Menstruation से जुड़े ‘टैबू’, महिलाओं को बना रहे डिप्रेशन का शिकार, स्कूल छोड़ती हैं बच्चियां…

Menstrual Hygiene एक ऐसा विषय है, जो बेहद जरूरी है; पर दुर्भाग्य से उतना ही neglected है. इस पर अधिक से अधिक चर्चा की जरूरत है, ताकि समाज के साथ- साथ सरकारें भी जागरूक और संवेदनशील हो सकें. आज प्रस्तुत है इस सीरीज की दूसरी कड़ी. पढ़ें और अपने फीडबैक से marginalised.in की टीम को परिचित करवाएं:
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पीरियड्‌स या Menstruation को लेकर जिस तरह की सोच हमारे समाज में व्याप्त है उसके कारण यह एक बॉयोलॉजिक प्रक्रिया ना होकर बीमारी बन गया है, जिसके आने पर महिलाएं दुखी हो जाती हैं और उपेक्षित की भांति चार-पांच दिन गुजारती हैं. यह स्थिति आज भी सच है और सिर्फ ग्रामीण इलाकों में ही नहीं शहरी इलाकों में भी कमोबेश यही स्थित देखने को मिलती है. जैसा कि इस सीरीज में पहले बताया गया है कि 87 प्रतिशत महिलाएं सही तरीके से यह नहीं जानती कि आखिर उन्हें पीरियड्‌स आता क्यों है, तो इस संबंध में लोगों के बीच जानकारी का घोर अभाव है. जानकारी ना होने के कई कारण हैं, जिस पर आगे चर्चा की जायेगी, फिलहाल इस स्थिति का परिणाम यह है कि माहवारी पीरियड्‌स या Menstruation से कई तरह के मिथक जुड़ गये हैं. अंधविश्वास में फंसे लोग आज भी उनसे बाहर नहीं निकल पाये हैं और आस्था और धर्म के नाम पर इसे ढो रहे हैं.

कई पढ़ी लिखी महिलाएं पीरियड के दिनों में घर में दिया बाती नहीं करतीं. बल्कि अपने बच्चों, पति या किसी अन्य रिश्तेदार को घर के पूजा घर में दिया बाती करने को कहती हैं. उच्च शिक्षा लेने के बाद भी, बाहर नौकरी करने के बाद भी और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद भी उनके मन मस्तिष्क पर पीरियड्स से जुड़े मिथकों ने अपना कब्ज़ा जमा रखा है, वे अभी भी इसे बायोलॉजिकल प्रोसेस के रूप में लेने को तैयार नहीं. एक बेहद शिक्षित और आर्थिक रूप में आत्मनिर्भर महिला, सीमा ने बातचीत में बताया कि जिन दिनों वे पीरियड में होती हैं, तो वे अपने बेटे को समझाती हैं कि ये एकदम नार्मल प्रक्रिया है, ये नहीं होता तो बेटे, तुम इस दुनिया में नहीं आते. इसलिए महिलाओं की इज्ज़त करना सीखो. पर साथ ही वे ये भी कहती हैं, जिन दिनों में अपने बेटे से कहती हूं कि वे घर के देवता के आगे दिया बाती कर दे, तो वो समझ जाता है कि मम्मी पीरियड में हैं. अशिक्षित महिलाओं की बात छोड़ दें, पढ़ी लिखी महिलाएं भी इन दिनों मंदिरों में जाने से हिचकती हैं.

क्या हैं मिथक
हमारे देश अभी भी शत प्रतिशत साक्षरता दर के लक्ष्य से दूर है, और इसमें महिलाओं में पुरुषों की तुलना में कम साक्षरता की दर की अपनी भूमिका रही है. जहां पुरूषों में साक्षरता का दर 78 प्रतिशत है, वहीं महिलाओं में यह 55 प्रतिशत है. मिथकों की बात चली है तो शिक्षा और जानकारी के अभाव में महिलाएं खुद को मिथकों से जल्दी जोड़ लेती हैं. कुछ प्रचलित मिथक जो समाज में आज भी विद्यमान हैं-
1. पीरियड्‌स के दौरान पूजा नहीं करनी चाहिए. (यह मिथक हर धर्म में कमोबेश है. हिंदू अगर पूजा नहीं करते तो मुसलमान और ईसाई महिलाएं भी धार्मिक कामकाज से दूर रहती हैं.
2. धार्मिक टैबू में फंसी महिलाओं को घर के कामकाज से भी दूर कर दिया जाता है. कई जगहों पर उनके रसोई घर, पूजा घर और भंडारगृह में प्रवेश पर रोक लगा दिया जाता है.
3.वे सबसे अलग-थलग रहती हैं, फर्श पर सोती हैं, खेलना-कूदना और बाहर जाना तक प्रतिबंधित हो जाता है.
4. ऐसी धारणा है कि माहवारी के आने से महिलाएं अछूत हो जाती हैं और अगर वे किसी चीज को स्पर्श करेंगी तो वह भी अछूत या खराब हो जायेगा, इसलिए इस दौरान महिलाएं अचार, तुलसी का पौधा आदि का स्पर्श नहीं करती हैं.
5. ग्रामीण इलाकों में ऐसा अंधविश्वास है कि अगर पीरियड्‌स के दौरान इस्तेमाल किये जा रहे कपड़े को कोई देख लेगा तो उसपर जादू-टोना किया जा सकता है, इसलिए महिलाएं इसकी साफ-सफाई के काम को दबा छिपाकर कर करती हैं.

मिथकों के नकारात्मक परिणाम
समाज में व्याप्त मिथकों के कारण महिलाओं पर इसके कई नकारात्मक परिणाम दिखते हैं. मसलन-
1. महिलाएं इन 4-5 दिनों में डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं और काफी दुखी रहती हैं.
2. छोटी बच्चियां तो अलग-थलग रखे जाने साफ-सफाई की उचित व्यवस्था ना होने के कारण urinary tract infections (UTI) और respiratory tract infections (RTI) की शिकार हो जाती हैं.
3. जानकारी के अभाव और मिथकों के कारण लड़कियां डिप्रेशन, अपराधबोध, फ्रस्ट्रेशन का शिकार हो जाती हैं.
4. सेनेटरी पैड या घर में बने पैड के सही डिस्पोजल की व्यवस्था ना होने के कारण यह आम कचरे के साथ जहां-तहां फेंका जाता है जो पर्यावरण पर संकट का कारण बनता है.
5. पीरियड्‌स की शुरुआत में लड़कियां इस कदर परेशान होती हैं कि लड़कों से बात करना और स्कूल जाना तक छोड़ देती हैं.

पहली किस्त – देश में 87 प्रतिशत महिलाएं नहीं जानती पीरियड्‌स क्यों आता है!

 


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