ये सोशल ऑडिट आखिर है क्या जिसने अधिकारियों की नाक में दम कर रखा है?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

क्या कभी आपकी भेंट ऐसे जिला शिक्षा अधिकारी से हुई है, जिससे भरी महफिल में किसी ग्रामीण ने शिक्षा के अधिकार के हवाले से पूछा हो, बताओ ऐसे कितने स्कूल हैं जहां शौचालय ठीक-ठाक बने हैं और काम कर रहे हैं? क्या आपने जिला शिक्षा अधिकारी को आंकड़ों की ओट में तथ्य छुपाते और इस तथ्य-छुपाई पर उसी महफिल में एक से ज्यादा ग्रामीणों के द्वारा टोके और दुरुस्त किए जाते देखा है?  मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में TISS की सोशल ऑडिट टीम ने जब से यौन दुष्कर्मों का खुलासा किया है, बिहार में आम जन में सोशल ऑडिट शब्द या सामाजिक अंकेक्षण उमड़ घुमड़ रहा है. आज हम इसी सोशल ऑडिट के बारे में बात करेंगे.

सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की जोर पकड़ती मांग के बीच सोशल-ऑडिट का विचार एक कारगर समाधान बनकर उभरा है. समाज-कल्याण की नीतियों और योजनाओं में सरकारों ने इसे जगह दी है या इसे यूं कह लें कि सिविल सोसाइटी के निरंतर दबाब में देना पड़ा है. दूर-दराज के इलाकों में जनसेवा में लगे स्वयंसेवी संगठन सोशल-ऑडिट के सहारे लोगों को अधिकारों के प्रति जागरूक ‘नागरिक’ में तब्दील कर रहे हैं. गंवई भारत धीरे-धीरे प्रश्न पूछने लगा है और अधिकारियों से काम का हिसाब मांगने लगा है.

सोशल ऑडिट कैसे की जाती है?

अगर पंचायतों में सोशल ऑडिट की बात करें तो, सर्वप्रथम ग्राम सभा एक सोशल ऑडिट समिति का चयन अपने बीच से करती है, जिसमें आवश्यकतानुसार पांच से 10 व्यक्ति हो सकते हैं. इस समिति को जिस कार्यक्रम या योजना की सोशल ऑडिटिंग करनी होती है, उससे संबंधित सभी दस्तावेज और सूचनाएं एकत्र कराई जाती है. उन दस्तावेजों की जांच-पड़ताल की जाती है तथा उनका मिलान किए गए कार्यों एवं लोगों के अनुभवों एवं विचारों के साथ किया जाता है. फिर एक रिपोर्ट बनाई जाती है, जिसे पूर्व-निर्धारित तिथि को ग्राम सभा के समक्ष रखा जाता है.  ग्राम सभा में सभी पक्ष उपस्थित होते है और अपनी बातें रखते हैं.

यदि कहीं गड़बड़ी के प्रमाण मिलते हैं तो उनका दोष-निवारण किया जाता है. यदि ग्राम सभा में ही सभी मसलों को नहीं निपटाया जा सकता है तो उसे उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया जाता है. कार्यक्रम को और प्रभावी बनाने हेतु सुझाव भी ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा दिया जाता है. सोशल ऑडिट के लिए बुलाई गई ग्राम सभा की अनुसंशाओं को एक निश्चित अवधि के भीतर पालन किया जाता है और अगली ग्राम सभा में कार्रवाई का प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया जाता है.

संविधानिक प्रावधान और सोशल ऑडिट का इतिहास

1993  में  73वें संविधान संशोधन के अनुसार सोशल ऑडिट करना अनिवार्य है. इसके माध्यम से ग्रामीण समुदाय को अधिकार दिया गया है कि वे अपने इलाके में सभी विकास कार्यों का सोशल ऑडिट करें. इस काम में अधिकारियों को ग्राम-समुदाय का सहयोग करना अनिवार्य माना गया है.
साल 1992-93 के संविधान संशोधन द्वारा स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत व्यवस्था की गई कि ग्राम सभा और म्युनिस्पल निकायों के आगे विकास कार्यों से संबंधित बही खाते रखे जायें और जनता उनकी परीक्षा करे.
सोशल ऑडिट की प्रक्रिया में सरकारी एजेंसियां अपने विकास कार्यों से संबंधित ब्यौरे किसी सार्वजानिक मंच पर साझा करती है, ऐसे में जनता को ना सिर्फ विकास कार्यों की जांच का मौका मिलता है बल्कि विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित होती है.
सोशल ऑडिट शब्द का पहली बार इस्तेमाल 1950 के दशक में हुआ. पिछले  डेढ़ दशक में यह शब्द भारत में खूब प्रचलित हुआ है जो इसके अन्तर्गत बढ़ती गतिविधियों की सूचना देता है.
MGNREGA  के अन्तर्गत अनुच्छेद 17(2) में कहा गया है-ग्राम सभा नरेगा के अन्तर्गत किसी ग्राम पंचायत में चल रही सारी योजनाओं का नियमित सोशल ऑडिट करेगी। फिर अनुच्छेद 17(3) में कहा गया है- ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है कि वह सभी जरुरी कागजात मसलन मस्टर रोल, बिल वाऊचर, नापी-जोखी से संबंझित दस्तावेज, पारित आदेशों की प्रतिलिपि आदि ग्राम सभा को सोशल ऑडिट के लिए मुहैया कराये.

