एकवरिया: भोजपुर जिले का वो गाँव, जिसने मध्य बिहार की हरित क्रांति को लाल क्रांति में बदल दिया

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

अंग्रेजों की स्थायी बंदोबस्ती ने जमींदारी व्यवस्था की नींव डाल कर कृषि सम्बन्धों को शोषण पर आधारित कर दिया: 

अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए गंगा के मैदानी इलाकों में जमीन के स्थायी बंदोबस्ती के जरिये जमींदारी प्रथा की नींव डाली, वो अधिसंख्यक छोटी जोत वाले किसानों, कृषि मजदूरों के लिए अभिशाप साबित हुआ. अंग्रेजों का ख्याल था कि उन्हें देश के लाखों करोड़ों किसानों से सीधे सीधे कर वसूलने में बहुत बड़ी मशीनरी की जरुरत पड़ेगी, जिसका प्रशासनिक और आर्थिक व्यय कमर को तोड़ने वाला साबित हो सकता है, ऐसे में एक बिचौलिए का ग्रुप तैयार किया जाए, जो उनके लिए तय हुआ कर वसूल कर दे, और उसके बाद जो भी बचे, या जितना भी वे किसानों से वसूल सकें, उस पर उन ज़मींदारों का हक हो जायेगा. अंग्रेजों की इस एक व्यवस्था ने गंगा के मैदानी इलाकों में खेती और कृषि संबंधों की तस्वीर ही बदल दी. अचानक एक ऐसा वर्ग उभर आया, जो खेती से सीधे सीधे नहीं जुड़ा था, पर इससे होने वाले फायदों पर पलता था. स्वतंत्र भारत में इस असमान कृषि व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए कई कदम उठाये गए, जिनमे जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन, हदबंदी, लैंड रिकार्ड्स को दुरुस्त करना आदि कदम थे, पर एक तो राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव, दुसरे कानून में कई loopholes और फिर राजनेताओं और अफसरों का गठजोड़ ( चूँकि भूमि के अधिकारी वाले वर्ग से ही दोनों तबके आते थे; इसलिए हितों की रक्षा के लिए दोनों ने नापाक गठजोड़ कर लिया था) आदि कुछ ऐसे कारक थे, जिन्होंने भूमि सुधार को निर्णायक रूप से असफल कर दिया था.

विनोबा भावे जैसे गांधीवादियों ने इस असमान और बेहद एक्सप्लोसिव जमीन आधारित संबंधों को defuse करने के लिए भूदान आन्दोलन जैसा गांधीवादी आन्दोलन चलाया. पर देखा गया कि दान किये गए जमीन बहुत बड़ी संख्या में बंजर थे, या फिर क़ानूनी पचड़े में फंसे थे, या फिर वे गैर मज़रुआ सरकारी जमीन थे. लिहाजा भूदान अपने लक्ष्य को हासिल करने में अधिक से अधिक आंशिक रूप से ही सफल रहा.

ऐसे में जमीन पर असंतोष की जो चिंगारी फूट रही थी, वो किसी भी समय एक भयंकर दावानल का रूप ले सकती थी. इस बात की संभावना जताई जा रही थी. ये चिंगारी सबसे पहले फूटी मई 1967 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी सब डिवीज़न के नक्सलबाड़ी से. स्वतंत्र भारत के इतिहास में नक्सलवादी आन्दोलन एक महत्वपूर्ण किसान आन्दोलन रहा है. यह पहला ऐसा आन्दोलन रहा है जिसमे गरीब किसानों के साथ साथ भूमिहीन खेतिहर मजदूरों ने भी हिस्सा लिया और कई मौकों पर इसे नेतृत्व भी प्रदान किया. हालाँकि सरकारी रिकॉर्ड में नक्सल आन्दोलन को अशांति और खून खराबा फैलाने के प्रयास के रूप में ही देखा गया और इसे पुलिसिया दमन से शांत करने का प्रयास भी किया गया. बंगाल में नक्सल आन्दोलन एक तो पुलिसिया दमन और दुसरे भूमि सुधार के कदम ऑपरेशन बर्गा के चलते शांत हुआ, पर बिहार में ये अगले तीन दशक से भी अधिक समय तक चलता रहा; और अभी भी इसकी चिंगारी पूरी तरह शांत नहीं हुई है, अलबत्ता दब गयी है. नक्सलवाद से प्रेरित होकर बिहार में पहला किसान विद्रोह मुजफ्फरपुर के मुसहरी ब्लॉक में हुआ, पर सरकारी दमन और जयप्रकाश नारायण के हस्तक्षेप से इसे दबा दिया गया.

