सत्येन्द्र दुबे मर्डर:जब PMO से लीक हुए मेल के चलते एक ईमानदार इंजिनियर की ह्त्या कर दी गयी

अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधान मंत्री थे और उनके कार्यकाल में देश भर में हाईवे का निर्माण जोर शोर से चल रहा था. देश के चारों कोनो को वाजपेयी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत जोड़ा जा रहा था. आर्थिक विकास के लिए सड़कों का जाल होना बेहद जरुरी है, ये देश का शासक वर्ग अच्छी तरह समझ चुका था. और नरसिम्हाराव ने 1991 में देश में उदारवाद और निजीकरण के जरिये भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की जो शुरुआत की थी, वो वाजपेयी के दौर में भी अनवरत चल रही थी.

पर सड़कों के निर्माण के बीच में 27 नवम्बर 2003 को एक हत्याकांड ने देश को झकझोड़ कर रख दिया. अचानक लगने लगा कि सड़क निर्माण के प्रोजेक्ट में सब कुछ सही नहीं चल रहा  है और शायद ये भ्रष्टाचार के दलदल में घिरा हुआ  है.

27 नवम्बर 2003 की रात सत्येन्द्र को गोलियों से भून दिया गया 

27 नवम्बर 2003 की रात गया मे  भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में परियोजना निदेशक सत्येन्द्र दुबे की उस समय उस समय ह्त्या कर दी गयी,जब वे बनारस से एक विवाह समारोह के बाद घर लौट रहे थे. वे बनारस से गया तक ट्रेन द्वारा पहुंचे और उसके बाद गया स्टेशन से रिक्से द्वारा घर जाते समय रास्ते में गोली मार उनकी हत्या की गई. गया में जे.पी. कॉलोनी के रास्ते में उनका मृत शरीर पाया गया.

भारतीय अभियांत्रिकी सेवा के युवा पदाधिकारी 31 वर्षीय सत्येन्द्र दुबे की छवि एक बेहद ईमानदार और कर्मठ पदाधिकारी की थी. इंडियन एक्सप्रेस जिसने इस हत्याकांड का खुलासा किया, के अनुसार, अपनी  ह्त्या से पहले सत्येंद्र दुबे ने अपनी हत्या से पहले नेशनल हाईवे अथॉरिटी में हो रहे भ्रष्टाचार के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय तक को चिठ्ठी लिखी थी और इस चिट्ठी में उन्होंने प्रार्थना की थी कि उनकी पहचान सार्वजनिक न की जाय. हालाँकि उन्होंने जो चिट्ठी प्रधान मंत्री कार्यालय को भेजी थी, उसमे उनके हस्ताक्षर नहीं थे, लेकिन उन्होंने ईमेल के साथ सीवी भी भेजा था. पर उनके अपील के बाद भी ईमेल देश के सबसे उच्च स्तरीय और गोपनीय दफ्तर प्रधान मंत्री कार्यालय से लीक कर दिया गया. ऐसे में उनकी पहचान सार्वजनिक हो गयी और वे रोड माफिया के निशाने पर आ गये.

कहा जाता है कि रोड के कॉन्ट्रैक्ट जो बड़ी बड़ी कम्पनियों को सरकार देती है, उस कॉन्ट्रैक्ट को ये बड़ी बड़ी कम्पनियाँ या तो अपनी सुविधा के लिये या फिर स्थानीय दबंगों के दबाब में आकर इन स्थानीय दबंगों की कम्पनियों को रोड का छोटा छोटा स्ट्रेच बनाने का कॉन्ट्रैक्ट दे देती हैं.  ऐसे दबंगों को राजनीतिक संरक्षण भी मिला रहता है. ऐसे में ये लोग बेहद खतरनाक हो जाते हैं. गया में यही हो रहा था. सत्येन्द्र दुबे  देख रहे थे कि ऐसी छोटी छोटी कम्पनियों के पास न तो सही मशीन होते हैं, न वो विशेषज्ञता होती है, सब कॉन्ट्रैक्ट पाने के लिए ये छोटी छोटी कम्पनियां बड़ी कम्पनियों और साथ ही नेशनल हाईवे अथॉरिटी के सीनियर ऑफिसर्स को घूस भी देते हैं, ऐसे में जो सड़क बन रही है, वो बेहद खराब क्वालिटी की हो रही है और ऐसे में पूरा प्रोजेक्ट ही खटाई में जाता दिख रहा है. सत्येन्द्र की इमानदारी उन्हें आँख मुंदने को राजी नहीं कर पा रही थी. ऐसे में उन्होंने आवाज उठायी और यही आवाज पीएमओ के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत के चलते उनकी जान की दुश्मन बन गयी.

