नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा में राजगीर विधानसभा सीट पर किसकी किस्मत चमकेगी?

Balendushekhar Mangalmurty 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले में स्थित राजगीर का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व है. प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय, भगवान बुद्ध एवं भगवान महावीर की जन्मस्थली कुंडलपुर एवं पावापुरी के लिए यह दुनिया भर में जाना जाता है. अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित राजगीर विधानसभा सीट पर इस बार मुख्य मुकाबला कांग्रेस के रवि ज्योति कुमार और जदयू के कौशल किशोर के बीच है. 2015 में बिहार पुलिस में इंस्पेक्टर की नौकरी छोड़कर चुनावी मैदान में आये रवि ज्योति कुमार ने उस चुनाव में जदयू के उम्मीदवार के तौर पर भाजपा के दिग्गज नेता सत्यदेव नारायण आर्य को 5390 वोटों के मार्जिन से हराया था. आठ बार इस विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके सत्यदेव नारायण आर्य फिलहाल हरियाणा के गवर्नर हैं और कौशल किशोर उनके बेटे हैं. इस सीट पर टिकट काट दिए जाने के बाद रवि ज्योति कुमार ने जदयू छोड़कर महागठबंधन का दामन थाम लिया और कांग्रेस उम्मीदवार की हैसियत से चुनावी मैदान में हैं. लोजपा से मंजू देवी इस सीट पर चुनावी मैदान में हैं.

नालंदा लोकसभा क्षेत्र में आने वाले राजगीर विधानसभा क्षेत्र में कुल 2.87 लाख वोटर हैं, जिसमें 1.49 लाख यानि 52.22 प्रतिशत पुरुष और 1.36 लाख यानि 47.48 प्रतिशत महिला वोटर हैं। इस सीट के जातीय समीकरण की बात करें तो कुर्मी और यादव अहम भूमिका में हैं जबकि राजपूत, मुस्लिम, भूमिहार वोटर भी प्रभावशाली संख्या में मौजूद हैं.

2008 के परिसीमन में कतरीसराय प्रखंड को काटकर बिहारशरीफ के सभी 14 पंचायतों को राजगीर सीट में शामिल किया गया. वर्तमान में इस क्षेत्र में राजगीर प्रखंड के एक पंचायत एवं नगर पंचायत, सिलाव का सिलाव नगर पंचायत क्षेत्र एवं 11 पंचायत, गिरियक के सभी 7 पंचायत के साथ-साथ बिहारशरीफ के 14 पंचायत शामिल हैं.

राजगीर विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास:

साल 1952 में अस्तित्व में आने के बाद साल 1969 से ये अधिसूचित क्षेत्र के रूप में जाना जाता है. 1952 से 1969 तक यहां जनसंघ का कब्जा रहा. लेकिन 1972 में यहां से सीपीआई के चंद्रदेव प्रसाद हिमांशु चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे. लेकिन अगले ही विधानसभा चुनाव साल 1977 में भाजपा ने अपना झंडा गाड़ दिया. भाजपा के सत्यदेव नारायण आर्य 1977 से 1985 तक लगातार इस सीट पर जीत हासिल की. लेकिन 1990 में पुनः सीपीआई के चंद्रदेव प्रसाद हिमांशु ने भाजपा की झोली से यह सीट छीन ली. लेकिन पांच साल बाद 1995 के चुनाव में पुनः सत्यदेव नारायण आर्य ने भाजपा का परचम लहराने में कामयाबी हासिल की. 2010 तक यह सीट सत्यदेव नारायण आर्य के नेतृत्व में भाजपा के खाते में रहा. 2005 में जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन के बाद भी यह सीट भाजपा के ही खाते में रहा. 2015 के चुनाव में राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन कर 2015 के चुनाव में जदयू ने भाजपा से यह सीट छीन ली.

2011 की जनगणना के अनुसार, राजगीर की जनसंख्या 412522 है. यहां की 83.7 फीसदी आबादी ग्रामीण और 16.3 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का अनुपात कुल आबादी का क्रमशः 25.15 और 0.07 है.

राजगीर विधानसभा सीट पर कभी सीपीआई की मज़बूत पकड़ थी और भाजपा के साथ कड़ी टक्कर हुआ करती थी. पर 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में सीपीआई तीसरे और सी.पी.एम. चौथे स्थान पर रही. दोनों ने मिलकर लगभग 9100 के आसपास वोट जुटाने में सफलता हासिल की. इस बार ये ताकत कांग्रेस के साथ होगी. राजद का भी साथ मिल जाने से इस सीट पर जदयू और कांग्रेस के उम्मीदवारों के बीच कडा मुकाबला देखने को मिल सकता है. अब तक यहां 16 चुनाव हुए हैं जिनमें सबसे ज्यादा 8 बार भाजपा ने जीत दर्ज की है. जदयू को एक बार विजय हासिल हुई है जबकि कांग्रेस और सीपीआई दो बार चुनाव जीत चुकी हैं.

अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ स्थल होने के बावजूद राजगीर विधानसभा क्षेत्र में समस्यायों की कमी नहीं है और विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं. सकरी व पंचाने नदियों पर अबतक पुल नहीं बना है. राजगीर को नगर परिषद का दर्जा नहीं मिल पाया. शहर में पाइनलाइन विस्तार नहीं हुआ है. शहर में जाम की समस्या का समाधान नहीं हुआ है. किसानों के समक्ष सिंचाई समस्या आज भी बरकरार है. शहर में पेयजल की समस्या का समाधान नहीं हुआ है.

ऐसे में देखना रोचक होगा राजगीर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता किस उम्मीदवार पर अपना भरोसा जताते हैं.


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