म्युनिख नरसंहार: जब ओलिंपिक खेल गाँव में 11 इसरायली खिलाड़ी फिलिस्तीन लड़ाकों के हाथ मारे गये

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

वो 5 सितम्बर 1972 की रात थी. इस साल पश्चिम जर्मनी ने ओलिंपिक खेलों का आयोजन किया था. पर 5 सितम्बर की रात ओलिंपिक खेल गाँव में फिलिस्तानी आतंकी संगठन “ब्लैक सितम्बर” ने एक खुनी खेल खेला और कुल 11 इसरायली खिलाड़ियों की ह्त्या कर दी. साथ में जर्मन पुलिस का एक ऑफिसर भी मारा गया. इसका बदला लेने के लिए फिर इजराइल ने एक ऑपरेशन चलाया, जो भीषण बदले की दास्ताँ है. मोसाद के चुनिन्दा कमांडों इस ऑपरेशन के लिए चुने गए, जिनसे कहा गया कि उन्हें वर्षों अपने परिवार से दूर रहना होगा. पकडे जाने पर इजराइल उन्हें पहचानने से इन्कार कर देगा. अगले बीस सालों तक चले इस लोमहर्षक ऑपरेशन में मोसाद ने ब्लैक सितम्बर के उन आतंकियों को दुनिया भर में खोजा, और उन्हें मार गिराया. इस भीषण बदले की जंग में कुल 35 फिलिस्तीनी आतंकी मार गिराए गये.

 

इस खेल आयोजन के जरिये जर्मनी अपनी पुरानी सैन्य छवि से छुटकारा पाना चाह रहा था, द्वितीय विश्व युद्द में पुरे यूरोप पर नाजियों के अत्याचार के  घाव ताजा थे और फिर अंतिम बार जर्मनी ने 1936 में ओलिंपिक का आयोजन किया था, उस खेल को हिटलर ने अपनी छवि को बढाने में इस्तेमाल कर लिया था. तो कुल मिलाकर जर्मनी को एक शांतिप्रिय, आर्थिक प्रगति के लिए समर्पित, अन्य राष्ट्रों के साथ दोस्ताना छवि की जरुरत थी. ऐसे में जर्मनी ने खेल गाँव को एकदम केयर फ्री माहौल में ढालने की कोशिश की. हालांकि इसरायली टीम ने कम सुरक्षा पर अपनी चिंता जाहिर की. कोई भी खिलाड़ी तार के बाड़ लाँघ कर किसी भी देश के रेजिडेंशियल एरिया में आ जा रहा था, जब मर्ज़ी हो खेल गांव में आ रहा था, जा रहा था. सुरक्षा में एकदम ढील दी हुई थी.

वो 5 सितम्बर 1972 की रात थी.

खिलाड़ियों की तरह ट्रैक सूट पहने 8 अजनबी लोहे की दीवार फांदकर ओलंपिक विलेज में घुसने की कोशिश कर रहे थे.  तभी वहां कनाडा के कुछ खिलाड़ी पहुंच गए. दीवार फांदने वाले अजनबी सहम गए, कनाडा के खिलाड़ियों ने उन्हें किसी दूसरे देश का खिलाड़ी समझा और फिर दीवार फांदने में उनकी मदद की.  लोहे की दीवार पार करने के बाद कनाडा के खिलाड़ी अपने रास्ते पर आगे बढ़ गए.  दूसरी तरफ ट्रैक सूट पहने अजनबी उस इमारत के बाहर पहुंच गए जहां इजरायली खिलाड़ियों को ठहराया गया था. इस इमारत में दाखिल होते ही इन अजनबियों का असली चेहरा सामने आ गया. ये कोई खिलाड़ी नहीं बल्कि हथियारों से लैस आतंकी थे. आठों फिलिस्तीनी आतंकियों ने  हाथों में हथियार लेकर  सबसे पहले  जिस अपार्टमेंट में दाखिल होने की कोशिश की, उसमें रह रहे पहलवान योसेफ गटफ्रंड अभी जाग रहे थे, शोर सुनकर वो दरवाजे तक पहुंचे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

गटफ्रंड ने शोर मचाकर अपने बाकी साथियों को खबरदार कर दिया. पूरे हॉस्टल में हड़ंकप मच गया, कुछ खिलाड़ी भागने की कोशिश करने लगे, लेकिन रेसलिंग कोच मोसे वेनबर्ग दौड़कर किचन में घुसे और मुकाबला करने के लिए चाकू उठा लिया. अगले ही पल एक आतंकी की बंदूक गरजी और गोली मोसे के गालों को छेदती हुई निकल गई. इसके बाद आतंकियों ने हॉस्टल के एक-एक कमरे की तलाशी ली और खिलाड़ियों को बंधक बना लिया. गोलीबारी के बीच कुछ खुशकिस्मत खिलाड़ी भागने में कामयाब रहे. लेकिन कुछ ऐसे बदकिस्मत भी थे, जिन्होंने पूरी हिम्मत जुटाकर आतंकियों का मुकाबला किया. वो अपने साथियों को बचाने के लिए दुश्मनों से भिड़ गए, लेकिन आतंकियों ने उन्हें गोली मारने में देर नहीं लगाई.