सत्येन्द्र ने पीएमओ को मेल किया इस प्रार्थना के साथ कि उनकी पहचान उजागर न की जाए:

सत्येन्द्र को  2002 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में परियोजना निदेशक का पद मिला. इस पद पर काम करते समय उन्हें स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में कार्य करने का मौका मिला. इस परियोजना में कार्य करते समय उन्हें बहुत बडे़ स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमिताओं का पता चला। विभाग के ठेकेदारों और इंजिनियरों की साठ-गाठ से भ्रष्टाचार का धंधा खूब फल फूल रहा था. सत्येन्द्र ने अपने ही विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और इंजीनियरों के खिलाफ कार्यवाही की और उन्हें निलंबित किया. सत्येन्द्र ने इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहीम शुरू कर दी और अपने विभाग में हो रही दूसरी अनियमितताओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया. उन्होंने इन अनियमितताओं के बारे में अपने विभाग के निदेशक और अन्य अधिकारियों को पत्र भी लिखा लेकिन किसी ने भी उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। इन शिकायतों के परिणाम स्वरूप उनका स्थानांतरण गया जिले में कर दिया गया. गया जिले में भी उन्होंने अपनी भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहीम में कोई कमी नहीं आने दी. सत्येन्द्र को इन सभी के फलस्वरूप धमकियां भी मिली.

उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए सत्येन्द्र ने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करने का निर्णय लिया और एक विस्तृत पत्र लिखा. उस गोपनीय पत्र में सत्येन्द्र ने भ्रष्टाचार पर विधिवत प्रकाश डाला और उसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया. भ्रष्टाचार की गंभीरता को देखते हुए सत्येन्द्र ने उस पत्र में अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया था. बाद में यह देखा गया कि सत्येन्द्र के अनुरोध के बाद भी कार्यालय अधिकारियों ने उस पत्र को सत्येन्द्र के नाम के साथ अलग अलग विभागों में अग्रसारित कर दिया.

सत्येन्द्र की ह्त्या से देश भर में रोष की लहर दौड़ पड़ी. प्रधान मंत्री वाजपेयी को इस पर संसद में बयान देना पड़ा. विरोध प्रदर्शनों और सामान्य जनता के असंतोष को देखते हुए सरकार द्वारा उनकी मृत्यु की जांच केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दिया गया. तब इस मामले को लेकर काफी हंगामा मचा था. लेकिन बाद में सीबीआई ने इसे लूट का मामला बताते हुए उदय मल्लाह को हत्याकांड का आरोपी बताया था. सत्येंद्र दुबे के भाई धनंजय दुबे ने इस पर गहरा अफसोस जताते हुए कहा कि जिन लोगों को सजा दी गई है, वे पूरी तरह से निर्दोष हैं और जिन लोगों ने हत्या की है, वे अभी भी पहुंच से बाहर हैं.

भारत के उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या के मामले में केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक मंत्रालय और बिहार सरकार को नोटिस जारी किया.

सर्वोच्च न्यायालय ने ये नोटिस इस मामले की जांच के लिए एक वकील राकेश उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद जारी किया. उन्होंने केन्द्र से इस बात की जानकारी देने का निवेदन किया कि भ्रष्टाचार के बारे में अहम जानकारी देने वाले व्यक्ति की सुरक्षा के लिए केंद्र क़ानूनी व्यवस्था करे. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाए हैं कि इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या इसलिए हुई क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा गया उनका पत्र वहाँ से लीक हो गया.

सत्येन्द्र की हत्या से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर एक भूचाल आ गया. भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली अन्य संस्थाओं ने इस मामले को उठाया, जिसके परिणामस्वरूप सरकार को नीतिगत स्तर पर भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों की पहचान सुरक्षित रखने का नियम बनाना पड़ा. 2014 Whistle blower Protection Act, 2011 संसद के द्वारा बनाया गया, जिसमे सिस्टम में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले अंदरूनी आदमी की पहचान गुप्त रखने का प्रावधान किया गया और साथ ही उसकी शारीरिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान किये गये.   बाद के वर्षों में आया सूचना का अधिकार अधिनियम इस दिशा में एक और मील का एक पत्थर साबित हुआ. यह नियम भ्रष्टाचार को उजागर वाले व्यक्तियों के लिए एक हथियार साबित हुआ.

 

 


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