श्रद्धांजलि : तन चला गया, यादें रह गयीं: कभी न भुलाए जाने वाले अटल

अटल, जिनकी याद टल नहीं सकती. यादों के झरोखे से अटल:

अटल बिहारी वाजपेयी भारत के दसवें प्रधानमंत्री थे. इनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को हुआ था. इसे गुड गवर्नेंस डे के रुप में मनाया जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 13 दिनो के लिए 1996 में प्रधानमंत्री बने थे. इसके बाद 13 अक्टूबर 1999 को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ली और 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. अटल बिहारी वाजपेयी पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया. करीब चार दशकों तक अटल बिहारी वाजपेयी सांसद रहे. अटल बिहारी वाजपेयी दस बार लोकसभा में चुनकर आए जबकि दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए.  16 अगस्त 2018 को उनका दिल्ली में निधन हो गया. भारत रत्न और तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी का गुरुवार शाम 5.05 बजे निधन हो गया. वे 93 वर्ष के थे. दो महीने से एम्स में भर्ती थे.

1957 में अटलजी पहली बार सांसद बने थे. भाजपा नेता जगदीश प्रसाद माथुर और अटलजी दोनों एक साथ चांदनी चौक में रहते थे. पैदल ही संसद जाते-आते थे. छह महीने बाद अटलजी ने रिक्शे से चलने को कहा तो माथुरजी को आश्चर्य हुआ. उस दिन उन्हें बतौर सांसद छह महीने की तनख्वाह एक साथ मिली थी.

 

1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई. 1953 में इसका पहला राष्ट्रीय अधिवेशन था. आडवाणी बताते हैं कि एक डेलीगेट होने के नाते मैं राजस्थान से आया था, तब पहली बार अटलजी को देखा और सुना. वे एक बार राजस्थान आए. पार्टी ने मुझे उनके साथ रहने के निर्देश दिए थे. उनकी ऐसी छाप मेरे मन पर पड़ी कि मैं जीवन भर उस अनुभव को नहीं भूल पाया, क्योंकि उन्होंने मेरे मन में कॉम्प्लेक्स पैदा कर दिया कि मैं नहीं चल पाऊंगा इस पार्टी में, क्योंकि जहां इतना योग्य नेतृत्व हो, वहां मेरे जैसा व्यक्ति जो एक कैथोलिक स्कूल में पढ़कर आया हो, जिसे हिंदी बहुत ही कम आती हो, वो कैसे काम करेगा?

आडवाणी के मुताबिक, दिल्ली में नयाबांस का उपचुनाव था. हमने बड़ी मेहनत की, लेकिन हम हार गए. हम दोनों खिन्न थे, दुखी थे. अटलजी ने मुझसे कहा कि चलो, कहीं सिनेमा देख आएं. अजमेरी गेट में हमारा कार्यालय था और पास ही पहाड़गंज में थिएटर. नहीं मालूम था कि कौन-सी फिल्म लगी है. पहुंचकर देखा तो राज कपूर की फिल्म थी- ‘फिर सुबह होगी’. मैंने अटलजी से कहा, ‘आज हम हारे हैं, लेकिन आप देखिएगा सुबह जरूर होगी.’ हम अक्सर तांगे से अजमेरी गेट से झंडेवालान तक खाना खाने जाते थे.

1971 में ताशकंद समझौते में हाजीपीर व ठिथवाल की जमीन वापस देने के फैसले खिलाफ आंदोलन भी हुआ था. भाजपा नेता राजेंद्र गहलोत व दामोदर बंग ने बताया कि अटलजी व आड़वाणी सहित सभी विपक्षी दलों ने सरहद पर सत्याग्रह शुरू किया. अटलजी रेलवे स्टेशन के सामने जनसभा को संबोधित कर मुनाबाव चले गए. यहां से गुमानमल लोढ़ा, जगदीश माथुर, राजेंद्र गहलोत, दामोदर बंग भी साथ गए. वे बाड़मेर से चलकर 160 किमी दूर पाकिस्तान के सिंध प्रांत के छाछरू गांव गए. इसी दौरान उनके अपहरण की खबर उड़ गई. जब वे वापस बाड़मेर पहुंच तो अपने अपहरण की चर्चा सुनी तो बोले- किसकी मां ने अजमा खाया, जो मेरा अपहरण कर ले। उनके बोलते ही सभी कार्यकर्ता ठहाके मारकर हंसने लगे.