 MGNREGA  के अन्तर्गत सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधान : 

MGNREGA के अन्तर्गत सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधान तीन स्तरों पर किए गए हैं. पहला है शुरुआती तैयारी का चरण,दूसरा सामाजिक अंकेक्षण के फोरम से संबंधित है और तीसरा है सामाजिक अंकेक्षण के बाद की गतिविधियों से संबंधित प्रावधान.

सामाजिक अंकेक्षण फोरम यानी ग्राम सभा की मीटिंग हर छह महीने पर अनिवार्य रुप से होनी चाहिए. इसकी अध्यक्षता फोरम द्वारा चुना गया व्यक्ति करेगा और ग्रामसभा के आयोजन की सूचना व्यापक रुप से फैलायी जानी चाहिए.

पहले किए गए सामाजिक अंकेक्षण के क्रम में क्या कार्रवाइयां हुईं इसकी एक रिपोर्ट ग्रामसभा की बैठक में जरुर पढ़ी जानी चाहिए. सभी संबंद्ध अधिकारियों की इस सभा में उपस्थिति अनिवार्य है. साथ ही सभा की कार्रवाही का ब्यौरा सचिव द्वारा विधिवत तैयार किया जाना चाहिए.

सामाजिक अंकेक्षण के बाद के चरण में उन सभी शिकायतों पर सुनवाई होनी चाहिए जिनसे काम का ना होना प्रकट होता है. जो भी व्यक्ति MGNREGA के कोष की हेराफेरी का दोषी पाया जाय उस पर समुचित कार्रवाई की जानी चाहिए.

MGNREGA से संबंधित सामाजिक अंकेक्षण के कानून में साफ साफ बताया गया है कि कार्यक्रम के क्रियान्वयन के क्रम में किस चरण में किसकी जिम्मेदारी क्या होगी. कानून में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार राज्य स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण की इकाई को गठित करने और चलाने का खर्च वहन करेगी.

तो कुल मिलाकर अब तो जो समझ में आया, उसके अनुसार, सामाजिक अंकेक्षण वह प्रक्रिया है जिसके सहारे सार्वजनिक एजेंसी द्वारा वित्तीय या गैर वित् संसाधनों के इस्तेमाल का ब्यौरा जनता तक पहुंचाया जाता है और इसके लिए सार्वजनिक मंच का सहारा लिया जाता है. सामाजिक अंकेक्षण से जवाबदेही तय  होती है और कामकाज में पारदर्शिता आती है. ग्राम पंचायतों से सोशल ऑडिट शुरू होकर आज सरकार के विभिन्न अंगों में फ़ैल गया है. जैसा कि मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के मामले में TISS की सोशल ऑडिट रिपोर्ट हमें बताती है.

सोशल ऑडिट  के लिए अनेक देशों में विविध मॉडल तैयार किए गए हैं लेकिन किसी एक प्रामाणिक मॉडल पर अभी तक सहमति नहीं बन पायी है. सोशल ऑडिट  के लिए सर्वाधिक जरुरी है जिम्मेदारी तय करने की मंशा से सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज की रिपोर्ट तैयार करना और इन्हें सार्वजनिक करना.

सोशल ऑडिट  के क्रम में शायद सबसे बड़ी बाधा सूचना हासिल करने की प्रणाली का कारगर नहीं होना है। सूचना के अभाव में लोककल्याण के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की जरुरी जानकारी नहीं हो पाती और सोशल ऑडिट  का काम अधूरा रहता है। सूचना जुटाने और इनके विश्लेषण का औपचारिक तरीका सामाजिक अंकेक्षण के काम में बाधा पहुंचाता है.

सामाजिक अंकेक्षण के काम से लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला है। पंचायतों और म्युनिस्पल वार्डों की जिम्मेदारी होती है कि वे गरीबी उन्मूलन और वंचित वर्गों के सशक्तीकरण से संबंधित कार्यक्रमों को लागू करें लेकिन पंचायत और म्युनिस्पल स्तर पर जवाबदारी तय करने की मशीनरी सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधानों के बावजूद बहुत कमजोर है। ज्यादातर राज्यों ने इस दिशा में आधे अधूरे मन से कदम उठाये हैं। संविधान संशोधन के बाद जिला नियोजन समितियों को नियोजन का अधिकार मिला लेकिन ग्राम स्तर पर नियोजन के लिए जिला स्तरीय समितियां कारगर प्रयास नहीं करती।तालुक और ग्राम पंचायत के स्तर पर रिकार्ड कीपिंग का काम हेरफेर का शिकार होता है अथवा उसमें तार्किक संगति का अभाव मिलता है। किसी विकास कार्य के पूरे होने का प्रमाणपत्र जारी करने से पहले स्थानीय शासन की इकाइयां योरोप में संबद्ध जनता की शिकायतों को भी सुनती हैं लेकिन भारत में यह बात अभी तक अमल में नहीं आ पायी है।

