जमुई विधानसभा सीट पर निशानबाज़ श्रेयसी सिंह का निशाना कितना सटीक लगेगा?

Balendushekhar Mangalmurty

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में 29 वर्षीय चैंपियन शूटर श्रेयसी सिंह के चुनावी अखाड़े में उतरने के साथ जमुई विधान सभा सीट हॉट सीट हो चला है. जमुई लोक सभा से सांसद चिराग पासवान ने ट्वीट करके खुले तौर पर भाजपा उम्मीदवार श्रेयसी सिंह का समर्थन कर दिया है. वहीँ वर्तमान विधायक राजद नेता विजय प्रकाश भी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. 2015 में चुनाव जीतकर सरकार में श्रम संसाधन मंत्री रह चुके विजय प्रकाश के बड़े भाई जयप्रकाश नारायण यादव मुंगेर और बांका से सांसद के अलावा केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. 2015 में उन्होंने यहां दूसरी बार जीत हासिल की थी. विजय प्रकाश ने BJP के अजय प्रताप को 8,249 वोटों से हराया था. विजय प्रकाश पहली बार फरवरी 2005 में यहां से जीते थे.

भाजपा का सिम्बल श्रेयसी सिंह के हिस्से जाने के बाद पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह के पुत्र अजय प्रताप सिंह के रालोसपा के उम्मीदवार के के तौर पर उतर जाने के चलते मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय दिग्विजय सिंह और पूर्व सांसद पुतुल कुमारी की सुपुत्री श्रेयसी सिंह को राजनीति विरासत में मिली है और उन्होंने स्पोर्ट्स में अपनी अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनायी है. अर्जुन पुरस्कार विजेता श्रेयसी 2018 के राष्ट्र मंडल खेलों में वह स्वर्ण पदक और ग्लासगो में हुए 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में निशानेबाजी की डबल ट्रैप स्पर्धा में रजत पदक जीत चुकी हैं.

दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सफर

दिग्विजय सिंह का जन्म 14 नंवबर 1955 को बिहार के जमुई में सुरेंद्र सिंह के घर हुआ था. अपने माता-पिता के इकलौते बेटे, दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जेएनयू से की. 1990 में वह पहली बार राज्यसभा पहुंचे और इसके साथ ही 1990-91 में ही चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में वह मंत्री भी रहे. अपने 55 साल के जीवन में दिग्विजय सिंह 5 बार संसद सदस्य रहे. तीन बार लोकसभा (1998,1999,2009) और दो बार राज्यसभा (1990, 2004) के सदस्य. एनडीए के शासन काल में 1999-2004 के बीच दिग्विजय सिंह अटल बिहारी बाजपेयी मंत्रिमंडल में मंत्री भी रह चुके थे.

वह जार्ज फर्नाडिंस के करीबी रहे दिग्विजय सिंह को जब पार्टी ने 2009 में हुए 15वीं लोकसभा चुनाव के वक्त लोकसभा का टिकट नहीं दिया तो वे बांका से लोकसभा का निर्दलीय चुनाव लड़े और भारी मतों से विजयी हुए. नीतीश कुमार के विरोधी बन कर उभरे दिग्विजय सिंह के 2009 में असामयिक देहांत के बाद उनकी पत्नी पुतुल कुमारी सांसद बनीं, पर वे 2014 का लोकसभा चुनाव हार गयीं, 2019 में जब बांका सीट जदयू के खाते में चला गया तो पुतुल कुमारी ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया, जिसके चलते भाजपा ने उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया.

जमुई विधानसभा के इतिहास पर गौर करें तो अब तक सबसे अधिक 10 बार राजपूत नेताओं ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। विधानसभा अध्यक्ष रहे स्वर्गीय त्रिपुरारी प्रसाद इस क्षेत्र से चार बार विधायक चुने गए थे। सुशील कुमार सिंह ने लोजपा और जदयू से तीन बार क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। क्षेत्र की जनता ने सूबे के कद्दावर नेता नरेंद्र सिंह, उनके पुत्र स्वर्गीय अभय सिंह और अजय प्रताप सिंह को प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया. वर्त्तमान में अजय प्रताप सिंह और श्रेयसी सिंह जहाँ राजपूत जाति से आते हैं, वहीँ विजय प्रकाश यादव जाति से आते हैं.

जमुई विधानसभा सीट का  इतिहास
इस सीट पर सबसे पहला चुनाव 1957 में हुआ था. इस चुनाव में सीपीआई के भोला मांझी और कांग्रेस के हरी प्रसाद शर्मा जीते थे. इसके बाद 1962 के चुनाव में कांग्रेस के गुरु राम दास जीते. इसके बाद इस सीट से त्रिपुरारी प्रसाद सिंह चार बार लगातार विधायक रहे. वह 1967, 1969, 1972 और 1977 में लगातार जीते. 1980 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी हरदेव प्रसाद जीतने में कामयाब हुआ. 1985 और 1990 के चुनाव में कांग्रेस के सुशील कुमार सिंह जीते. 1995 में जनता दल का खाता खुला और अर्जुन मंडल जीते.

इसके बाद 2000 में हुए उपचुनाव में जेडीयू के टिकट पर सुशील कुमार सिंह जीते. फिर 2000 के चुनाव में जेडीयू के ही नरेंद्र सिंह जीते. 2005-फरवरी में राजद के विजय प्रकाश यादव जीतने में कामयाब हुए, अक्टूबर 2005 में भाजपा के अभय सिंह ने राजद के विजय प्रकाश को परास्त किया था. 2010 में जदयू के अजय प्रताप सिंह ने राजद के विजय प्रकाश को हराकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. 2015 के चुनाव में आरजेडी प्रत्याशी विजय प्रकाश यादव ने बीजेपी के अजय प्रताप सिंह को करीब 8 हजार वोटों से शिकस्त दी थी. तीसरे नंबर पर निर्दलीय प्रत्याशी रबिंद्र कुमार मंडल (8267 वोट) और चौथे नंबर पर निर्दलीय प्रत्याशी अनिल कुमार सिंह (4094 वोट) पाकर रहे थे.

जमुई विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 91 हजार 994 मतदाता हैं. इस सीट पर अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या करीब 19 फीसदी है. और ऐसे में चिराग पासवान ने श्रेयसी सिंह को खुला समर्थन देकर अपने कोर वोटर्स को स्पष्ट संकेत दिया है.

इस सीट पर सबसे अहम भूमिका में यादव, मुस्लिम, राजपूत वोटर हैं. राजपूत वोटों का बिखराव अंतिम परिणाम पर अपना असर डाल सकता है. फिलहाल बिहार की जनता को 10 नवम्बर का इन्तजार है, जब वोटों की गिनती होगी.


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