सालों पहले अटल ने पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी को लेकर इंदिरा गांधी सरकार पर हमला बोला और विरोध जताने के लिए बैलगाड़ी से संसद पहुंच गए थे.

1977 में भारत के इतिहास में पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित कर अटल ने सबको हैरान कर दिया था. विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने 1977 से 2003 तक संयुक्त राष्ट्र महासभा को 7 बार संबोधित किया था.

काठमांडु से हाइजैक कर कंधार ले जाए गए इस विमान से यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के लिए वाजपेयी सरकार ने आतंकी मौलाना मसूद अजहर और ओमर सईद शेख को रिहा किया. आतंकी मसूद अजहर ने बाद में चलकर पाकिस्तान में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद बनाया और ओमर शेख ने 9/11 का हिस्सा रहने के साथ-साथ अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या भी की.

नाभिकीय हथियारों में कटौती करने, कश्मीर विवाद और सीमा पार आतंकवाद पर बातचीत करने के लिए वाजपेयी और मुशर्रफ दो दिनों के लिए आगरा में मिले. हालांकि यह बातचीत सफल नहीं हुई. मुशर्रफ ने भारतीय संपादकों से बात करते हुए कहा कि कश्मीर अकेला मुद्दा है. भारत ने ड्राफ्ट अग्रीमेंट को खारिज कर दिया.

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के 5 आतंकियों ने संसद को थर्रा दिया. भारतीय संसद पर हुए इस हमले में आतंकियों सहित कुल 12 लोगों की मौत हुई थी. वाजपेयी सरकार ने इस हमले की कड़ी प्रतिक्रिया देने का फैसला लिया.  5 लाख से अधिक सैनिकों को सीमा पर खड़ा कर दिया गया. फाइटर विमान और नेवी के जहाज कड़ा संदेश देने के लिए तैयार कर दिए.  छह महीने तक सीमा पर तनाव की स्थिति रही और एक्सपर्ट्स का मानना है कि दोनों देश दो बार युद्ध के बिल्कुल नजदीक तक पहुंच गए थे. बाद में अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद मुशर्रफ ने बयान जारी किया और सीमा पर से सैनिक हटाए गए.

वाजपेयी ने तब गुजरात सीएम नरेंद्र मोदी को बर्खास्त नहीं करने का फैसला किया. गुजरात दंगों के दौरान राज्य मशीनरी पर ऐंटी मुस्लिम हिंसा में सहभागी होने के आरोप लगे थे. ऐसे में मोदी सरकार की निंदा करने में हिचकिचाहट को लेकर वाजपेयी की आलोचना हुई थी. तब अहमदाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पीड़ितों के पुनर्वास की घोषणा करते हुए वाजपेयी ने कहा था कि मोदी को राजधर्म का पालन करना चाहिए.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल के न‍िधन पर कानपुर के म‍िठाई शॉप ठग्‍गू के लड्डू के व‍िक्रेता बेहद दुखी हैं. उन्‍होंने बताया कि अटलजी को उनकी दुकान के लड्डू बेहद पसंद थे. जब भी कानपुर के बीजेपी नेता उनसे म‍िलने जाया करते थे तो दुकान से उनकी मनपसंद म‍िठाई पैक करवाना नहीं भूलते थे. कानपुर स्‍थ‍ित म‍िठाई की दुकान ठग्‍गू के लड्डू के व‍िक्रेता ने बताया कि खोए और मेवे से तैयार शुद्ध देशी घी से बने लड्डू अटलजी खाना बहुत पसंद करते थे.

