यात्रा वृतांत: श्रीकृष्ण की जन्मभूमि – मथुरा

भारती पाठक

अपने भारत देश के कुछेक प्रदेशों को छोड़ दूँ तो काफी जगहों का पाला छूने का अवसर मिल ही गया है और सभी से कुछ न कुछ यादें जुडी हैं जिनके बारे में लिखा भी है । लेकिन इतनी यात्राओं के बारे में लिखते हुए ख़याल आया कि अपने उत्तर प्रदेश के कितने ही ऐतिहासिक और धार्मिक शहरों की यात्राओं के बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं । तो आज इस कड़ी में मथुरा यात्रा की कुछ यादें ।
मथुरा उत्तर प्रदेश का एक प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल है जो भगवान् श्रीकृष्ण की जन्म और कर्मभूमि के रूप में विश्वविख्यात है । यह कनिष्क वंश द्वारा स्थापित शहर है हालांकि उत्खनन द्वारा प्राप्त साक्ष्य इसे कुषाणकालीन स्थापित बताते हैं । प्राचीन काल से ही यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति का केंद्र रहा है । महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी विरजानंद, कवि रसखान आदि का नाम भी इस नगरी से जुडा हुआ है । यहाँ की भाषा ब्रजभाषा है जो कभी हिंदी थी और आज उसकी बोली समझी जाती है ।
वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधुदानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गयी है तो इस प्रसंग के अनुसार यह नगर मधु दैत्य द्वारा बसाया गया बताते हैं । लवणासुर जिसका वध शत्रुघ्न ने किया था इसी मधुदानव का पुत्र था । इससे मधुपुरी या मथुरा का रामायण काल में बसाया जाना सूचित होता है । रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन मिलता है । इसके अलावा भी तमाम कथायें प्रचलित हैं और वर्तमान में भी इस नगर का वैभव पूर्व की ही भांति स्थापित है । एक स्थापना के अनुसार प्राचीन भारत में कुछ विशेष नगरों की विशेषताओं के आधार पर उन्हें मधुरा नाम दिया जाता था और वे कई थे जैसे दक्षिण में मदुरै । जो भी हो लेकिन मधुरा या मथुरा सबसे न्यारा रहा आया और आज भी है ।
ब्रज की लट्ठ मार और फूलों की होली तो विश्व प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिए पर्यटक विशेषकर होली में यहाँ आते हैं । देश के सभी प्रमुख शहरों से यह सड़क, रेल तथा वायु मार्ग से जुड़ा है । दिल्ली से आगरा 145 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में यमुना के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित है । यहाँ से निकटतम हवाई अड्डा आगरा में ही है लेकिन वहां से कुछ सीमित उड़ानें ही संचालित होती है । यहाँ से मथुरा की दूरी 58 किलोमीटर है जिसे कार या बस द्वारा तय किया जा सकता है ।
मेरी मथुरा यात्रा की वजह बना सामाजिक विषय के शिक्षक प्रशिक्षक प्रशिक्षण में प्रतिभाग करना जो कि अधिकतर लखनऊ में होता है लेकिन जिन जिलों के शिक्षकों ने प्रशिक्षण के पहले चरण में प्रतिभाग नहीं किया उन्हें मथुरा भेजा गया । विभाग में तो इस तरह की दूर के जिलों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाना सजा मानते हैं लेकिन अपना घुमक्कड़ मन तो खुश हो गया क्योंकि इससे पहले जितनी बार मथुरा जाना हुआ बस मथुरा के पेड़े से मुलाकात हुयी वो भी स्टेशन पर ।
होता ये था कि कभी आगरा गए तो ट्रेन मथुरा से होकर घूम कर आती थी और हम बस रेलवे प्लेटफार्म पर चक्कर लगा कर रह जाते थे । खैर तो सजा हो या मज़ा हमारे जिले से हम चार शिक्षक (दो महिला व दो पुरुष) मथुरा जाने के लिए चयनित हुए । हम चारों पहले भी प्रशिक्षणों में साथ रह चुके थे तो आपस में सहज थे । हमारे शहर से सीधी रेल सेवा भी है तो आसानी से शाम को चलकर अगले दिन सुबह-सुबह हम मथुरा पहुँच गए ।
वैसे तो प्रशिक्षणों में रुकने और खाने की व्यवस्था संस्थान की ही होती है लेकिन अपनी सुविधानुसार अलग भी रुका जा सकता है । प्रशिक्षण स्थल शहर से थोड़ा बाहर था तो हमने वहां न रुक कर एक होटल में रुकना उचित समझा जिससे खाली समय में शहर से भी मुलाकात की जा सके । वैसे भी हम राम की जन्मभूमि अयोध्या से वहां गए थे तो कृष्ण की जन्मभूमि देखने की सहज जिज्ञासा थी । साथी शिक्षक अम्बिकेश जी के एक परिचित के माध्यम से ठीक जन्मभूमि मंदिर के सामने एक होटल में हमारे रुकने की व्यवस्था आसानी से हो गयी । वैसे भी धार्मिक स्थल होने के कारण यहाँ रुकने के लिए जगह जगह होटल और धर्मशालायें काफी उचित मूल्य पर मिल जाती हैं । 600 से 700 में ए सी कमरे और 250 से 300 में सामान्य कूलर वाले कमरे भी मिल जाते हैं । मेरे कमरे में साथी शिक्षिका वर्तिका थी जिन्हें कमरा कुछ खास पसंद तो नहीं था लेकिन जहाँ बाकी सब एकमत तो वे भी मान गयी ।