भोजपुर से शुरू हुआ मध्य बिहार का नक्सल आन्दोलन:

मध्य बिहार के नक्सली संगठनों के नेतृत्व में जो किसान खेत मजदूरों का आन्दोलन 1960 के दशक के उतरार्ध से अगले चार दशक तक खुनी रूप में चला, उसकी शुरुआत भोजपुर जिले से हुई. सहार थाने के सोन नदी के किनारे बसे एक गाँव एकवारी में इसकी पहली चिंगारी फूटी और देखते देखते न सिर्फ पुरे भोजपुर बल्कि सोन नदी को पार कर पटना, जहानाबाद, गया और औरंगाबाद तक पहुँच गयी. भोजपुर का नक्स्ली आन्दोलन पूर्ण रूप से एक स्वतः स्फूर्त आन्दोलन था, जो वहां की जमीनी परिस्थिति से पैदा हुआ था और इसके सूत्रधार थे मास्टर जगदीश महतो. आन्दोलन की शुरुआत किसी नक्सली संगठन के नेतृत्व में नहीं हुई थी, बल्कि स्थानीय लोगों के नेतृत्व में हुई थी और इसके असली किरदार भूमिहीन खेतिहर मजदूर थे. और यह आर्थिक के साथ साथ सामाजिक पृष्ठभूमि की भी उपज थी.

भोजपुर में नक्सल आन्दोलन की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि

नक्सली बनाम निजी सेनाओं के बीच हिंसा- प्रतिहिंसा की लड़ाई का सबसे वीभत्स रूप देखने वाला भोजपुर जिला 1974 में अस्तित्व में आया था, शाहाबाद जिले के विभाजन के बाद. इसका मुख्यालय आरा है. अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में वीर कुंवर सिंह के विद्रोह को दबाने के बाद इस क्षेत्र में खेती को विकसित करने की नीति अपनाई, ताकि किसानों का असंतोष शांत किया जा सके. तो 19वी सदी के उतरार्ध में सोन नहर व्यवस्था के जरिये उन्होंने खेती को विकसित करने की नीति अपनाई. सोन नहर प्रणाली का 75 फीसदी हिस्सा शाहाबाद जिले में ही पड़ता है. इस व्यवस्था से कुछ हद तक कृषि का बाजारीकरण हुआ. इसके दो परिणाम हुए: एक तरफ जमींदारों को लगान के रूप में ज्यादा आय प्राप्त हुई, वही आबादी के एक बड़े हिस्से को आर्थिक स्थायित्व भी मिला. दूसरी तरफ, किसानों में वर्ग विभेद बढ़ा और निचले स्तर पर लोग खेती से अलग हो गए. जो दलित परिवार के थे, वे कलकत्ता की ओर कूच कर गये, और वहां कूली का काम करने लगे  या फिर चटकलों में मजदूर बन गए. और जो उच्च जातियों के थे, वे ब्रिटिश सरकार की पुलिस में भर्ती हो गए. इसका परिणाम ये हुआ कि भोजपुर में हथियारों की आमद हुई और एक लम्पट किस्म की संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ.

स्वतंत्रता के बाद भी तमाम भूमि सुधारों के प्रयास के बाद भी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं आया. यहाँ की कुल खेती योग्य भूमि के 15.2 प्रतिशत हिस्से पर 1.5 धनी किसानों और भूपतियों का कब्ज़ा रहा है. नहर के पानी के ऊँचे रेट और कृषि की बढती लागत के चलते छोटे किसान बड़े किसानों के पास अपनी जमीन रेहन रखने लगे.

काश्तकारों और भूस्वामियों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रही. वे भूस्वामियों की दया पर जीने के लिए विवश थे. भूस्वामी जो जमीन उन्हें देते खेती के लिए, उसका कोई रिकॉर्ड नहीं होता. वे जब चाहते, जमीन वापस ले लेते.

भोजपुर में छठे दशक में समाजवादी आन्दोलन का जबरदस्त प्रचार प्रसार हुआ. इनका समर्थन वर्ग माध्यम वर्ग की तीन जातियों- अहीर उर्फ़ यादव, कोइरी और कुर्मी के बीच था. ये वही वर्ग था ( भूमिहारों का भी एक बड़ा तबका था, पर वो समाजवादी आन्दोलन के समर्थन में नहीं था) जिसे जमींदारी उन्मूलन से मुख्य तौर पर फायदा पहुंचा था. संख्या बल में भी अधिक थे नतीजा ये हुआ कि 1967 के विधान सभा चुनावों में शाहाबाद जिले में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 7 सीटें जीतने में कामयाब रही. यादव, कुर्मी और कोइरी जाति के पढ़े लिखे युवक अब ऊँची जातियों के अपमानजनक व्यवहार सहने के लिए तैयार नहीं थे.

1953 में भोजपुर में कम्युनिस्ट पार्टी की जिला इकाई की स्थापना हुई:

1953 में भोजपुर में कम्युनिस्ट पार्टी की जिला ईकाई की स्थापना हुई. शुरू में समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने मिलकर नहर आन्दोलन चलाया. पर समाजवादियों ने ( अपने सपोर्ट बेस के चलते) भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की समस्या की ओर ध्यान नही दिया आगे चलकर सीपीआई के कई नेता नक्सल आन्दोलन से जुड़े और उसके विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.  रामनरेश दुसाध, महाराज महतो और जगदीश महतो, जिन्होंने भोजपुर में नक्सल आन्दोलन को जन्म दिया, पहले सीपीआई के नेता, समर्थक हुआ करते थे.