समधन बोलीं, चाट खाने के थे शौकीन
अटल की दत्तक पुत्री नमिता की भांजी अंजली का विवाह गाजियाबाद के नेहरु नगर में रहने वाले मुकुल के साथ वर्ष-2004 में हुआ. पीएम रहते हुए वाजपेयी जी विवाह में शामिल होने यहां आए थे. यहां रहने वाली उनकी समधन उमा बताती हैं कि शादी में वह कई घंटे रुके थे. इसके बाद वह कई बार यहां आए. वह बताती हैं कि अटल जी चाट खाने के शौकीन थे. वह जब भी मिलते थे तो पूछते थे कि गाजियाबाद में कहां पर अच्छी चाट मिलती है. इधर से गुजरते समय वह कई बार पिलखुवा में चाट खाने रुक जाते थे.

उनका उत्तर प्रदेश के मथुरा से खास लगाव था. 1957 में अटल यहां से चुनाव लड़े और उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने शहर से कभी अपना नाता नहीं तोड़ा. अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में अटल पांच बार चुनाव हारे लेकिन उनको सबसे बुरी हार मथुरा में मिली. अटल यहां से निर्दलीय प्रत्याशी राजा महेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ चुनाव लड़े थे.   1957 में अटल जी तीन लोकसभा सीटों मथुरा, लखनऊ और बलरामपुर से चुनाव लड़े थे. इन तीन सीटों में से वह बलरामपुर की संसदीय सीट से लोकसभा पहुंचे थे.

जब अटल प्रधानमंत्री थे तब उनके बहन के नाती मनीष मिश्रा की ट्रेन से फेंककर हत्या कर दी गई थी. 2004 में मनीष छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में सफर कर रहे थे. ट्रेन में कुछ शराबी छेड़खानी कर रहे थे. मनीष ने उनका विरोध किया. इस पर उन लोगों ने उन्हें मथुरा के कोसी कल्याण के पास ट्रेन से धक्का दे दिया था.

लोकसभा सदस्य के उनके पहले कार्यकाल में ही उनका भाषण सुनकर नेहरू ने कह दिया था कि वह एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे. उसके बाद संसद में प्रतिपक्ष के एक नेता के तौर पर सरकार की तारीफ का रेकॉर्ड भी लोकस्मृति में उन्हीं के नाम दर्ज है. बांग्लादेश युद्ध में जीत के बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार कहा था. नब्बे के दशक में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष रखने वाले प्रतिनिधिमंडल की अगुआई की पेशकश की तो   उन्होंने न केवल जिनीवा में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की अगुआई की चुनौती स्वीकार की बल्कि उस कठिन मोर्चे पर देश को महत्वपूर्ण कूटनीतिक जीत भी दिलाई.

लखनऊ से पूर्व सांसद और अटल बिहारी वाजपेयी के बहुत करीबी रहे लालजी टंडन ने उन्हें याद करते हुए कहा : अटल जी से हमने 1991 में लखनऊ से चुनाव लड़ने का अनुरोध किया तो वह बोले-क्या तुम लोग मुझे फिर से हरवाना चाहते हो. दरअसल, वह लखनऊ से 1954, 1957 और 1962 में चुनाव हार चुके थे. उसके बाद यहां से कभी चुनाव नहीं लड़ा था. हालांकि, उन्होंने सबका अनुरोध स्वीकार किया. वह 1991 में लखनऊ और मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव लड़े. लोगों ने पूछा कि दोनों जगह जीत गए तो कहां की सीट छोड़ेंगे? उन्होंने जवाब दिया-जहां से ज्यादा वोट मिलेंगे, वह सीट रखूंगा. लखनऊ वाले उनकी अपेक्षा पर खरे उतरे. एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीते और फिर विदिशा की सीट छोड़ दी. तब से अटल लगातार लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़े और जीतते रहे.