अगले दिन ये खबर सनसनी बनकर पूरी दुनिया में फैल गई कि फलस्तीनी आतंकवादियों ने जर्मनी के म्यूनिख शहर में 11 इजरायली खिलाड़ियों को बंधक बना लिया है. अब तक बाहर वालों को ये पता नहीं था कि दो खिलाड़ी पहले ही मारे जा चुके हैं. आतंकवादीयों ने इज़राइल में बंदी 234 कैदियों को जेल से रिहा करने की मांग की और लाल सेना गुट के संस्थापक एंड्रियास बादेर और उल्रीके मीनहोफ जो जर्मनी में बंदी थे उन्हे भी रिहा करने की मांग की. दरअसल इस पुरे ऑपरेशन में फिलिस्तीनी ब्लैक सितम्बर के आतंकियों की मदद जर्मनी के नव नाज़ी कर रहे थे. इसलिए उनके नेताओं की रिहाई की भी मांग की गयी.  कई जर्मन अधिकारियों ने  आतंकियों से बातचीत जारी रखी, इस बहाने वे स्थिति से निपटने के लिए समय चाह रहे थे.  शाम 4:30 बजे पुलिस पहुंची. .उन्होने वेंटिलेशन शाफ्ट के माध्यम से इमारत में प्रवेश करने और आतंकियों पर हमला करने की योजना बनाई.  पर तब तक जर्मन अपार्टमेंट में कई संवाददाताओं ने घटना का लाइव प्रसारण शुरू कर दिया, जिसके चलते फिलिस्तीनी आतंकियों को इस जर्मन पुलिस की स्थिति का पता चल गया. 

पूरी दुनिया टकटकी लगाकर इजरायल की ओर देख रही थी. लोग सांसें थामे इंतजार कर रहे थे कि आखिर इजरायली खिलाड़ियों का क्या होगा. इसी बीच आतंकियों ने एक नई मांग रखी कि उन्हें तीन प्लेन मुहय्या कराया जाए. उनका इरादा मिश्र निकल जाने का था. वो अपनी सुरक्षा के लिए बंधक इजरायली खिलाड़ियों को अपने साथ ले जाना चाहते थे. जर्मन सरकार की रणनीति थी कि इसी बहाने आतंकी और खिलाड़ी बाहर निकलेंगे और एयरपोर्ट पर आतंकियों को निशाना बनाना आसान होगा. प्लान के मुताबिक आतंकियों को बस मुहैया कराई गई, जो उन्हें एयरपोर्ट तक ले गई. एयरपोर्ट पर अंधेरे में जगह-जगह शार्प शूटर तैनात कर दिए गए थे.

पूरी दुनिया अपने टीवी स्क्रीन पर इस मंजर को लाइव देख रही थी. खिलाड़ियों को बस से उतारकर हेलीकॉप्टर में बिठाया गया. इसके कुछ ही सेकेंड बाद शार्प शूटरों ने आतंकियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. खुद को चारों तरफ से घिरता देख आतंकियों ने निहत्थे खिलाड़ियों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. एक हेलीकॉप्टर को बम से उड़ा दिया गया. फिर दूसरे हेलीकॉप्टर में बैठे खिलाड़ियों को भी गोलियों से भून दिया गया. कुछ ही मिनटों में एयरबेस पर मौजूद हर आतंकी मारा गया. साथ ही इजरायल के 9 खिलाड़ी भी आतंकियों की गोलियों के शिकार बन गए. उसी समय हवाई अड्डे की इमारत से सारा दृश्य देख रहे इसराइली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के प्रमुख ज़्वी ज़मीर ने प्रधानमंत्री गोल्डा मईर को फ़ोन लगाया. ज़मीर धीरे से बोले, “गोल्डा मेरे पास बहुत ख़राब ख़बर है. मैं हवाई अड्डे से बोल रहा हूँ. एक भी इसराइली खिलाड़ी जीवित नहीं बचा है.”

शुरू में टीवी के जरिए ये खबर फैलाई गई कि सिर्फ आतंकी मारे गए हैं, सभी 9 खिलाड़ी सुरक्षित हैं लेकिन अगली सुबह ये साफ हो गया कि इजरायल का कोई भी खिलाड़ी जिंदा नहीं बचा है.

