तरारी विधानसभा में त्रिकोणीय संघर्ष में सुनील पांडेय, सुदामा प्रसाद और कौशल सिंह में से किसकी जीत होगी?

Balendushekhar Mangalmurty

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में तरारी विधानसभा सीट पर एक बार फिर पुरे बिहार की नज़र है. क्रांति और सामाजिक न्याय की भूमि भोजपुर के आरा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले तरारी नक्सल आंदोलन का गढ़ रहा है और लम्बे समय तक उचित मज़दूरी, दलित महिलाओं की अस्मिता और भूमि के न्यायोचित वितरण के मुद्दे पर भूस्वामियों की जाति सेना से संघर्ष देखा है. पहले इसकी पहचान पीरो विधानसभा क्षेत्र के रूप में रही. 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आये तरारी विधानसभा सीट पर इस बार त्रिकोणीय मुकाबले का परिदृश्य बन रहा है.

इस बार सीट बंटवारे के तहत एनडीए की सीट भाजपा के हिस्से गयी, जहाँ से कौशल कुमार सिंह भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं. लोजपा ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारने की घोषणा की, जिससे नाराज होकर लोजपा नेता सुनील पांडेय ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. 2015 में माले उम्मीदवार सुदामा प्रसाद सुनील पांडेय की पत्नी गीता पांडेय को परास्त कर विधानसभा में पहुंचे थे. इस बार वे फिर से महागठबंधन, जिसमे राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों का गठजोड़ है, के उम्मीदवार हैं.

2015 के चुनाव में तरारी विस क्षेत्र में महज 272 वोटों से जीत-हार हुई थी. यहां से 14 प्रत्याशी चुनाव लड़े थे. भाकपा माले के सुदामा प्रसाद को 44,050 मत मिले थे. पूर्व विधायक सुनील पांडे की पत्नी व लोजपा उम्मीदवार गीता पांडे को 43,778 वोट मिले. कांग्रेस के डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह को 40,957 मत मिले थे.

1951 में अस्तित्व में आये इस विधानसभा सीट पर समाजवादियों की अच्छी पकड़ रही है. शुरुआत में यहां कांग्रेस का दौर रहा पर 1967 में यहां कांग्रेस का किला ढह गया और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) ने जीत का परचम लहरा दिया। 1985 में लोकदल तो 1990 में इस सीट पर आईपीएफ ने भी कब्जा जमाया। बाद में क्रमश: जनता दल, समता व जदयू का कब्जा रहा.

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तरारी से पहले के परिसीमन में पीरो विधानसभा क्षेत्र से 1995 में विधायक चुनी गयीं कांति सिंह साल बार बाद ही 1996 में हुए लोकसभा के आम चुनाव में बिक्रमगंज से सांसद बन गयीं. बाद में वे आरा संसदीय क्षेत्र से भी सांसद चुनी गयीं. इसके बाद यहां हुए उपचुनाव में शिवानंद तिवारी विधायक बने.

सबसे पहले 2000 में समता पार्टी के टिकट पर विधायक बने सुनील पांडेय के नाम सबसे अधिक चार बार विधायक बनने का रिकॉर्ड है. 2005 के दोनों चुनावों और 2010 में जदयू से विधायक बने सुनील पांडेय भूमिहार जाति से आते हैं,
पहले पीरो व बाद में तरारी क्षेत्र में सर्वाधिक चार बार विधायक बनने का रिकॉर्ड सुनील पांडे के नाम है। वे 2000 में समता पार्टी से पहली बार विधायक बने। । इसके पूर्व रघुपति गोप दो बार विधायक बने। हालांकि वे भी लगातार नहीं जीते। 1977 में जनता दल व 1985 में लोक दल से जीते। सुनील पांडे के अलावा किसी ने भी यहां से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज नहीं की है। लिहाजा इस बार सुदामा प्रसाद के समक्ष भी लगातार दुबारा जीत दर्ज करने का चुनौतीपूर्ण टास्क है।

तरारी विधानसभा सीट में कुल मतदाताओं की संख्या 29,7531 है, जिसमें पुरुष वोटर्स की संख्या 1,58,998 और महिला वोटर्स की संख्या 1,38,524 है. इनमें से करीब 75 हजार से अधिक भूमिहार जाति के वोटर हैं. भूमिहार बहुल इस विधानसभा क्षेत्र में सुनील पांडेय और कौशल सिंह भूमिहार जाति से आते हैं, जबकि सुदामा प्रसाद सुढ़ी जाति से आते हैं. सुदामा प्रसाद CPI (ML) के बड़े नेता हैं. राज्य में पार्टी के तीन विधायकों में से वो एक हैं. सुदामा प्रसाद पार्टी की राज्य कमेटी के सदस्य हैं. पिछले चुनाव में सुदामा प्रसाद सबसे करीबी मुकामले में जीतने वाले विधायक बने थे. 272 वोटों से.

सुनील पांडेय पर कई हत्या, अपहरण समेत दो दर्जन मामले दर्ज हैं. ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड में तरारी के विधायक सुनील पांडेय और उनके भाई पूर्व विधान पार्षद हुलास पांडेय पर भी आरोप लगे थे. हत्याकांड के बाद से लगातार जिले की राजनीति में इस हत्या की चर्चा होती है. मुखिया के समर्थकों की तरफ से यहां तक माना जाता है कि जेल से निकलने के बाद मुखिया अपने इलाके की राजनीति में सक्रिय होना चाहते थे. इसको लेकर ही उनकी पांडेय बंधुओं से राजनीतिक रंजिश हुई थी, जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गई.

पहले चरण में होने वाले चुनाव में फिलहाल तरारी विधानसभा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होने वाला है. देखना रोचक होगा कि सुनील पांडेय एक बार फिर से वापसी करते हैं, या सुदामा प्रसाद फिर से अपनी सफलता दोहरा पाते हैं, फिलहाल भाजपा उम्मीदवार की स्थिति कमजोर दिख रही है. पर अंतिम परिणाम लिए 10 नवम्बर का इन्तजार करना होगा, जब वोटों की गिनती होगी.

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