बेलछी नरसंहार जब जातीय हिंसा में 11 दलित मजदूरों को जिन्दा जला दिया गया था

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

पटना: 1977 का चुनावी वर्ष था. मतदान के दिन से दो- चार दिन पहले, हरनौत विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत बेलछी गाँव में अवैध बंदूकों और अन्य घातक हथियारों के लैस, जमीन जायदाद वाले कुर्मियों के एक बड़े गुट ने गरीबों के घरों पर हमला कर दिया, ग्यारह खेत मजदूरों को घर से खींच कर निकाला और उन्हें घसीट कर खाली पड़े एक बंजर मैदान में ले गए. उनको कसकर बाँध दिया, फिर लकड़ियों और घास फूस का एक ढेर लगाया और आग लगा दिया. वे चीखते चिल्लाते रहे और जब तक उनकी जलती देह ठंडी नहीं पड़ गयी, ये लोग क्रूरता का नंगा नाच करते रहे.

इस घटना और इस बर्बर क्रूरता के बारे में जिसने भी सुना, दंग रह गया. बिहार में आने वाले वर्षों में अभी कई जातीय नरसंहार देखने वाला था. ये आने वाले उन तमाम दिल दहला कर रख देने वाले नरसंहारों  की कड़ी में पहला नरसंहार था, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर बिहार को एक कलंक दिया. मारे गये खेत मजदूरों में आठ पासवान थे और तीन सुनार थे.

बिहार के गांवों में मध्यवर्ती जातियों का उत्थान साठ के दशक से शुरू होता है, यादव, कुर्मी और कोयरी. लोहियावादी राजनीति, कांग्रेस का पतन, उच्च जातियों का गाँव छोड़कर शहरों की ओर बढना और नए करियर की ओर मुड़ना, ये तमाम चीजें थीं, जिसने गावों में मध्यवर्ती जातियों के उत्थान का मार्ग बनाया. जो भूमिहार और राजपूत अपनी जमीन बेच कर शहरों में बस रहे थे, उनकी जमीने इसी तीनों जातियों के लोग खरीद रहे थे. राजनीति में भी इनका वर्चस्व बढ़ रहा था. साथ ही राज्य की डेमोग्राफी में ये संख्या के लिहाज से भी मज़बूत थे. कृषि अर्थव्यवस्था के सिरमौर बन रहे थे, तो ऐसे में इस व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर खड़े दलित कृषि मजदूर के साथ महिलाओं की इज्ज़त, उचित मेहनताना आदि मुद्दों को लेकर टकराव होना शुरू हुआ. बाद में यही टकराव रणवीर सेना ( भूमिहार समर्थित, बिहार में भूमिहार यद्यपि संख्या बल में कम हैं, पर प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका, राजनीति और शिक्षा और जमीन पर अपनी संख्या बल के अनुपात से ज्यादा प्रभावी पकड़ रखते हैं) और नक्सालियों ( नक्सल आन्दोलन यूं तो बंगाल के नक्सल बाड़ी जिले से शुरू हुआ था, पर बिहार की मिटटी इस सामाजिक संघर्ष के लिए उर्वर थी; तो ऐसे में नक्सालियों ने जब दलितों के आत्मसम्मान, उचित मजदूरी का मुद्दा उठाया, तो उन्हें सहज भी दलितों का समर्थन और सहानुभूति मिल गयी, और फिर बिहार में जातीय संघर्ष ने खुनी रूप धर लिया) और बड़े विशाल, लंबा और खुनी हो गया.

बेलछी नरसंहार का मुख्य अभियुक्त महावीर महतो था:

बेलछी नरसंहार में मुख्य अभियुक्त, महावीर महतो ने गाँव में सार्वजनिक ( गैर मज़रुआ)संपत्ति- जमीनों, खाईयों, तालाबों- पर कब्ज़ा कर लिया था. स्थानीय प्रखंड कार्यालय और पुलिस थाने में उसका दबदबा था. उसके पास नौकर चाकर, लठैतों की अच्छी खासी संख्या थी, जिन्हें उसने बिना लाइसेंस के बंदूकें दे दी थीं. जल्द ही अपनी ताकत का फायदा उठाते हुए वह गाँव में सभी जातियों के लोगों को परेशान करने लगा और मारने पीटने लगा. उन्ही दिनों दुसाध जाति का एक युवक, सिंघवा, जो कृषक मजदूर था, अपनी ससुराल बेलछी में रहने चला आया. वहां उसने महावीर के अन्याय का विरोध करने लगा, और गाँव वालों को संगठित करना शुरू कर दिया. महावीर ने पाया कि वह सिर्फ अपनी ताकत के बल पर सिंघवा का मुकाबला नहीं कर सकता. ऐसे में उसने निर्दलीय विधायक इन्द्रदेव चौधरी की मदद मांगी, जो हरनौत के समीपवर्ती विधान सभा क्षेत्र अस्थावां से कुर्मियों के समर्थन से विजयी हुए थे.  कुर्मी समुदाय सिंघवा के नेतृत्व में उभरती हुई चुनौती को कुर्मियों के आत्मसम्मान के खिलाफ मान रहा था. ऐसे में सिंघवा और उसके साथियों को सबक सिखाने के लिए कई जिलों से बड़ी संख्या में कुर्मी जुटे और फिर उस दिन बेलछी नरसंहार को जन्म दिया. सिंघवा और उसके सभी सक्रीय साथी मारे गए.

