क्या कांग्रेस विधायक बंटी चौधरी सिकंदरा विधानसभा सीट बचा पाएंगे?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

सिकंदरा विधानसभा की सीट पर एनडीए और महागठबंधन दोनों के आधिकारिक उम्मीदवार असंतुष्टों और विद्रोहियों का सामना कर रहे हैं, जो दोनों उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेरने में सक्षम हैं. एनडीए घटक हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा से प्रफुल्ल मांझी उम्मीदवार हैं तो महागठबंधन के उम्मीदवार वर्तमान कोंग्रेसी विधायक बंटी चौधरी हैं. लोजपा से रविशंकर पासवान, रालोसपा से नंदलाल रविदास हैं. इन सभी प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला 28 अक्तूबर को मतदाता करेंगे।

इस सीट पर मुस्लिम, कोइरी, राजपूत और यादव की संख्या अच्छी खासी है. पहले चरण में इस सीट पर मतदान होना है.

सिकंदरा सीट का राजनीतिक इतिहास
इस सीट पर पहला चुनाव 1962 में हुआ था. तब कांग्रेस के मुश्ताक अहमद शाह पहले विधायक बने थे. इसके बाद सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई. 1967 में एसएसपी के एस. विवेकानंद जीते. इसके बाद 1969 और 1972 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर रामेश्वर पासवन विधानसभा पहुंचे. 1977 में जेएनपी के टिकट पर नगीना चौधरी जीतने में कामयाब हुए. 1980 में रामेश्वर पासवन ने वापसी की और बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीते. फिर 1985 में वह कांग्रेस के टिकट पर लड़े और जीते. 1990 में सीपीआई के प्रयाग पासवान ने रामेश्वर पासवान से सीट छीन ली. 1995 के चुनाव में प्रयाग पासवान सीपीआई के टिकट पर तो 2000 के चुनाव में केएसपी के टिकट पर जीते. इसके बाद 2005-फरवरी में रामेश्वर पासवान एलजेपी तो 2005-अक्टूबर और 2010 में जेडीयू के टिकट पर जीते. 2015 के चुनाव में यह सीट कांग्रेस के खाते में गई और सुधीर कुमार उर्फ बंटी चौधरी जीतने में कामयाब हुए. उन्होंने लोजपा के सुभाष चंद्र बोस 7,990 वोट से हराया.

जमुई लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाला यह सिकंदरा विधानसभा क्षेत्र तीन प्रखंडों की पंचायतों से मिलाकर बना है. इसमें अलीगंज, सिकंदरा और खैरा प्रखंड की पंचायत शामिल हैं. 2010 में परिसीमन के बाद जमुई जिले के खैरा प्रखंड की 12 पंचायत सिकंदरा विधानसभा क्षेत्र में शामिल हुईं.

सिकंदरा विधानसभा की समस्या वही है जो जमुई जिले की है, यानि आर्थिक पिछड़ापन. कृषिप्रधान विधानसभा क्षेत्र सिकंदरा में किसानों के लिए बनने वाली कुंड घाट जलाशय परियोजना निर्माणाधीन है. यहां से रोजगार के लिए लोगों का पलायन एक बड़ी समस्या है.

इसबार बागी उम्मीदवारों के कारण सिकंदरा विधानसभा सीट पर घमासान मचा है. कांग्रेस व राजद के कार्यकर्ताओं द्वारा पहले से ही निवर्तमान विधायक बंटी चौधरी का विरोध जताते हुए प्रदेश नेतृत्व से उम्मीदवार बदलने की मांग की जा रही थी. वहीं एनडीए में हम के खाते में सीट जाने और एक अजनबी चेहरे प्रफुल्ल मांझी को उम्मीदवार बनाये जाने की घोषणा के बाद एनडीए के घटक दलों-भाजपा और जदयू के कार्यकर्ताओं में काफी आक्रोश देखा जा रहा है. एक तरफ, पूर्व मंत्री और सिकंदरा का 7 बार प्रतिनिधित्व कर चुके जद यू नेता रामेश्वर पासवान और युवा जद यू के प्रदेश संगठन सचिव सह पूर्व प्रखंड प्रमुख सिंधु पासवान के द्वारा मैदान में उतरने से और दूसरी तरफ लोजपा द्वारा दलित सेना के जिलाध्यक्ष रविशंकर पासवान को उम्मीदवार बनाये जाने से राजनीतिक माहौल गर्म हो चला है. रविशंकर पासवान को पार्टी का सिंबल मिलते ही 2010 व 2015 के पिछले दो चुनावों में मामूली वोटों से मात खाये पूर्व लोजपा जिलाध्यक्ष सुभाष पासवान ने भी बगावती तेवर अपना लिया है.

कांग्रेस विधायक सुधीर कुमार उर्फ बंटी चौधरी को एंटी इनकंबेंसी का जबरदस्त असर झेलना पड़ रहा है तो हम प्रत्याशी प्रफुल्ल मांझी के स्थानीय नहीं होने के कारण मतदाता उनके तरफ अभी तक मुखातिब नहीं हो पा रहे है.

ऐसे में इस बार सिकन्दरा का चुनाव दिलचस्प मोड़ की ओर बढ़ता दिख रहा है.


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