पुस्तक चर्चा: विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी”

भारती पाठक

कुछ कहानियां या उपन्यास पढ़ते हुए हम गुनते हैं, और उसमें मौजूद कथ्य का क्षणिक रसास्वादन करते हैं । लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो हमारी उंगली पकड़ कर हमें अपने साथ उस रहस्यमय लोक में ले जाती हैं जहाँ उस कथा और जीवन में कुछ खास भेद नहीं रह जाता । हम कथा पढ़ नहीं रहे होते बल्कि उसे जी रहे होते हैं और अंत में हैरान से सोचते रह जाते हैं कि जीवन ऐसे कैसे इतनी सहजता से कहानी में ढल सकता है । ऐसे अनुभव रोज नहीं होते क्योंकि ऐसी कथाएं या उपन्यास रोज नहीं लिखे जाते और न ही आसानी से हाथ में आते हैं ।
विनोद कुमार शुक्ल जी की रचना “दीवार में एक खिड़की रहती थी” कुछ ऐसी ही तासीर लिए एक साधारण से जीवन के सीधे-सादे वर्णन का असाधारण उपन्यास है । इसमें कोई महान सन्देश या उद्देश्य नहीं बल्कि निम्न मध्यमवर्गीय जीवन है जो अपनी गति और सीमाओं में बंधा किसी लालसा से परे एक सुन्दर लय में चलता प्रतीत होता है ।
विनोदकुमार शुक्ल जी का जन्म 1 जनवरी 1937 को राजनांद गाँव मध्य प्रदेश में हुआ । मुख्यतः कवि हृदय विनोद शुक्ल जी का पहला कविता संग्रह “लगभग जयहिन्द” 1971 में प्रकाशित हुआ और दूसरा “वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर” 1981 में जबकि पहला उपन्यास “नौकर की कमीज” 1979 में प्रकाशित हुआ जो बहुत चर्चित हुआ । इसके अलावा पेड़ पर कमरा, सब कुछ होना बचा रहेगा, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में एक खिड़की रहती थी, इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं जिसके लिए 2005 में इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया । प्रोफ़ेसर शक्ति खन्ना जी ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया जो देश-विदेश में काफी चर्चित हुआ ।
मध्य प्रदेश शासन की गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप, कला परिषद् का रज़ा पुरस्कार, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् का वीर देव पुरस्कार, उड़ीसा की वर्णमाला संस्था द्वारा सृजन भारती सम्मान सहित कई अन्य पुरस्कार प्राप्त विनोद शुक्ल जी इस उपन्यास के जरिये एक ऐसी दुनिया का निर्माण करते हैं जहाँ रहने वाले पात्र जीवन से शिकायतें नहीं करते बल्कि उसे ख़ुशी-ख़ुशी जीते और उसी में सपने देखते हैं । कहानी में न तो बहुत अप्रत्याशित घटनाएँ हैं और न ही जीवन की उठापटक या संघर्ष ।
उपन्यास की कहानी रघुवर प्रसाद और सोनसी की है जो कि नव-विवाहित जोड़ा है । रघुवर एक छोटे से शहर के कॉलेज में मामूली सी तनख्वाह में पढ़ाते हैं । सोनसी भी साथ रहने के लिए शहर में आ जाती है । रघुवर प्रसाद एक कमरे के किराए के घर में रहते हैं जिसके एक कोने में छोटी सी रसोई और दूसरी तरफ सोने की जगह है । कभी-कभी उनके माता-पिता भी अपने छोटे बेटे के साथ उनके पास रहने आते हैं और बेटे की नयी गृहस्थी देख कर प्रसन्न होते रहते हैं ।