बेलची हत्याकांड के कारण जिले में कुर्मियों और पासवानों के बीच शत्रुता की शुरुआत हुई. आगे चलकर कुर्मियों ने अपनी जातीय सेना बनायी. और पासवान नक्सलियों के समर्थन में आये.

इंदिरा गांधी का राजनीतिक पुनरुत्थान बेलछी से ही शुरू हुआ:

बेलछी नरसंहार के बाद कर्पूरी ठाकुर पहले राजनेता थे जिन्होंने दलितों और पिछड़ों को हथियार का लाइसेंस बांटने की बात कही थी. दूसरी ओर, इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद 1977 में हुए ऐतिहासिक आम चुनाव में बतौर प्रधानमंत्री अपनी और कांग्रेस की बुरी तरह हुई हार के बाद घर पर बैठी थीं. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सदारत में जनता पार्टी की सरकार बने बमुश्किल नौ महीने हुए थे तभी बिहार के इस दूरदराज गांव में दलितों का यह जघन्य कत्लेआम हो गया.

इस मुद्दे पर इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी मे बहुत देर तक तर्क – वितर्क हुआ था. तब सोनिया गांधी ने कहा था, “सुना है बिहार बहुत खतरनाक जगह है. बिहार पिछड़ा और असुरक्षित राज्य है. सुरक्षा के लिहाज से आप वहां मत जाइए.” उस समय सोनिया गांधी की उम्र 31 साल थी.राजनीति से दूर वे एक हाउस वाइफ थीं.

जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर इंदिरा गांधी ने मौका ताड़ा और दिल्ली से हवाई जहाज के जरिए सीधे पटना और वहां से कार से बिहार शरीफ पहुंच गईं. तब तक शाम ढल गई और मौसम बेहद खराब था. नौबत इंदिरा गांधी के वहीं फंस कर रह जाने की आ गई लेकिन वे रात में ही बेलछी पहुचने की जिद पर डटी रहीं.वे जब बेलछी पहुंची तो खौफजदा दलितों को ही दिलासा नहीं हुआ बल्कि वे पूरी दुनिया में सुर्खियों में छा गईं. हाथी पर सवार उनकी तस्वीर सब तरफ नमूदार हुई जिससे उनकी हार के सदमे में घर में दुबके कांग्रेस कार्यकर्ता निकलकर सड़क पर आ गए. इंदिरा के इस दुस्साहस को ढाई साल के भीतर जनता सरकार के पतन और 1980 के मध्यावधि चुनाव में सत्ता में उनकी वापसी का निर्णायक कदम माना जाता है.

सोनिया गांधी के बायोग्राफर जविएर मोरो ने इस घटना का विस्तार ने अपनी किताब “रेड साड़ी” में जिक्र किया है:

13 अगस्त 1977.  बहुत तेज बारिश हो रही थी. पटना से बेलछी जाने के जाने के रास्ते पर कई जगह पानी भर गया था. कीचड़ की वजह से चलना मुश्किल था. रास्ता इतना खराब हो गया था कि कार से आगे जाना नामुमकिन हो गया. सभी लोगों ने कहा कि अब ट्रैक्टर से ही आगे जाना संभव है. मैं अन्य सहयोगियों के साथ ट्रैक्टर पर चढ़ी. ट्रैक्टर कुछ दूर ही चल पाया था कि चक्का कीचड़ में फंस गया. मौसम और रास्ते की हालत देख कर साथ चल रहे सहयोगियों ने कहा कि अब लौट जाना चाहिए. बेलछी जाने का कार्यक्रम स्थगित कर देना चाहिए. लेकिन मेरे सिर पर धुन सवार थी कि किसी भी तरह बेलछी पहुंचना है. पीड़ित दलित परिवार से हर हाल में मिलना है.