 

भोजपुर में नक्सल आन्दोलन की शुरुआत एकवारी गाँव से: 

भोजपुर में नक्सल आन्दोलन की शुरुआत सहार थाना के एकवारी गाँव से हुई. एकवारी एक बड़ा गाँव था, जहां भूमिहारों के घर सबसे अधिक थे, उसके बाद यादव, कोइरी, कहार, धोबी, चमार, कुछ ब्राह्मण थे. सहार ब्लॉक खेती के लिहाज से आगे था, और इसे भोजपुर का हरियाणा भी कहा जाता था. पर अच्छी उपज के बावजूद दलित खेतिहर मजदूरों को काफी कम मजदूरी दी जाती थी. हरित क्रांति से भूपतियों की आमदनी में वृद्धि हुई, पर वे मजदूरी बढाने को तैयार नहीं थे. यही नहीं, बल्कि वहां के जमींदार दलितों की बहु- बेटियों की इज्ज़त कहीं भी, कभी भी लूट लेते थे और कोई चूं भी नहीं कर सकता था.

ऐसे में मास्टर जगदीश ने दलितों को जगाने का प्रयास किया. 1967 के चुनाव में जब मास्टर जगदीश ने वहां के जमींदारों के द्वारा बूथ कैप्चर का विरोध किया, तो उनकी निर्मम पिटाई की गयी. महीनों वे अस्पताल में रहे. अस्पताल से छूटने के बाद मास्टर जगदीश की जिन्दगी की दिशा बदल गयी. वे नक्सल वादी विचारधारा के संपर्क में आते चले गये. इसके बाद जनवरी1971 से मार्च 1971 के बीच एक के बाद एक पांच सफाए हुए. एकवारी में पहली ह्त्या 23 फरबरी, 1971 शिव पूजन सिंह की हुई, जो खुद तो छोटे किसान थे पर जमींदारों के लठैत थे. FIR में जगदीश महतो, रामेश्वर अहीर, भिखारी कहार, महाराज महतो और सिंहासन चमार का नाम था.

जगदीश महतो के भाई वासुदेव महतो बताते हैं, ” जगदीश महतो को पहली नौकरी  औरंगाबाद में शिक्षक की नौकरी मिली थी. उन्हें गणित पढ़ाना बहुत पसंद था.  बाद में वे आरा के एच डी जैन कॉलेज में विज्ञान पढ़ाने लगे. पर 17 फरबरी 1967 को उनकी भूमिहारों ने जिस बेरहमी से पिटाई की, उसने उनकी जीवनधारा ही बदल दी.”

मास्टर जगदीश महतों की ह्त्या मुसहरी टोले के दलितों के हाथों हो गयी: 

एकवारी के दलितों को आज भी ये दुःख सालता  है कि मास्टर जगदीश की ह्त्या उनके अपने ही लोगों के हाथों हो गयी. 10 दिसंबर 1972 का वो काला दिन था, मास्टर जगदीश अपने दो साथियों के साथ जमींदार हरी सिंह पर हमला कर छुपने के लिए भाग रहे थे. भागते भागते वे पडोस के खुदरा गांव के मुसहर टोले में जा छिपे. उनके पीछे पीछे कुछ ट्रक ड्राइवर्स भी दौड़े, जिन्हें लगा कि उनके सामान की चोरी करने वाले लोग हैं. साथ में जमींदार के भी लठैत थे. टोले में उन्हें खोज निकाला गया और उन्हें उनके साथियों के साथ लाठी से पीट पीट कर हत्या कर दी गयी. इसमें गलती से मुसहर टोले के दलित भी थे.

मास्टर जगदीश शहीद हो गए. अपनी शहादत के समय वे माकपा के स्टेट मेम्बर थे और उनकी पहचान थी भोजपुर में नक्सल आन्दोलन के शुरुआतकर्ता की. बिहार के भूमिहीन दलित मजदूरों ने अपनी इज्ज़त, अपनी सम्मान जनक मजदूरी की लड़ाई का पाठ पढ़ लिया था. अब भोजपुर के हरे भरे खेत लाल गर्म खून से रंगने वाले थे. जल्द ही सोन नदी को पार कर ये हिंसक संघर्ष पटना, जहानाबाद, और पुरे मध्य बिहार में फ़ैल गया. अब नक्सालियों को न सिर्फ उच्च और मध्य जाति के जमींदारों से लड़ना था, बल्कि साथ में राज्य की पुलिस से भी लड़ना था.

पहली चोट पड़ी 1977 में बेलछी में, जहाँ कुर्मियों ने 11 दलितों को ज़िंदा जला दिया. इसके बाद तो अगले तीन दशकों तक मध्य बिहार हिंसा प्रतिहिंसा की आग में जलता रहा.

Balendushekhar Mangalmurty is Editor in Chief of marginalised.in

bsmangalmurty@gmail.com


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