ऐसा नही है कि इनके जीवन में अभाव नहीं हैं । ये भी अभावों से दो चार होते रहते हैं लेकिन कमाल की बात है कि कोई भी पात्र इन अभावों की चर्चा नहीं करता । ये सभी उन अभावों में भी सुखी हैं और इसकी वजह है इनके कमरे की दीवार में बनी एक खिड़की । रघुवर और सोनसी हर रोज उस खिड़की से कूद कर उस पार चले जाते हैं जहाँ की दुनिया उनकी अपनी है । एक ऐसी जगह जहाँ सब कुछ उनके मन मुताबिक होता है ।
“ छुट्टी का दिन था । सवेरे से रघुवर प्रसाद और सोनसी खिड़की से कूद कर पीछे गए । रघुवर प्रसाद के हाथ में लोहे की एक बाल्टी थी, जिसमें धोने के कपड़े थे । सबसे ऊपर साबुन की एक बट्टी थी । दोनों नंगे पैर थे । गंगा इमली के पेड़ के थोड़ी दूर से होकर पगडण्डी बनी थी । पेड़ के नीचे कांटे झरते थे इसलिए । गंगा इमली लाल पक गयी थी ।…….. पत्नी ने ज़मीन से उठाकर कच्चा फल खाया । एक टुकड़ा उसने रघुवर प्रसाद को दिया ।……ये सारी जगह रघुवर प्रसाद के मन की जगह थी । गोबर से लिपी पगडण्डी मन की पगडण्डी थी । साफ़ सुथरा आकाश, उड़ने के लिए मन का आकाश था ।”
उस दुनिया में नदी, झरने, पहाड़, हरे-भरे पेड़, तालाब, गोबर से लिपी साफ-सुथरी पगडंडी, पक्षी, कुछ छोटे-छोटे बच्चे और ठंडी-ठंडी हवा के साथ ही एक बूढ़ी अम्मा की चाय की दुकान भी है जो उनसे बातें भी करती है । इस दुनिया में दोनों अपनी मर्ज़ी से रहते हैं । तालाब में स्वछंद नहाते हैं । हँसते हैं, गाते हैं और बूढ़ी अम्मा के हाथों की चाय पीकर वापस लौट आते हैं ।
ये दुनिया एक ऐसे स्वप्नलोक सरीखी है जिसकी कल्पना कोई भी करता है । वास्तव में तो यही दुनिया हमारे आस-पास भी है बस हमें अपने मन के दीवार की खिड़की को खोलने और उस लोक को अपने आस-पास महसूस करने की जरूरत है । उपन्यास को पढ़ते समय शुरू के कुछ पन्ने आपको ऊबा सकते हैं जब कहानी का कोई सिरा पकड़ में नहीं आता, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है आप बरबस इसके जादू में खोने से खुद को रोक नहीं पाते ।
खिड़की के इस पार की दुनिया बेहद साधारण है जिसमें रघुवर प्रसाद रोज ऑटो से अपने कॉलेज जाते हैं । एक दिन ऑटो नहीं मिलता तो एक साधू उन्हें अपने हाथी पर बैठा कर कॉलेज छोड़ आता है । उस दिन के बाद न चाहते हुए भी रघुवर प्रसाद उसी साधू के साथ कॉलेज आने-जाने लगते हैं । हाथी सबके आकर्षण का केंद्र होता है ।
रघुवर प्रसाद के घर के पास ही पेड़ पर एक लड़का अक्सर बैठा रहता है जो छिप कर बीडी पीता है । वह अपने पिता की मार के डर से घर नही जाता । रघुवर प्रसाद के कॉलेज के विभागाध्यक्ष भी एक दिन रघुवर के साथ उस खिड़की के उस पार जाते हैं और अचंभित रह जाते हैं कि इसी शहर में रहते हुए उन्हें ये जगह कैसे नहीं दिखी । एक शाम वे पत्नी और बच्चों समेत रघुवर के घर उस खिड़की से पार जाने के लिए आते भी हैं लेकिन रघुवर और सोनसी अपनी दुनिया में मस्त हैं ।
खिड़की के दोनों तरफ की दुनिया, पेड़, तालाब, लड़का, हाथी, साधू, पड़ोसी, बूढ़ी अम्मा सब इस कहानी में एक साथ होते हुए भी एक दूसरे की उपस्थिति और जीवन को सहजता से लेते हैं । कोई किसी के जीवन में दखलंदाजी नहीं करता । घटनाएँ जैसे घटित होती हैं लेखक ने जस के तस उनका वर्णन कर दिया है । इन सबके साथ ही शब्दों के चमत्कार से एक ऐसी दुनिया की रचना लेखक ने की है जो बिलकुल जादुई है जहाँ सब कुछ बहुत साधारण होते हुए भी असाधारण है ।