मैंने कहा, जो लौटना चाहते हैं वे लौट जाएं, मैं तो बेलछी जाऊंगी ही. मैं जानती थी कि कोई नहीं लौटेगा. कीचड़- पानी के बीच हम आगे बढ़ते रहे. आगे जाने पर एक नदी आ गयी. नदी पार करने का कोई उपाय नहीं था. शाम हो चली थी. गांव वालों से नदी पार करने के बारे में पूछा. तब उन्होंने बताया कि यहां के मंदिर में एक हाथी है. लेकिन हाथी पर बैठने का हौदा नहीं है. मैंने कहा, चलेगा. हाथी का नाम मोती था. उस पर कंबल और चादर बिछा कर बैठने की जगह बनायी गयी. सबसे आगे महावत बैठा. उसके बाद मैं बैठी, फिर मेरे पीछे प्रतिभा पाटिल बैंठी. प्रतिभा काफी डरी हुईं थीं. वे कांप रहीं थीं और मेरी साड़ी का पल्लू कस कर पकड़े हुए थीं. जब हाथी नदी के बीच पहुंचा तो पानी उसके पेट तक पहुंच गया. अंधेरा घिर आया था. बिजली कड़क रही थी. ये सब देख कर थोड़ी घबराहट हुई लेकिन फिर मैं बेलछी के पीड़ित परिवारों के बारे में सोचने लगी. जब बेलछी पहुंची तो रात हो चुकी थी. पीड़ित परिवारों से मिली. मेरे कपड़े भींग चुके थे. मेरे पहुंचने पर गांव के लोगों को लगा जैसे कोई देवदूत आ गया है. उन्होंने मुझे पहनने के लिए सूखी साड़ी दी. खाने के लिए मिठाइयां दीं. फिर कहने लगे आपके खिलाफ वोट किया, इसके लिए क्षमा कर दीजिए.

पांच दिन बाद जब इंदिरा गांधी दिल्ली लौटीं तो सोनिया गांधी ने देखा कि उनके चेहरे पर मुस्कान है और आंखों में आत्मविश्वास नजर आ रहा है। इंदिरा गांधी को यकीन हो चुका था कि अब उनके दिन लौटने वाले हैं.

सुप्रसिद्ध पत्रकार, प्रभात खबर के पूर्व प्रधान सम्पादक और वर्तमान राज्यसभा के उप सभापति श्री हरिवंश इस घटना के बारह सालों के बाद बेलछी गए थे. वहां से उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग की, जो कुछ इस प्रकार है:

 

“बेलछी में लगभग 300 घर हैं. कुल आबादी करीब 2000 के आसपास. लगभग 35 घर कुर्मी हैं. इनमें भी विभेद है. कोटइसा कुर्मी (25 घर) और घमैला कुर्मी (10 घर) अलग-अलग हैं. इनके अलावा 30 घर पासवान, 50 घर मांझी, 10 घर कहार, तीन घर धानुक, 10 घर हरिजन, 10 घर यादव और छह घर तेली हैं. दूसरी जातियों के भी छिटपुट लोग हैं. 1977 में हुए नरसंहार के बाद सुनारों का परिवार यहां से उजड़ गया. इस परिवार के सभी पुरुष मारे गये. जिस गांव में हरिजनों-दुसाधों को निर्भीक बनाने के लिए इंदिरा गांधी ने राजनीतिक वनवास त्याग कर, कीचड़-पानी पार कर हाथी से यात्रा की, तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने जिन्हें ठोस आश्वासन दिये, उस गांव से असुरक्षा के कारण सुनार परिवार की महिलाएं चली गयीं. उनकी दुनिया उजड़ गयी. सुनार परिवार में एकमात्र लड़का बचा था, वह कहीं और चला गया. परिवार बिछुड़ने, घर टूटने और जमीन छूटने के दर्द से भला सत्ता को क्या लेना-देना!

चुनिंदा कुर्मी परिवारों को छोड़ इस गांव के दूसरे लोगों की गरीबी भयावह है. इस नरसंहार के दो प्रमुख षड्यंत्रकारियों महावीर महतो और परशुराम धानुक को फांसी लग चुकी है. जब यह संवाददाता उस गांव में पहुंचा, तो महावीर महतो की पत्नी फटी साड़ी पहने अपने घर के बाहर चावल कूट रही थी. पूछने पर बिफर कर बोली कि मैं महावीर की भौजाई हूं. घोर विपत्ति ने उसे तोड़ दिया है. एक तो असहाय औरत, दूसरे अपराधी की बीवी और चारों तरफ घोर सामंती समाज. ऊपर से चार-चार बच्चों की परवरिश. महावीर के चार लड़के हैं – सबसे छोटा 12 वर्ष का है. अंडरवीयर पहने, खुले बदन, फटा हुआ अंगौछा. सबसे बड़ा लड़का रामेश्वर 25 वर्ष का है. जब बेलछी नरसंहार हुआ, तब वह मात्र 15 वर्ष का था. महावीर को बचाने के प्रयास में कुल 8 बीघा खेत बिक गये. अब बुरा हाल है. इन बच्चों का न अलग ढंग से प्रशिक्षण हो रहा है, न स्वस्थ सोच का माहौल मिल रहा है. बाकी 13 अभियुक्त केशो महतो, नेपाली महतो, सीवन महतो, सीताराम, कैलास, किशोर महतो, नेपाल महतो रामईसर, नरेश, रामकिसुन महतो, साधुशरण महतो, राजिंदर महतो, बालदेव महतो, सिरी महतो और तुलसी महतो 20 वर्ष की सजा काट रहे हैं.