अटल एक भावुक कवि भी थे.  उनकी कविताओं का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा है. हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं… उनकी लोकप्रिय कविताओं में से एक है. संसद से लेकर जनसभाओं तक में वह अक्सर कविता पाठ के मूड में आ जाते थे.

खूबसूरत वादियों वाले मनाली पर अटल  इतने मोहित थे कि उन्होंने न केवल प्रीणी गांव में अपना घर बना लिया था बल्कि ‘बुलाती तुम्हें मनाली’ शीर्षक से कविता भी लिखी थी. वाजपेयी यहां हर साल आया करते थे और पूरा एक दिन हिमाचल प्रदेश के कवियों के बीच रहते थे. वाजपेयी को प्रीणी गांव और यहां के बाशिंदों से इतना लगाव हो गया था कि वह इसे अपना दूसरा घर कहते थे. वाजपेयी अक्सर कहते थे कि वह मनाली के बिना नहीं रह सकते.

बात 1957 के लोकसभा चुनाव की है, अटल बलरामपुर लोकसभा से जनसंघ के प्रत्याशी थे और देर रात चुनाव प्रचार करने के बाद बलरामपुर में अपने मित्र राम दुलारे मिश्र के यहां रात्रि विश्राम करते थे. एक दिन रात में दो बजे अटल चारपाई पर बैठे थे. बगल में सो रहे साथी बैजनाथ सिंह ने पूछा कि क्या आपको नींद नहीं आ रही है. अटल ने कहा, ‘सोना तो चाहता हूं लेकिन मच्छर और कांग्रेस दोनों नींद में खलल डाल रहे हैं. अब कांग्रेस के साथ-साथ मच्छरों के खिलाफ भी लड़ाई लड़नी पड़ेगी.’

साल 1988 में जब अटल  किडनी का इलाज कराने अमेरिका गए थे तब धर्मवीर भारती को लिखे एक खत में उन्होंने मौत की आंखों में देखकर उसे हराने के जज्बे को कविता के रूप में सजाया था. आज एक बार फिर याद आ रही यह कविता थी- ‘मौत से ठन गई’…

ठन गई! 
मौत से ठन गई! 

जूझने का मेरा इरादा न था
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई। 

जब राजीव गांधी ने बचाया था अटल को
धर्मवीर को लिखे खत में अटल ने बताया था कि डॉक्टरों ने उन्हें सर्जरी की सलाह दी है. उसके बाद से वह सो नहीं पा रहे थे. उनके मन में चल रही उथल-पुथल ने इस कविता को जन्म दिया था. दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिका में अटल को इलाज के लिए भेजने के पीछे एक बड़ा योगदान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का था. राजीव ने संयुक्त राष्ट्र को भेजे डेलिगेशन में अटल का नाम शामिल किया था ताकि इसी बहाने अटल अपना इलाज करा सकें. अटल हमेशा इस बात के लिए राजीव गांधी की महानता की सराहना करते रहे और कहते रहे कि राजीव की वजह से ही वह जिंदा हैं.

हाजिरजवाब अटल:

पाकिस्तान में मौजूद आतंकी कैंपों पर अटल ने कहा था- पड़ोसी कहते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती है, हमने कहा कि चुटकी तो बज सकती है. पाकिस्तान के नेता अक्सर कश्मीर राग अलापते रहते हैं. ऐसे ही एक बार पाकिस्तानी मंत्री ने कह दिया कि कश्मीर के बिना पाकिस्तान अधूरा है. इसपर अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रतिक्रिया दी कि पाकिस्तान के बिना हिंदुस्तान अधूरा है. बिहार में लोगों को संबोधित करते हुए अटल ने कहा था, ‘मैं अटल हूं, मैं बिहारी भी हूं.’

