शराबबंदी की सफलता:जहां कभी रोज बनती थी शराब, अब वहाँ महिलाएं बेच रहीं दूध

पूर्णिया के नगर प्रखंड का आदिवासी बाहुल्य अलीनगर गांव शराबबंदी से पहले देसी शराब बनाने के लिए जाना जाता था. सौ घर की आबादी वाले इस गांव के हर घर में देसी शराब बनती थी और उसे बेचा जाता था. शराबबंदी के बाद पारंपरिक रोजगार छिन जाने के बाद इन लोगों के मन में यह भय समा गया कि अब उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी?

आज उसी गांव में महिलाएं रोज 300 लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन कर न सिर्फ अपने परिवार का गुजर-बसर कर रही हैं, बल्कि समाज को भी प्रेरित कर रही हैं.

गांव में संचालित अलीनगर दुग्ध विकास समिति की सदस्य पार्वती मरांडी बताती हैं-हमलोगों के लिए यह काफी मुश्किल था कि शराब के धंधे को छोड़ कुछ दूसरा काम किया जाए. तभी गांव में पहली बार किसी ने सरकारी योजना से गाय खरीदी. उसे देखकर मैंने भी गाय खरीद ली. पहले दो, फिर दो से चार गाय हुईं. धीरे-धीरे दूसरी महिलाएं भी इस व्यवसाय से जुड़ने लगीं. आज गांव में 20 से ज्यादा परिवारों का भरण-पोषण गाय से ही हो रहा है. हम इस पेशे से खुश हैं। घर में भी खुशहाली आ गई है.

बच्चे अब दूध पी रहे हैं

मोनिका बताती हैं पहली बार जब वह ब्याह कर गांव आईं तो देखा कि हर घर में शराब बन रही और बेची जा रही है. बच्चों के पीने तक का दूध नहीं मिलता था. किसी तरह परिवार की गाड़ी चलती थी. आज मेरे पास 8 गाय हैं और प्रतिदिन 80 किलो दूध बेच रहे हैं. अब दूध की गुणवत्ता की जांच भी सीख लिया है.

 


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