गोल्डा मेयर

6 सितम्बर को ओलम्पिक खेलों में मृत खिलाड़ियों को श्रद्धांजलि अर्पित हुई। कुश्ती प्रशिक्षक मोशे वेनबर्ग की बहन कारमेल एलियैश को तभी दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। ओलम्पिक का ध्वज आधा मस्तूल पर लहराया गया और साथ कई देशों के ध्वज भी; पर दस अरब देशों के विरोध के बाद उनके ध्वज बहाल कर दिए गए.

इजराइल का जवाब Operation “Wrath of God” खुदा का कहर:

म्यूनिख नरसंहार के दो दिन के बाद इजरायली सेना ने सीरिया और लेबनान में मौजूद फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के 10 ठिकानों पर बमबारी की और करीब 200 आतंकियों और आम नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया. लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर इतने भर से रुकने वाली नहीं थीं. उन्होंने इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के साथ गुप्त मीटिंग की और उनसे एक ऐसा मिशन चलाने को कहा जिसके तहत दुनिया के अलग-अलग देशों में फैले उन सभी लोगों के कत्ल का निर्देश दिया, जिनका वास्ता ब्लैक सितम्बर  से था.

सबसे पहले मोसाद ने ऐसे लोगों की लिस्ट बनाई, जिनका संबंध म्यूनिख नरसंहार से था. इसके बाद मोसाद के ऐसे एजेंट्स तलाशे गए जो गुमनाम रह कर ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड को अंजाम देने के लिए तैयार थे. इन एजेंट्स से कहा गया कि उन्हें सालों तक अपने परिवार से दूर रहना होगा. वो अपने मिशन के बारे में परिवार को भी नहीं बता सकते और सबसे बड़ी बात ये कि पकड़े जाने पर इजरायल उन्हें पहचानने से इनकार कर देगा। यानी बिना किसी पहचान, बिना किसी मदद के उन्हें इस मिशन को अंजाम देना था.

मिशन शुरू होने के कुछ ही महीनों के अंदर मोसाद एजेंट्स ने वेल ज्वेटर और महमूद हमशारी का कत्ल कर सनसनी मचा दी. अब बारी थी अगले निशाने की। यहां भी मोसाद की टीम ने ब्लैक सेप्टेंबर से संबंध रखने के शक में एक शख्स की दिन-रात निगरानी शुरू की. हुसैन अल बशीर नाम का ये शख्स होटल में रहता था, और होटल में वो सिर्फ रात को आता था और दिन शुरू होते ही निकल जाता था. मोसाद की टीम ने उसे खत्म करने के लिए उसके बिस्तर में बम लगाने का प्लान बनाया

बम लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था, ये काम तो आसानी से हो गया. मुश्किल ये था कि कैसे ये पता किया जाए कि हुसैन अल बशीर बिस्तर पर है  तभी धमाका किया जा सकता है. इसके लिए एक मोसाद एजेंट ने बशीर के ठीक बगल वाला कमरा किराए पर ले लिया. वहां की बालकनी से बशीर के कमरे में देखा जा सकता था. रात को जैसे ही बशीर बिस्तर पर सोने के लिए गया. एक धमाके के साथ उसका पूरा कमरा उड़ गया. इजरायल का मानना था कि वो साइप्रस में ब्लैक सेप्टेंबर का प्रमुख था, हालांकि उसकी हत्या के पीछे रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से उसकी नजदीकियां अहम मानी गईं.

फलस्तीनी आतंकियों को हथियार मुहैया कराने के शक में बेरूत के प्रोफेसर बासिल अल कुबैसी को गोली मार दी गई. मोसाद के दो एजेंट्स ने उसे 12 गोलियां मारीं. मोसाद की लिस्ट में शामिल तीन टार्गेट लेबनान में भारी सुरक्षा के बीच रह रहे थे और अभी तक के हत्याओं के तरीकों से उन तक पहुंचना नामुमकिन था. इसलिए उनके लिए विशेष ऑपरेशन शुरू किया गया, जिसका नाम था ऑपरेशन स्प्रिंग ऑफ यूथ. ये ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड का ही एक हिस्सा था.