1991 के अटल मध्यप्रदेश नहीं लौट सके:

1991 के बाद उन्होंने प्रदेश की राजनीति से खुद को अलग कर लिया था. अटल ने 1991 का चुनाव लखनऊ के साथ विदिशा से भी लड़ा था लेकिन बाद में उन्होंने लखनऊ को चुना और विदिशा को छोड़ दिया था. इसी के चलते बीजेपी ने युवा नेता शिवराज सिंह को विदिशा से उपचुनाव लड़ाया और शिवराज 2005 तक विदिशा के सांसद रहे. अटल के ग्वालियर से लगाव के किस्से ग्वालियर के लोग बड़े चाव से सुनाते हैं लेकिन 1984 में माधवराव सिंधिया से चुनाव हारने के बाद वह ग्वालियर से दूर हो गए थे. मीठे के शौकीन अटल बहादुरा के लड्डू कभी नहीं भूले.ग्वालियर के जर्रे-जर्रे में अटल की कहानियां समाई हुई हैं.

जामा मस्जिद के शाही इमाम की यादों में अटल:

जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी याद करते हैं: बात 1977 की है, जब वह जामा मस्जिद आए. तमाम हालात पर उन्होंने बात की. तब से हमारे ताल्लुकात उनसे बेहद दोस्ताना रहे. अक्सर उनसे मैं मुलाकातें किया करता था. कभी-कभी वाजपेयी साहब मुझे फोन करके बुला भी लिया करते थे. वाजपेयी साहब नेकदिल इंसान थे, मैं उनको बेहतरीन शख्सियत के तौर पर देखता हूं.  अगर कोई हिंदू-मुसलमान के बीच दूरियों की बात करता था तो वो अक्सर कहते थे कि ये देश के लिए अच्छा नहीं है. हिंदू-मुसलमान के बीच भाईचारे को पसंद करते थे. वाजपेयी साहब हर समुदाय में लोकप्रिय थे.

सरकारीतंत्र पर प्रहार करने वाले अटल:

अटल के दौर में बहुत बड़ा काम निजीकरण का था. उनके वक्त में 32 सरकारी कंपनियों और होटलों का निजीकरण किया गया. इन्हें 5 साल के भीतर प्राइवेट कंपनियों को बेच दिया गया. यहां तक देश के इतिहास में पहली बार निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए विनिवेश विभाग का गठन किया गया. इसका काम निजीकरण के प्रस्तावों को मंजूरी देना था. इसके अलावा विनिवेश के लिए एक कैबिनेट कमिटी का भी गठन किया गया ताकि तेजी से इन प्रस्तावों को मंजूरी दी जा सके. सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला 1999-2000 में शुरू हुआ, जब अटल सरकार ने मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज को हिंदुस्तान यूनिलीवर को सौंपने का फैसला लिया. इसके बाद भारत अल्युमिनियम कंपनी, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, विदेश संचार निगम लिमिटेड और आईटी फर्म सीएमसी लिमिटेड को बेचने का काम किया. इसके अलावा घाटे में चल रहे कई सरकारी होटलों को भी उन्होंने निजी हाथों में दे दिया. इनमें कोलकाता के कोवलम अशोक बीच रिजॉर्ट और होटल एयरपोर्ट अशोक शामिल थे। इसके अलावा नई दिल्ली में स्थित रंजीत होटल, कुतब होटल और होटल कनिष्का को भी बेच दिया गया. हालांकि निजीकरण के ये कदम इतने आसान नहीं थे और उन्हें खासा विरोध झेलना पड़ा. बाल्को के निजीकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने फैसले को बरकरार रखा.

वाजपेयी सरकार ने राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए राजकोषीय जवाबदेही ऐक्ट बनाया. इससे सार्वजनिक क्षेत्र बचत में मजबूती आई और वित्त वर्ष 2000 में जीडीपी के -0.8 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2005 में 2.3 फीसदी तक पहुंच गई.