हम जल्दी से नहाकर तैयार हुए और संस्थान जाने के लिए निकल पड़े । ऐसे प्रशिक्षणों में पहले दिन दोपहर तक का समय नामांकन वगैरह में ही जाता है ये सोचकर हम भी आराम से १० बजे तक संस्थान पहुंचे । हमारी धारणा के विपरीत प्रशिक्षण 9:30 से शुरू हो चुका था । पहला चायकाल अभी हुआ ही था । लेकिन स्वागत के लिए लोग खड़े थे । माथे पर टीका लगा कर पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया जो अब तक के प्रशिक्षण अनुभवों से बिल्कुल अलग था । हमें किसी सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नगर में होने का पहला आभास वहीं हो गया ।
फिर हम भी सबमें शामिल हो गए, नाश्ता किया और हाल में पहुंचे । पहुंचते ही पुकारा गया कि अयोध्या से आये शिक्षक कहाँ हैं यानि पहले ही दिन बैंड बज गयी कि हम देर से पहुंचे । वैसे हमारा ही नहीं बाकी जनपदों के शिक्षकों का कहना था कि हम ठीक समय से पहुँच गए थे लेकिन कहा गया कि कल से समय का ध्यान रखें । अब हम बैठ कर इंतज़ार करने लगे उन जिलों का जो हमारे भी काफी बाद आये ।
खैर सत्र शुरू हुआ और मुझे कहने में संकोच नहीं कि अब तक लिए गए तमाम प्रशिक्षणों में ये अब तक का सबसे सुव्यवस्थित और घड़ी की सुइयों पर चलने वाला प्रशिक्षण था । हमने तो सोचा था ४ बजे तक फुर्सत मिल जायेगी लेकिन वहां के डायट प्राचार्य पूरे समय उपस्थित रहे तो छुट्टी भी समय से भी आधे घंटे बाद 5:30 पर हुई ।
संस्थान ठीक सड़क से लगा हुआ था तो सवारी की सुविधा उपलब्ध थी लेकिन ऑटो पहले से भरे आते थे वो भी देर में । खैर थोड़ी देर में सवारी मिल गयी और वहां से निकल कर हम सीधा होटल पहुंचे । हाथ मुंह धोया, तैयार हुए और मथुरा घूमने की शुरुआत सड़क पार कर जन्मस्थान देखने से की । शाम हो गयी थी और मंदिर के बाहर काफी चहल पहल दिख रही थी । भव्य प्रवेश द्वार पर अर्जुन का रथ बना था जिस पर पीछे खड़े अर्जुन और सारथी के रूप में भगवान् कृष्ण की मूर्तियाँ हैं ।भीतर पहुँच कर हमने भी अपने जूते-चप्पल एक तरफ उतारे और घूम कर मंदिर का जायजा लिया । मंदिर खुलने का समय सुबह 5 बजे से दिन में 12 बजे और फिर शाम 4 बजे से रात 9:30 तक रहता है ।
पहली नज़र में ही मंदिर का प्रांगण काफी बड़ा और सुन्दर लगा । वैसे हो भी क्यों न सारी दुनिया को अपनी बंशी की धुन पर नचाने वाले कन्हैया का जन्मस्थान कोई मामूली जगह हो भी नहीं सकती थी । यह मथुरा के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है । यह उसी जेल के इर्द- गिर्द बना है जहाँ कृष्ण के मामा कंस ने उनकी माता देवकी और पिता वासुदेव को बंद करके रखा था और वहीँ पर इनका जन्म हुआ था । जेल की संरचना को देखते हुए मन में कृष्ण जन्म से जुडी बचपन में सुनी कथाएं घूम रही थी ।
जन मान्यता के अनुसार कारागार के पास सबसे पहले कृष्ण के प्रपौत्र ब्रजनाभ ने अपने कुल देवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था । इतिहासकार बताते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में दूसरा मंदिर 400 ईसवी में बनवाया गया था । उस समय मथुरा संस्कृति और कला के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हुआ था । तीसरी बार यह मंदिर 1159 ईसवी में राजा विजयपाल देव के शासन काल में बना और चौथी बार जहाँगीर के शासन में ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने बनवाया था । ये भी बताते हैं कि कभी यहाँ भगवान् कृष्ण की चार मीटर ऊंची शुद्ध सोने की मूर्ति थी जिसे गजनी के आक्रमण के दौरान यहाँ से चोरी कर लिया गया था । ये भी बताते हैं कि इस मंदिर की भव्यता से चिढ कर औरंगजेब ने सन 1669 में इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करा दिया । आज भी मंदिर से सटी विशाल मस्जिद है और मालिकाना हक के लिए दो पक्षों में कोर्ट में जाने की बात चल रही है ।
मंदिर पूरा घूम कर देखते करीब 9 बज गए थे और 9:30 पर मंदिर बंद हो जाता है तो हम भी भोजन की तलाश में मंदिर से बाहर आये । आस पास कोई बहुत अच्छा भोजनालय नहीं दिखा तो घूमते हुए थोडा दूर गए । थोड़ी दूरी पर एक ठीक ठाक जगह दिखी जहाँ भोजन किया जा सकता था । खाना अच्छा था । मन में सोचा कि जब तक मथुरा में हैं रात का भोजन वहीँ करेंगे । रात भर ट्रेन में बीती थी और दिन प्रशिक्षण हाल में तो शरीर थकान से चूर था और उसे आराम की जरूरत थी । कमरे में पहुँच कर कपडे बदले और मैं तो सीधा बिस्तर में घुस गयी लेकिन वर्तिका काफी देर तक खटपट करती रही और तब मैंने जाना कि सोने से पहले भी त्वचा की देखभाल करने के तमाम उपाय किये जाते हैं । जल्दी ही निद्रा देवी ने मुझे अपनी गोद में बुला लिया ।

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