जब मुकेश की जगह किशोर गाने वाले थे: चल री सजनी अब क्या सोचे

Balendushekhar Mangalmurty is editor-in-chief of marginalised.in

आज महान पार्श्व गायक मुकेश का जन्मदिन है. बॉलीवुड के पार्श्व गायन के इतिहास में जिस त्रिमूर्ति ने पचास, साठ और सत्तर के दशक में राज  किया, उस त्रिमूर्ति – रफ़ी, किशोर की तीसरी मूर्ति मुकेश थे. पचास का दशक सच कहिये तो पुरुष गायकों में तलत महमूद का था. उन दिनों वे ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार की आवाज थे. कोई भी महफ़िल होती थी, तो सबसे अंत में गाने के लिए बुलाये जाते थे तलत. ऐसी ही एक महफ़िल में उन्हें सुनते हुए किशोर कुमार ने बगल में बैठे मन्ना डे से कहा: दादा, चलिए हमलोग भाग चलें, तलत को सुनने के बाद हमें कौन सुनेगा? खैर किशोर अपनी चुहलबाजी के लिए प्रसिद्द थे. 60 के दशक में रफ़ी नंबर वन मेल सिंगर बन कर उभर चुके थे. वे हर तरह का गाना, हर तरह के किरदार के लिए गा रहे थे. मुकेश मजाक किया करते थे: यार , तू कभी बीमार भी नहीं पड़ता, कि हमलोगों को भी कुछ गाने को मिले.

70 के दशक में परिदृश्य बदल चुका था और किशोर नंबर वन मेल सिंगर बन कर उभर चुके थे, राजेश खन्ना की आंधी और फिर अमिताभ बच्चन की एंग्री यंग मैन की छवि ने किशोर की मदद की और वही किशोर भी राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की प्रसिद्धि में बेहद महत्वपूर्ण कड़ी बन कर उभरे. सत्तर के दशक में अक्सरहां होता ये था कि रफ़ी के हिस्से एक्का दुक्का गाने आये करते थे और कई बार वे किशोर के गाये गीतों पर भारी पड़ते थे. 60 के दशक में यही बात रफ़ी और मुकेश में हो रही थी. एक ही फिल्म में रफ़ी के कई गाये गीतों पर मुकेश का एक गीत भारी पड़ जाता था. इसी कड़ी में बात बढाते हुए बात की जाए मुकेश के एक बेहतरीन गीत “चल री सजनी अब क्या सोचे” की”.

1960 में राज खोसला देव आनंद और बंगाल की बेहतरीन अभिनेत्री सुचित्रा सेन को लेकर एक म्यूजिकल और क्राइम थ्रिलर फिल्म बम्बई का बाबू बना रहे थे. संगीत दे रहे थे सचिन देव बर्मन. इस फिल्म में एक सिचुएशन आता है, जब फिल्म में नायक की बहन शादी के बाद ससुराल जा रही है, माता पिता उदास हैं और बैकग्राउंड में विदाई गीत चल रहा है.

इस फिल्म के बाकी सारे गाने रफ़ी साहब ने गाये हैं, पर जब इस गीत की बात आई, तो इसका सिचुएशन अलग था. परदे पर इसे देव आनंद को नहीं गाना था. ये गाना बैकग्राउंड में चलना था. देव आनंद की राय थी कि इस गाने को किशोर गायें. सचिन देव बर्मन किशोर पर काफी स्नेह रखते थे, पर वे चाहते थे कि इस गाने को मुकेश गायें. बर्मन दा के प्रिय गायक रफ़ी और किशोर थे, जिन्हें वे टेनिस के लहजे में अपना फर्स्ट सर्व और सेकंड सर्व कहते थे. मुकेश की गायकी के रेंज को वे सीमित मानते थे, पर मुकेश की आवाज की दर्द के वे शौक़ीन थे. तो उन्होंने तय किया कि इस गाने को मुकेश गायेंगे. बर्मन डा की आदत थी कि एक बार जब वे तय कर लेते थे, तो उन्हें फिर अपने निर्णय से कोई डिगा नहीं सकता था.

जब मुकेश ने बम्बई का बाबु फिल्म में “ चल री सजनी” गाया, तो फिल्म का यही गाना सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ और उस साल बिनाका संगीत माला में उंचा स्थान पा सका.

वैसे मुकेश की आवाज का सचिन देव बर्मन ने काफी कम इस्तेमाल किया, पर जब भी इस्तेमाल हुआ, गज़ब का जादुई इफ़ेक्ट पैदा हुआ. 3 साल के बाद सचिन देव बर्मन ने एक बार फिर मुकेश की आवाज का इस्तेमाल बैकग्राउंड सांग  के लिए बंदिनी फिल्म (1963) में किया: वो जाने वाले राही हो सके तो लौट के आना. आज तक इस गाने को दुहराया जा रहा है.

22 जुलाई 1923 को जन्मे मेलोडी किंग मुकेश को बॉलीवुड में लेकर आये थे एक्टर मोतीलाल ने. शुरुआत में उनकी गायकी पर सहगल साहब की छाप थी, पर जैसा कि हर महान गायक के साथ होता है, समय के साथ उन्होंने अपनी अलग शैली विकसित की. त्रिमूर्ति के तीनों गायकों में मुकेश ने सबसे कम गाने गाये, सबसे कम फिल्म फेयर अवार्ड जीते (4), रफ़ी (6), किशोर( 8),  त्रिमूर्ति में सबसे पहले दुनिया छोड़ी, पर आज तक उन्हें दुनिया सुन रही है. उनके दर्द भरे नगमे की आज भी दुनिया दीवानी है. उनकी याद को नमन.


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