वाजपेयी सरकार अपनी नई टेलिकॉम पॉलिसी के तहत टेलिकॉम फर्म्स के लिए एक तय लाइसेंस फीस हटाकर रेवन्यू शेयरिंग की व्यवस्था लेकर लाई थी. भारत संचार निगम का गठन भी पॉलिसी बनाने और सर्विस के प्रविश़न को अलग करने के लिए इस दौरान किया गया था. वाजपेयी की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय टेलिफोनी में विदेश संचार निगम लिमिटेड के एकाधिकार को पूरी तरह खत्म कर दिया था.

अटल की यादों में बनारस, और बनारस की गलियां:

भारतरत्‍न अटल  की पत्रकारिता से लेकर राजनीतिक शिखर तक की यात्रा यूपी के वाराणसी से ही शुरू हुई थी. पत्रकारिता जीवन की तो बुनियाद ही बनारस में पड़ी. 1942 में चेतगंज के हबीबपुरा मोहल्‍ले से निकलने वाले अखबार ‘समाचार’ में उन्‍होंने लिखना शुरू किया था. 1948 में वाराणसी से उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक की पाक्षिक पत्रिका ‘चेतना’ का प्रकाशन किया और उसके सम्‍पादक रहे. महात्‍मा गांधी की हत्‍या के बाद देशभर में गिरफ्तारी के दौर में अटल को छिपने की जगह भी यहीं मिली थी.

पत्रकारिता जीवन की शुरुआत में अटल आधे पैसे कीमत वाले अखबार ‘समाचार’ में लेख, यात्रा संस्‍मरण और रिपोर्ट लिखा करते थे तो उसके बाद उनका आक्रामक लेखन ‘चेतना’ में पढ़ने को मिलता था. छह महीने में ही ‘चेतना’ के प्रकाशन पर रोक के बाद उन्‍होंने लखनऊ से पत्रिका ‘स्‍वदेश’ निकाली, लेकिन ज्‍यादा समय तक वह भी चल नहीं सकी. बाद में अटल बिहारी वाजपेयी अर्जुन और पांचजन्‍य के संपादक भी रहे.

अटल जी की पत्रकारिता जीवन की शुरुआत के साथी रहे वयोवृद्ध पन्‍नालाल गुप्‍त बताते हैं कि उस दौर में दूध विनायक में रहने वाले आरएसएस से जुड़े डा. राजाराम द्रविड़ का मकान उनका आश्रय स्‍थल बना था. वहीं से चेतना के प्रकाशन से लेकर जनसंघ की स्‍थापना के बाद की सारी गतिविधियां संचालित होती रहीं. पन्नालाल आगे बताते हैं, ‘बनारस शहर की जीवंतता उन्‍हें बेहद पसंद थी. लंबे प्रवास के दौरान वे कभी बनारस की गलियों में घूमते तो कभी रिक्‍शे पर बैठ सैर करते थे. अपने ऊपर खर्च होने वाले पाई-पाई का हिसाब रखने को उन्‍होंने बकायदा रजिस्‍टर तैयार कराया था.’

भारत में पिछले साल मोदी सरकार ने जब गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी को लागू किया तो इसे आजादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार करार दिया था. लेकिन, सच यह है कि एक राष्ट्र, एक कर की अवधारणा पर शुरुआती काम अटल बिहारी वाजेपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए ही हुआ था. वाजयेपी सरकार ने जीएसटी का मॉडल डिजाइन करने के लिए वर्ष 2000 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन फाइनैंस मिनिस्टर असीम दासगुप्ता की अध्यक्षता में समिति बनाई थी. उन्होंने विजय केलकर के नेतृत्व में टैक्स सुधारों की सिफारिशों के लिए एक कमिटी का गठन किया था. इस कमिटी ने ही बाद में मौजूदा टैक्स व्यवस्था को खत्म कर जीएसटी लाने की बात कही थी.

अटल, जिनकी याद टल नहीं  सकती. उनकी याद को नमन. श्रद्धांजलि !!!

 

 

 

 

 

 


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