जदयू या राजद: परबत्ता विधानसभा सीट इस बार किसके हिस्से जायेगी?

Balendushekhar Mangalmurty

खगड़िया लोकसभा क्षेत्र में आने वाले परबत्ता विधानसभा सीट पर 3 नवम्बर को बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में मतदान होना है. 2015 में इस सीट से जदयू के टिकट पर रामानंद प्रसाद सिंह विजयी हुए थे. उन्होंने भाजपा उम्मीदवार रामानंद चौधरी को 28924 वोटों से मात दी थी. इस बार समीकरण बदले हुए हैं. राजद और जदयू आमने सामने हैं. जहाँ जदयू के उम्मीदवार संजीव सिंह हैं, वहीँ राजद के उम्मीदवार दिगंबर चौरसिया हैं. इस सीट से लोजपा के आदित्य कुमार और रालोसपा के आनंद कुमार कुशवाहा भी मैदान में हैं. हालाँकि मुख्य मुकाबला राजद और जदयू के बीच ही है. रामानंद प्रसाद सिंह इस विधानसभा क्षेत्र के कद्दावर नेता हैं. पिछले कई चुनावों से वे इस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं. इस बार उन्होंने खुद चुनाव न लड़कर अपने बेटे संजीव सिंह को खड़ा किया है. इस सीट पर जदयू नेत्री सुहेली मेहता भी दावा कर रही थीं, पर अंत में संजीव सिंह की उम्मीदवारी अपने पिता के चलते भारी पड़ी.

गंगा नदी के किनारे बसे परबत्ता विधानसभा क्षेत्र में कुल 2.96 लाख वोटर हैं, जिसमें 1.57 लाख यानि 53 प्रतिशत पुरुष और 1.37 लाख महिलाएं यानि 46.4 प्रतिशत महिला वोटर हैं. परबत्ता विधानसभा सीट पर यादव, भूमिहार और मुस्लिम वोटर की संख्या सबसे अधिक है. कोइरी मतदाता भी यहां निर्णायक भूमिका में हैं.जनगणना 2011 के मुताबिक परबत्ता विधानसभा क्षेत्र की कुल आबादी 445531 है इसमें 91.53% लोग गांव और 8.47% जनसंख्या शहर में रहती है. इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति का अनुपात क्रमशः 6.96 और 0.03 फीसदी है. ऐसे में भूमिहार जाति के वोट के बल पर रामानंद प्रसाद सिंह अपनी जीत सुनिश्चित करते रहे हैं.
सीट के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो 1990 के बाद से जनता दल और इससे अलग हुए दल- राजद और जदयू का ही वर्चस्व रहा है और कांग्रेस ने इस सीट पर अपनी पकड़ खो दी है. 1990 और 1995 में जदयू उम्मीदवार विद्यासागर निषाद को इस सीट पर जीत हासिल हुई. वहीँ 2000 के चुनाव में राजद के राकेश कुमार ने बाज़ी मारी. 2004 के उपचुनाव में जदयू के टिकट पर रामानंद प्रसाद सिंह को जीत हासिल हुई. इसके बाद उनकी जीत का सिलसिला चल निकला. 2005 के फरबरी और अक्टूबर के चुनाव में उन्हें लगातार जीत हासिल हुई. हालाँकि 2010 के चुनाव में जब पुरे बिहार में जदयू और भाजपा के एनडीए गठबंधन की लहर चली और इस चुनाव को नीतीश कुमार के परफॉरमेंस के पक्ष में स्पष्ट मैंडेट के रूप में देखा गया, उस समय भी राजद उम्मीदवार राकेश कुमार उर्फ़ सम्राट चौधरी को जीत हासिल हुई. 2014 में हुए उपचुनाव और फिर 2015 के चुनाव में रामानंद सिंह ने जीत हासिल करके सीट पर फिर से अपना कब्ज़ा किया.

गंगा किनारे स्थित यह विधानसभा क्षेत्र कई मायनों में खास है. उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने का रास्ता परबत्ता से होकर जाता है. परबत्ता विधानसभा क्षेत्र में केला की उपज सबसे अधिक होती है, पर केला आधारित फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री का पुरे इलाके में न होना बहुत बड़ा मसला है. रेल की सुविधा से महरूम इस विधानसभा क्षेत्र में बीपी मंडल सेतु के क्षतिग्रस्त होने से आवागमन में परेशानी हो रही है. आवागमन के लिए बनाए गए स्टील पुल बह जाने के बाद लोगों को जिला मुख्यालय आने के लिए नाव की सवारी करनी पड़ रही है. यहां के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. विकास के जो सपने दिखाए गए थे वह पूरी तरह यहां साकार नहीं हो पाए हैं.

तमाम मुद्दों के बीच जातिगत गोलबंदी के अंतर्गत वोटिंग करने वाले मतदाता इस बार इलाके के कद्दावर भूमिहार नेता रामानंद सिंह के बेटे जदयू उम्मीदवार संजीव सिंह को अपना प्रतिनिधि चुनते हैं या फिर पनेरी जाति से आने वाले राजद उम्मीदवार दिगंबर चौरसिया में अपना भरोसा जताते हैं, देखने वाली बात होगी.


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