9 अप्रैल 1973 को इजराय़ल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर स्पीडबोट के जरिए पहुंचे. इन कमांडोज को मोसाद एजेंट्स ने कार से टार्गेट के करीब पहुंचाया. कमांडो आम लोगों की पोशाक में थे, और कुछ ने महिलाओं के कपड़े पहन रखे थे. पूरी तैयारी के साथ इजरायली कमांडोज की टीम ने इमारत पर हमला किया. इस ऑपरेशन के दौरान लेबनान के दो पुलिस अफसर, एक इटैलियन नागरिक भी मारे गए. वहीं इजरायल का एक कमांडो घायल हो गया. इस ऑपरेशन के फौरन बाद तीन हमले और किए गए. इनमें साइप्रस में जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल रूम में बम से उड़ा दिया गया. वहीं ब्लैक सेप्टेंबर के दो किशोर सदस्य अब्देल हमीन शिबी और अब्देल हादी नाका रोम में कार धमाके में घायल हो गए.

मोसाद के एजेंट्स दुनिया में घूम-घूम म्यूनिख क़त्ल-ए-आम के गुनहगारों को मौत बांट रहे थे लेकिन क्या इजरायल के बदले की कहानी थम गई। इंतकाम की आग में धधक रहे इजरायल की सीक्रेट सर्विस एजेंसी मोसाद का खूनी खेल अभी थमा नहीं था क्योंकि उसकी हिट लिस्ट में और लोगों के नाम शुमार थे और जब तक इस हिटलिस्ट से सभी नाम मिटा नहीं दिए जाते तब तक उसके एजेंट्स का मिशन खत्म नहीं हो सकता था लिहाज़ा मोसाद के एजेंट्स एक बार फिर अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में जुट गए. अब बारी थी उन लोगों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की जो सीधे तौर पर म्यूनिख कत्ल-ए-आम से जुड़े थे और एक बार फिर शुरू हुआ मोसाद का खूनी इंतकाम और अपने इस मिशन के तहत…

-28 जून 1973 को ब्लैक सेप्टेंबर से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर उड़ा दिया.

-15 दिसंबर 1979 को दो फलस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या हो गई.

-17 जून 1982 को पीएलओ के दो वरिष्ठ सदस्यों को इटली में अलग-अलग हमलों में मार दिया गया.

-23 जुलाई 1982 को पेरिस में पीएलओ के दफ्तर में उप निदेशक फदल दानी को कार बम से उड़ा दिया गया.

-21 अगस्त 1983 को पीएलओ का सदस्य ममून मेराइश एथेंस में मार दिया गया.

-10 जून 1986 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में पीएलओ के डीएफएलपी गुट का महासचिव खालिद अहमद नजल मारा गया.

-21 अक्टूबर 1986 को पीएलओ के सदस्य मुंजर अबु गजाला को काम बम से उड़ा दिया गया.

-14 फरवरी 1988 को साइप्रस के लीमासोल में कार में धमाका कर फलस्तीन के दो नागरिकों को मार दिया गया.

इन आंकड़ों को देखने के बाद ये तो साफ हो जाता है कि मोसाद के एजेंट्स दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर करीब 20 साल तक हत्याओं को अंजाम देते रहे. जब इजरायल का ये चेहरा दुनिया के सामने आया तो उसकी काफी आलोचना हुई.

अगली नंबर था अली हसन सालामेह का, वो शख्स जो म्यूनिख कत्ल-ए-आम का मास्टरमाइंड था और जिसने इजरायली एथलीटों को बंधक बनाने का ब्लूप्रिंट तैयार किया था। मोसाद ने सलामेह को एक कोड नाम दिया था, रेड प्रिंस. मोसाद के जासूस अली की तलाश पूरी दुनिया में कर रहे थे लेकिन ये बात सलामेह भी जानता था और इसीलिए उसने अपने इर्द-गिर्द सुरक्षा का घेरा बढ़ा दिया था। नार्वे में साल 1973 और स्विट्जरलैंड में साल 1974 में मोसाद ने सलामेह को जान से मारने की कोशिश की लेकिन वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई। इसके बाद साल 1974 में स्पेन में एक बार फिर सलामेह की हत्या की कोशिश की गई लेकिन वो फिर बच निकला.

साल 1979 यानि पांच साल बाद मोसाद ने एक बार फिर सलामेह को लेबनान की राजधानी बेरूत में ढूंढ़ निकाला. 22 जनवरी 1979 को एक कार बम धमाका कर सलामेह को भी मौत के घाट उतार दिया गया. म्यूनिख कत्ल-ए-आम का गुनहगार मारा जा चुका था लेकिन म्यूनिख क़त्ल-ए-आम के 7 साल बाद तक चले मोसाद के ऑपरेशन में उसके एजेंट्स ने 11 में से 9 फलस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया था. वैसे ये भी एक सच है कि करीब 20 साल तक चले इस सीक्रेट ऑपरेशन में मोसाद ने कुल 35 फलस्तीनियों को मारा था.

 

 


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