इस उपन्यास में रघुवर और सोनसी का प्रेम भी है जहाँ अपने दैनिक कार्यों को निबटाते हुए भी वे सपने देखते रहते हैं । प्रेम भी कर रहे होते हैं जो जगह-जगह दिखता है ।
“रघुवर प्रसाद कल की तैयारियों में किताब खोलकर बैठ गए । पत्नी खाना बनाते-बनाते पति को देख लेती थी । हर बार देखने में उसे छूटा हुआ नया दीखता था । क्या देख लिया है यह पता नहीं चलता था । क्या देखना है यह भी नहीं मालूम था । देखने में इतना ही मालूम था कि इतना ही देखा था ।”
लेखक की भाषा-शैली में नए प्रयोग का कमाल है कि रघुवर और सोनसी एक दूसरे के मन की भाषा पढ़ लेते हैं । एक कहता कुछ है और दूसरा सुनता कुछ, लेकिन दोनों वही समझते हैं जो अगले से वे सुनना चाहते हैं ।
“हाथी आ जायेगा तो क्या मैं हाथी से खाना लेकर आ जाउंगी ?” सोनसी ने जा रहे रघुवर प्रसाद से पूछा ।
“भूख लगेगी तो मैं वहां गाँव से टोकनी वाली से चना लेकर खा लूँगा ।” रघुवर प्रसाद ने कहा ।
परन्तु सोनसी ने सुना “भूख तो लगेगी । भात लेकर आओगी तो मैं वहां खा लूँगा ।”
जिन्हें ये लगता है कि विनोद कुमार शुक्ल जी स्त्री-पुरुष प्रेम या श्रृंगार के विषय में शुष्कता दिखाते हैं उन्हें इस उपन्यास से निराशा हो सकती है क्योंकि जितनी सुन्दरता और सहजता से इस किताब में रति और श्रृंगार के वर्णन किये गए हैं वे अप्रतिम हैं । बिना किसी प्रदर्शन के भी रघुवर प्रसाद और सोनसी के बीच प्रेम प्रसंगों को अत्यंत स्वाभाविक ढंग से लिखा गया है जिसे पाठक बिना उत्तेजित हुए भी प्रेम में भीगा महसूस करता है ।
“यद्यपि रघुवर प्रसाद सांकल लगाना भूल गये थे, पर दरवाजा उन्होंने ऐसे बंद किया था कि दरवाजा बंद होते ही वे घर समेत अदृश्य हो गए । कमरे के अन्दर के फूल की एक कली इतने एकांत के एक क्षण को भी छोड़ना नहीं चाहते थे । उस बगीचे की सारी कलियों को वे चुन लेना चाहते थे कि सोनसी उनको गूंथे और वे उसका श्रृंगार करें । रघुवर प्रसाद और सोनसी प्रेम का समय पा रहे थे । सोनसी एक-एक क्षणों को गूंथती और रघुवर प्रसाद सोनसी के थोड़े-थोड़े निर्वस्त्र शरीर को अलंकृत करते । सोनसी पूरी अलंकृत होकर निकली थी ।”
ये तो हैं प्रेम दृश्यों का सौन्दर्य,इसके अलावा उपन्यास की जो सबसे बड़ी बात है कि इसके पात्रों और घटनाओं को हम अपने आस-पास ही घटित होते देखते और पहचाना हुआ महसूस करते हैं । भारतीय निम्न मध्यमवर्गीय जीवन का परिचय जितने करीब से लेखक पाठकों को कराते हैं वह कम ही लेखकों के लेखन में दिखता है । भाषा इतनी रोजमर्रा की और सरल कि कहीं भी सोचने या दिमाग पर जोर डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
हाँ ये जरूर है कि एकदम नए पढ़ने वालों के लिए ये किताब थोड़ी देर से समझ में आने वाली हो सकती है लेकिन ये तय है कि जब समझ में आ जाती है तो इसके मोह और जादू से निकलना मुश्किल हो जाता है और पाठक अपने घर की दीवार में ऐसी ही एक खिड़की की कामना करने लगता है । और भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है । एक अद्भुत पठनीय उपन्यास ।

 


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