अपनी साइज का ब्रा भी नहीं पहन पाती हैं भारतीय महिलाएं, सेक्स नहीं करने के कारण पिटती हैं…

एक 22 साल की लड़की, वजन 75-80 किलो के आसपास. अकसर घबराहट और सीने में दर्द की शिकायत लेकर डाॅक्टर के पास गयी. उसे देखकर डाॅक्टर ने पहला सवाल यह किया कि वह कितने नंबर का ब्रा पहनती है, जवाब में लड़की मां की ओर देखती है, मां बताती है 36 नंबर का. डाॅक्टर भड़क उठती है, इतना वजन है लड़की का, सीना भी विकसित है फिर इतने छोटे नाप का ब्रा क्यों पहनती है? इसे इसकी साइज का ब्रा पहनायें, इस बार लड़की की मां भी चुप थी. डाॅक़्टर ने फटकार लगायी, इसे बीमारी हो सकती है आप समझती क्यों नहीं, जवाब में मां-बेटी दोनों के मुंह से निकला, वो समझें तब ना. दरअसल बात यह थी कि लड़की को उसके पिता ब्रा लाकर पहनने को देते थे, जो उसकी साइज से बहुत छोटा था, बावजूद इसके लड़की चुप थी, क्योंकि उसके पास निर्णय का अधिकार नहीं. जिन लोगों को यह बात सुनने में अजीब लगे वे यह जान लें कि यह एक सच्ची घटना है और आलेख लिखने वाले ने उस लड़की से बात भी की है, लेकिन लड़की की पहचान बताना जरूरी नहीं इसलिए सिर्फ घटना का जिक्र किया जा रहा है.

दरअसल यह एक उदाहरण मात्र है भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति का. हमारे समाज में आज भी महिलाओं को निर्णय का अधिकार नहीं है. वह घर के पुरुष सदस्यों के ऊपर निर्भर हैं. बाद चाहे कैरियर की हो, शादी-बच्चों की, संपत्ति की या फिर पहनने ओढ़ने की, महिलाओं के पास निर्णय का अधिकार बहुत सीमित है. शादी किससे करनी है कब हमबिस्तर होना है, क्या पहनना है, यहां तक कि कमाये गये पैसों पर भी हक किसका हो यह सारे अधिकार दूसरों के पास सुरक्षित हैं.

कमाये गये पैसों पर अधिकार

 

हालांकि हमारे देश में ‘महिला सशक्तीकरण का बिगुल’ फूंका जा चुका है बावजूद इसके देश में बहुत कुछ किया जाना शेष है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) 2015-16 के अनुसार आज हमारे देश में 31 प्रतिशत विवाहित महिलाएं नौकरीपेशा हैं. जिनमें से 80 प्रतिशत नकद पैसे कमाती हैं जबकि 16 प्रतिशत को भुगतान नहीं किया जाता है. इन महिलाओं में 10 में से आठ ऐसी है जो अपने पति के साथ यह तय कर सकती है कि वे उनके द्वारा कमाये गये पैसे को वे कैसे खर्च करेंगी यानी 82 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो अपने पति के साथ यह तय कर सकती है कि वे अपने कमाये पैसे का उपयोग कैसे करेंगी. मात्र 21 प्रतिशत महिलाएं ऐसी है जो अकेले यह तय करती हैं कि वे अपने कमाये पैसे को कैसे खर्च करेंगी.17 प्रतिशत महिलाएं ऐसी है जिनके सिर्फ पति यह तय करते हैं कि उसके पैसों को कैसे खर्च किया जायेगा. NFHS-3 से अगर तुलना करें तो नौकरीपेशा महिलाओं की संख्या घटी है हालांकि उनकी कमाई में वृद्धि हुई है. पहले 64 प्रतिशत महिलाएं नकद कमाती थी अब 80 प्रतिशत नकद कमा रही हैं.

बैंक एकाउंट और मोबाइल फोन

बात अगर बैंक एकाउंट और मोबाइल फोन की करें तो देश में 53 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जिनका अपना बैंक एकाउंट है जबकि 46 प्रतिशत महिलाओं के पास मोबाइला फोन है. इन महिलाओं में से दो तिहाई अपने मैसेज को फोन पर पढ़ पाती हैं. 42 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो बैंक में जमा पैसों को अपनी मर्जी के अनुसार खर्च करती हैं

परिवार के फैसलों में भागीदारी

परिवार के फैसलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली विवाहित महिलाओं की संख्या दो तिहाई से कम है यानी कि लगभग 63 प्रतिशत है. यहां तक कि वह अपने स्वास्थ्य समस्याओं, घर के खर्चे और किसी रिश्तेदार के घर जाने के फैसले में भी खुद निर्णय नहीं लेती हैं और परिवार के पुरुष सदस्यों पर आश्रित हैं. हालांकि 16 प्रतिशत महिलाएं ऐसी है जो इन विषयों पर कोई राय नहीं देती हैं. वैसे संतोषजनक यह है कि NFHS-3 के मुकाबले में निर्णय लेने के मामले में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है.

52 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं पतियों को है पीटने का हक

 

एक सच्चाई यह भी है कि देश में 52 प्रतिशत महिलाएं इस बात से सहमत है कि पतियों को उन्हें पीटने का अधिकार है. पत्नी की पिटाई के जो कारण हमारे देश में गिनाये जाते हैं वे हैं, 1. बिना बताये बाहर जाना, 2. बच्चों की उपेक्षा करना, 3. पति के साथ बहस करना. 4 शारीरिक संबंध से इनकार करना, 5. सही तरीके से खाना ना बनाना, 6. सास-ससुर का अपमान करना 7. धोखा देना या इनमें से कोई भी एक कारण हो तो पत्नी की पिटाई इस देश में संभव है. हालांकि NFHS-3 के मुकाबले इसमें भी बदलाव आया है.

संपत्ति पर हक

संपत्ति की बात करें तो आज देश में 37 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जिनके नाम पर मकान है या वह उस मकान की सहमालिक हैं. जबकि 27 प्रतिशत ऐसी महिलाएं हैं जिनके नाम पर जमीन है या वह जमीन की सहमालिक है.


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