य से रेत भरवाकर स्थाई रूप से बंद करवा दिया । इसमें सूर्य देव की तीन मूर्तियाँ उदित सूर्य, मध्याह्न सूर्य और प्रौढ़ावस्था सूर्य हैं । घूम कर देखा तो पूरे मंदिर में जहाँ-तहां फूल पत्तियों और ज्यामितीय नमूनों की नक्काशी के साथ ही मानव, देव, गन्धर्व, किन्नर आदि की आकृतियाँ एन्द्रिक मुद्रओं में अंकित थी । इस मंदिर को यूनेस्को ने 1984 में विश्व धरोहर घोषित किया है । महाकवि श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस मंदिर के बारे में लिखा था कि “ कोणार्क, जहाँ पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से बेहतर है ।”
लिंगराज मंदिर
मंदिर अपनी कामुक मुद्राओ वाली शिल्प कृति के लिए भी जाना जाता है ।  वहां करीब एक घंटे रुक कर हम पैदल वापस स्टैंड तक आये जहाँ हमारी गाड़ी खड़ी थी, हाँ रास्ते में कुछ खरीदारी भी की जो दोस्तों को उपहार देने के काम आ सके । वहां से चल कर हम लिंगराज मंदिर पहुंचे जो कि भुवनेश्वर का प्रमुख मंदिर है । उड़िया शैली में दसवीं शताब्दी में बना यह विशाल मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है । मंदिर के शिखरों को मंदिर निर्माण कला के प्रारम्भिक अवस्था के शिखरों में गिना जाता है । ये शिखर नीचे तो समकोणीय थे किन्तु ऊपर पहुँच कर वक्र होते गए थे । भीतर परिसर में कई छोटे छोटे मंदिर भी थे जिनके पत्थरों पर कुछ न कुछ नक्काशी की गयी थी ।
धार्मिक कथानुसार ‘लिट्टी’ तथा ‘वसा’ नाम के दो भयंकर राक्षसों का वध देवी पार्वती देवी ने यहीं किया था जिसके बाद उन्हें प्यास लगी तो शिव जी ने कूप बना कर सभी पवित्र नदियों का आवाहन किया जिससे ‘बिंदुसागर सरोवर’ बना । कहते हैं इस सरोवर में भारत के प्रत्येक झरने तथा तालाब का जल संग्रहित है । इस मंदिर की पूजा का विधान है, पहले बिंदुसागर सरोवर में स्नान फिर गणेश पूजा, गोपालनी देवी पूजा, शिवजी के वाहन नंदी की पूजा, उसके बाद ही मुख्य मंदिर यानि लिंगराज के दर्शन व पूजा होती है । यहाँ आठ फीट मोटा और करीब एक फीट ऊँचा ग्रेनाइट पत्थर का शिवलिंग है । धार्मिक भाव के लोगों के अलावा कलाप्रेमियों के लिए भी ये जगह बेहद रुचिकर है ।
यहाँ दर्शन के बाद हम उदयगिरी और खंडगिरी की गुफाएं देखने गए ।
ये दो छोटी-छोटी पहाड़ियां थीं जो आमने-सामने थी । इनमें ऊपर जाने पर छोटे कमरों नुमा गुफाएं थी । गुफायें कुछ तो प्राकृतिक और कुछ आंशिक कृत्रिम रूप से बनी थीं । ये गुफाएं अजंता और एलोरा जितनी भव्य तो नहीं लेकिन इनका निर्माण सुन्दर ढंग से किया गया है और ये ऐतिहासिक महत्त्व की मानी जाती हैं । राजा खारवेल के शासन काल में इनका निर्माण विशाल शिलाखंडों से किया गया जिसका प्रयोग जैन साधु निर्वाण प्राप्ति की यात्रा के समय करते थे । उदयगिरी में 18 और खंडगिरी में 15 गुफाएं हैं । गुफा के द्वार इतने छोटे थे कि उनमे खड़ा नहीं हुआ जा सकता था । शायद उनका निर्माण बैठकर समाधि लगाने के उद्देश्य से ही हुआ हो ।
ये गुफायें निश्चित रूप से उड़ीसा में जैन और बौद्ध धर्म के प्रभाव को प्रदर्शित करती हैं । बारिश में गुफा में पानी न जाये इसलिए इनका निर्माण पहाड़ी के ऊपरी हिस्से पर हुआ है ।   इसके बाद हम नंदन कानन चिड़ियाघर देखने गए जो कि भारत का दूसरा सबसे बड़ा चिड़ियाघर होने के साथ ही सफ़ेद बाघ और मेलेनिस्टिक टाइगर ( दुर्लभ प्रजाति का काली धारियों वाला बाघ ) की ब्रीडिंग वाला दुनिया का पहला चिड़ियाघर है ।
इस चिड़ियाघर की स्थापना 29 दिसम्बर 1960 को हुई । यह देश का पहला चिड़ियाघर है जो “वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ़ जू एंड एक्वेरियम” का सदस्य है । यह उद्यान भुवनेश्वर से 20 किलोमीटर दूर चांदका के जंगलों के प्राकृतिक हिस्से में विकसित किया गया है । चिड़ियाघर में नौकायन और तरह-तरह के सफारी की भी सुविधा है लेकिन समय कम होने से हम बस घूम कर जानवरों को ही देख पाए जिसमें हाथियों का करतब देखना मजेदार था ।