2017 में मेघालय सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के सामाजिक अंकेक्षण को सरकारी काम-काज का हिस्सा बनाने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है।

  • राज्य सरकार ने हाल ही में ‘मेघालय सामुदायिक भागीदारी एवं लोक सेवा सामाजिक अंकेक्षण अधिनियम 2017’ लागू किया है.
  • यह अधिनियम राज्य के 11 सरकारी विभागों और 21 योजनाओं पर लागू किया गया है, हालाँकि शुरुआत के तौर पर 18 गाँवों की 26 योजनाओं को इसमें शामिल कर लिया गया.
  • मेघालय का कार्यक्रम कार्यान्वयन और मूल्यांकन विभाग इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिये नोडल एजेंसी है.
  • सामाजिक अंकेक्षण अब तक सिविल सोसाइटी की पहल पर किये जाते रहे हैं और इन्हें कोई आधिकारिक दर्ज़ा हासिल नहीं था.
  • यह देश में पहली बार है कि किसी राज्य ने सामाजिक अंकेक्षण को सरकारी तंत्र में आधिकारिक तौर पर शामिल किया है।
  • इस अधिनियम से जुड़ी तीन बातें महत्त्वपूर्ण हैं –

► इससे किसी योजना में उसके संचालन के दौरान ही सुधार (यदि आवश्यकता हो), किया जा सकता है, क्योंकि केवल यह पता लगाना अंकेक्षण का उद्देश्य नहीं है कि किसी योजना के लिये निर्धारित राशि पूरी तरह खर्च कर दी गई हैया नहीं.
► यह सीधे तौर पर आम नागरिकों को अधिकार देता है कि वे इस बात का निर्णय करें कि धन किस प्रकार खर्च किया जाना है. साथ ही इसके माध्यम से संबंधित अधिकारियों को किसी योजना की प्रगति की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिलती रहती है.
► इसके माध्यम से सामाजिक अंकेक्षण सरकारी प्रणाली का आधिकारिक हिस्सा बन गया है.

 

दरअसल, सारी सरकारी और स्थानीय निकाय स्तर की योजनाओं को सोशल ऑडिट से संचालित करने की जरूरत है. इससे न सिर्फ अधिकारों के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ेगी, सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी बल्कि लोगों को इस बात का भी अहसास होगा कि किस तरह  जिम्मेदारी के साथ विकास कार्य किए जाने चाहिए और पाई-पाई का हिसाब रखा जाना चाहिए. संक्षेप में कहें तो सोशल ऑडिट का अर्थ यह है कि स्थानीय लोग सरकारी योजनाओं पर निगाह रखें और पैसा किस तरह खर्च हो रहा  है, इसे तय करें.

सोशल ऑडिट  का महत्व: 

  • जिन संस्थाओं पर कैग का ऑडिट संबंधी अधिकार अस्पष्ट है, उनके ऑडिट के लिये सामाजिक अंकेक्षण कारगर विधि है.
  • सामाजिक अंकेक्षण योजनाओं की प्रगति के भौतिक सत्यापन हेतु प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध करवाता है.
  • इससे लोगों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ती है और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया और मज़बूत होती है.
  • सोशल ऑडिट  केवल एक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह शासन को अपने दायित्वों के लिये प्रतिबद्ध और जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है.
  • यह समुदायों के लिये उपयुक्त नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने तथा उनमें सुधार करने में प्रशासन की सहायता करता है.
  • यह प्रशासन के प्रति लाभार्थियों में विश्वास को पोषित करता है.

हालाँकि इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि सामाजिक अंकेक्षण की कुछ सीमाएँ भी हैं. 

  • सामाजिक लेखा स्थानीय प्रकृति का होता है। इसमें ऑडिट के कई पहलुओं की अनदेखी की जाती है.
  • इससे प्राप्त परिणामों पर गहन विश्लेषण और चिंतन नहीं होता अतः इनके बाद होने वाली कार्रवाई का स्वरुप सीमित होता है.
  • आँकड़ों की पर्याप्त अनुपलब्धता भी सामाजिक अंकेक्षण के वास्तविक उद्देश्य की प्राप्ति में बाधा है.
  • प्रशासनिक इच्छाशक्ति का अभाव भी अंकेक्षण की इस प्रक्रिया को गतिहीन कर देता है.

पर ये कमियां ऐसी नहीं हैं, कि जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता. कुल मिलाकर सोशल ऑडिट देश में लोकतंत्र की जड़ों की मजबूती के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण माध्यम है. इसने निःसंदेह सरकारी अधिकारियों की नाक में दम कर रखा है.


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