बेलछी की मजूर महिला अलोधनी देवी उस घटना के बारे में बताती है. कुर्मी महावीर महतो और हरिजन सिंधवा दोनों पहले साथ-साथ थे. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे. सिद्धेश्वर पासवान उर्फ सिंधवा नालंदा का पुश्तैनी घर छोड़ कर अपनी ससुराल बेलछी में बसने आया था. वह दबंग किस्म का इंसान था. आसपास के गांवों में कुर्मी जोतदारों का दबदबा है. महावीर चौधरी भी कुर्मी था. उसे आसपास के बड़े कुर्मी जोतदार मदद देते थे. उसके पास लगभग 20 बीघा खेत और ईंट का मकान था. आज भी इस पूरे गांव में दो-तीन पक्के, लगभग चार ईंट के और बाकी कच्चे मकान हैं. महावीर का इस गांव में आतंक था. आरंभ में महावीर ने सिंधवा की खूबियों को परखा, फिर अपने दल में शामिल किया. सिंधवा गरीब हरिजनों-दुसाधों के शोषण का विरोध करता था. इस कारण हरिजन दुसाध उसे भरपूर मदद देते थे. बाद में दोनों में ठन गयी. यह मनमुटाव भी आर्थिक सवालों को लेकर हुआ. दोनों जानी दुश्मन बन गये.

आरंभ में सिंधवा का गिरोह ताकतवर था. उसने महावीर महतो की फसल लूटने और उसे गांवों में न घुसने देने का संकल्प किया. अब बात दो गिरोहों के बीच न रह कर कुर्मियों बनाम हरिजनों के बीच ‘मूंछ की लड़ाई’ में तब्दील हो गयी. इस बीच महावीर के आदमी धनपत दुसाध की हत्या हो गयी. उसकी लाश मनकोठिया में गाड़ दी गयी. 28 दिनों बाद उसका क्षत-विक्षत शव मिला. फिर आसपास के धनाढ्य कुर्मियों ने हरिजनों को हमेशा के लिए सबक सिखाने की योजना बनायी. 27 मई 1977 को दिन-दहाड़े परशुराम धानुक अपराधियों की फौज लेकर बेलछी चढ़ आया. सिंधवा के लोगों ने जवाबी हमला किया. परशुराम धानुक का गिरोह पीछे हट गया. कुछ ही समय के अंतराल में महावीर महतो के घर से दूसरा गिरोह निकला. सिंधवा और उसके 10 साथी भाग कर रोहन महतो के पक्के घर में घुस गये. इसके बाद अपराधियों ने उस मकान को चौतरफा हमला किया.असंख्य गोलियां चलीं. 11 बजे दिन से पांच बजे शाम तक युद्ध चलता रहा. धोखे से घर से इन्हें निकाल कर बंदूकधारियों ने इनकी मुश्के चढ़ा दीं. हाथ बांध दिये. फिर जुलूस की शक्ल में गांव से बाहर सटे खेत में ले गये. वहां लगभग 400 लोगों के सामने इन्हें गोली मार कर आग में झोंक दिया गया. 14 वर्षीय बालक राजाराम ने आग से निकलने की कोशिश की, तो उसे पकड़ कर दोबारा आग में फेंक दिया गया. इस आगजनी में एक पासवान परिवार के चार सदस्य और एक सुनार परिवार के तीन पुरुष भून दिये गये. जिस रोहन महतो के घर में इन लोगों ने शरण ली थी. उन्हें स्वजातीय होने के कारण अपराधियों ने बख्श दिया.”
बिहार को अभी आने वाले दो दशकों में भीषण खुनी जातीय संघर्ष का गवाह बनना था. बिहार के सामंती समाज और भूमि आधारित अर्थव्यवस्था ने इसकी जमीन तैयार कर दी थी.

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