चिड़ियाघर अक्टूबर से मार्च तक सुबह 8 से सायं 5 तक बाकी महीनों में सुबह 7:30 से शाम 5:30 तक खुल रहता है ।  शाम हो चली थी और हमें अभी चंद्रभागा बीच देखना था तो हम जल्दी ही वहां से निकले और वापसी की ओर चल दिए । चंद्रभागा बीच तक पहुंचते सूर्यास्त हो चला था और समुद्री किनारे से सूर्यास्त देखने वाले लोगों की काफी भीड़ थी । हमने भी उस अद्भुत नज़ारे को अपने कैमरे और नज़रों में कैद किया ।
होटल पहुंचते रात हो गयी थी और सर्द गर्म के प्रभाव से कुछ बुखार सा हो रहा था तो मैं कमरे में आ गयी और बाकी लोग खाना खाने चले गए । सुबह तक बुखार बढ़ गया था और दवा लेनी पड़ी । सुबह 6 बजे ही हम पैदल पुरी बीच तक गए जो पास ही था । 8 बजे वहां से आकर नाश्ता किया और सामान पैक किया । आज रात की वापसी की ट्रेन थी तो आज का दिन हमारे पास था जिसमें हमें चिल्का लेक देखने जाना था और वहीँ से सीधा रेलवे स्टेशन इसलिए होटल से चेकआउट करके सामान लेकर निकले, एक गाड़ी बुक की जो हमें पहले चिल्का लेक ले जाये और घुमाकर फिर स्टेशन छोड़ दे ।
चिल्का लेक
पुरी से चिल्का पहुँचने में करीब 2 घंटे लगे । पार्किंग काफी बड़ी थी लेकिन वहां ज्यादा भीड़ नहीं थी खाने-पीने की चीजों की कुछ गिनी चुनी छोटी दुकानें जिन पर चिप्स चाय और पानी आदि खरीद सकते थे ।
70 किलोमीटर लम्बी और 30 किलोमीटर चौड़ी समुद्री अप्रवाही जल से बनी यह झील एशिया की सबसे बड़ी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी समुद्री झील है । यह उड़ीसा के खास पर्यटन स्थलों में से एक है । यहाँ घूमने का सबसे सही समय नवम्बर से मार्च है लेकिन बाकी समय में भी पर्यटक आते रहते हैं, हालांकि बरसात में यहाँ आना अवॉयड करना चाहिए ।
यहाँ बोटिंग करने का अपना मज़ा है और खास कर इसीलिए.लोग आते भी है क्योंकि तट से तो यह एक ठहरी हुई नदी सी ही लगती है ।
हमने नाव रिजर्व की और निकल पड़े चिल्का की सुन्दरता देखने । सर्दियां थीं तो इस समय प्रवासी पक्षियों से झील अटी पड़ी थी । सुस्ती के चलते मैं तो थोड़ी जगह बनाकर नाव पर ही लेट गयी । गुनगुनी धूप अच्छी लग रही थी । झील के दूर-दूर तक फैले विस्तार ने मानो हमें सम्मोहित ही कर लिया था । नाव की करीब तीन घंटे की यात्रा में सब कुछ मंत्रमुग्ध करने वाला था जैसे डालफिन देखना और बीच में एक टापू पर रुक कर नंगे पाँव टहलना । टापू पर कुछ मछुवारे जैसे लोग भी थे जो सीपियों को आपके सामने ही फोड़कर मोती निकाल कर दिखाते भी है और बेचते भी है तो आप अपनी समझ से सोच विचार कर, असली-नकली का भेद जान कर ही खरीदें । पानी की सतह पर इस तीन घंटे की यात्रा में जो एक बात सबसे सिर दर्द वाली थी वो थी मोटरबोट के मोटर की आवाज जो आज भी कानों में फट-फट-फट-फट गूंजती महसूस होती है ।
एक और मजेदार बाद याद आई कि ऐसा न सोचें कि डालफिन आपको यहाँ-वहां दिख जायेंगी । उसके कुछ खास क्षेत्र हैं जहाँ दिखती है और ये बात नाव वाले जानते हैं तो सतर्क होकर बैठिये और बगुले की तरह ध्यान लगाइए क्योंकि वो अचानक से चिल्लाते हैं “वो रही डालफिन !” और अगर आपने ध्यान नहीं दिया दो सब ओझल । खैर ये जरूर हैं कि डालफिन दिख जायेगी इसमें शक नहीं । एक और जरूरी बात कि अपने साथ नाश्ते के लिए कुछ स्नैक्स और पानी जरूर रख लें नाव पर क्योंकि ये खारे पानी की झील है पूरे तीन घंटे खाने-पीने को कुछ नहीं मिलने वाला ।
झील से बाहर आते-आते हमें 4 बज गए थे और अभी हमें स्टेशन भी पहुँचना था तो फटाफट गाड़ी पर बैठे और निकल पड़े स्टेशन की ओर ।
ये कुछ खास जगहें थीं जो हमने पुरी और भुवनेश्वर में देखीं इसके अलावा भी कई छोटे बड़े मंदिर हैं जो निश्चित रूप से दर्शनीय हैं । पुरी के समुद्री किनारों का तो कहना ही क्या जहाँ अकेले घंटों गुजारे जा सकते है, खुद से बातें करते हुए ।

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