23 साल के बाद 76 वर्षीय इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायण को फर्जी जासूसी काण्ड में न्याय मिला.

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को 1994 के एक जासूसी कांड के संबंध में कहा कि इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन को “बेवजह गिरफ्तार एवं परेशान किया गया और मानसिक प्रताड़ना” दी गई. साथ ही उसने केरल पुलिस के अधिकारियों की भूमिका की जांच के आदेश दिए. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की एक पीठ ने मामले में मानसिक प्रताड़ना के शिकार हुए 76 वर्षीय नारायणन को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने को कहा. इस पीठ में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे. पीठ ने जासूसी मामले में नारायणन को फंसाए जाने की जांच करने के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति डी के जैन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल भी गठित किया. नारायणन ने केरल उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया था जिसमें कहा गया था कि पूर्व डीजीपी और पुलिस के दो सेवानिवृत्त अधीक्षकों के. के जोशुआ और एस विजयन के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की जरूरत नहीं है. दोनों को बाद में सीबीआई ने वैज्ञानिक की अवैध गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार ठहराया था.

उच्चतम न्यायालय ने 1998 में राज्य सरकार को नारायणन व मामले में छोड़े गए अन्य को एक-एक लाख रुपये का मुआवाजा देने का निर्देश दिया था. बाद में नारायणन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का रुख कर उनके द्वारा झेली गई मानसिक पीड़ा एवं प्रताड़ना के लिए राज्य सरकार से मुआवजा मांगा था. आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने और उच्चतम न्यायालय के 29 अप्रैल, 1998 के फैसले को ध्यान में रखते हुए मार्च 2001 में उन्हें 10 लाख रुपये का अंतरिम हर्जाना देने को कहा.

नंबी नारायणन की याचिका के मुताबिक केरल पुलिस के अधिकारियों सिबी मैथ्यू, केके जोशुआ और एस विजयन ने उन्हें जासूसी के फर्जी मामले में फंसाया था और इसकी वजह से उन्हें सालों तक शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी. वे इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने 23 फरवरी यानी गुरुवार को कहा है कि इस मामले की सुनवाई अप्रैल के दूसरे हफ्ते में होगी.

ये सभी अधिकारी रिटायर हो चुके हैं. इस मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने भी इन अधिकारियों को साजिश रचने के लिए जिम्मेदार ठहराया था. इस आधार पर उम्मीद की जा सकती है कि सुप्रीम कोर्ट इनके खिलाफ फैसला सुनाए. हालांकि नारायणन ने जो तकलीफ और प्रताड़ना सही है, उसकी भरपाई इस फैसले से भी पूरी तरह हो पाना मुमकिन नहीं है, फिर भी इस पूर्व वैज्ञानिक की लड़ाई एक नतीजे पर जरूर पहुंच जाएगी और कम से कम उसे न्याय मिल जाएगा.

क्या है तथाकथित इसरो जासूसी मामला? 

इसरो में कथित जासूसी मामला तेईस साल पुराना है. 20 अक्टूबर, 1994 को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में जब मालदीव की नागरिक मरियम रशीदा को पुलिस ने हिरासत में लिया तब उनके ऊपर भारत में वीजा अवधि से ज्यादा रुकने का आरोप था. लेकिन अगले महीने जब पुलिस ने इसरो के दो वैज्ञानिकों – एस नम्बी नारायणन और डी शशिकुमार को गिरफ्तार किया तो मरियम की गिरफ्तारी ऐसी लगने लगी जैसे केरल पुलिस और इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) ने बहुत बड़ा कारनामा कर दिया हो. पुलिस ने दावा किया कि इसरो में क्रायोजनिक इंजन विकास परियोजना के प्रमुख नारायणन व उनके सहयोगी शशिकुमार ने मरियम को परियोजना से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेज सौंपे थे. पुलिस का यह भी कहना था कि ये दोनों इसरो में जासूसी करके इंजन विकास से जुड़ी पूरी जानकारी इकट्ठा कर रहे थे ताकि वह विदेशी एजेंटों को सौंपी जा सके.

पुलिस ने इसे ‘सेक्स-जासूसी स्कैंडल’ की तरह पेश किया था यानी इसमें सबंधित महिलाएं वैज्ञानिकों के लिए ‘हनी ट्रैप’ थीं. यह ऐसा मामला था जिससे वैज्ञानिक समुदाय और केंद्र सरकार सहित आम लोग भी सकते में आ गए. उस समय क्रायोजेनिक इंजन का विकास इसरो की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना थी. ये इंजन लिक्विड ऑक्सीजन-हाइड्रोजन के ईंधन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं और इनसे भारी सेटेलाइटों को अंतरिक्ष में छोड़ना संभव है. इंजन के लिए बेहद कम तापमान पर लिक्विड ऑक्सीजन-हाइड्रोजन से ऊर्जा प्राप्त करना एक जटिल तकनीक है और सबसे पहले 1970 के दशक में अमेरिका ने इसमें विशेषज्ञता हासिल की थी. इसके बाद जापान, फ्रांस, रूस और चीन ने अपने यहां इस तकनीक का विकास किया.

भारत 1990 के दशक से अपने रॉकेटों के लिए क्रायोजेनिक इंजन हासिल करना चाहता था. 1991 में दो क्रायोजेनिक इंजन और तकनीकी हस्तांतरण के लिए रूस के साथ भारत का करार हो गया. लेकिन अमेरिका ने यह कहते हुए इस पर आपत्ति जता दी कि यह मिसाइल तकनीक प्रसार के कानून का उल्लंघन है. आखिरकार अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए रूस को यह करार खारिज करना पड़ा.

इसी समय इसरो ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के विकास का फैसला लिया और इसके लिए एक परियोजना शुरू की गई. नारायणन इस परियोजना के प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाए गए. नारायणन ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने पहली बार भारत में लिक्विड फ्यूल टेक्नॉलोजी का विकास किया था. इसरो के सफलतम रॉकेट पीएसएलवी (पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल) में इसी तकनीक पर आधारित इंजन इस्तेमाल किया जाता है. उस समय नारायणन सेकंड स्टेज पीएसएलवी और फोर्थ स्टेज पीएसएलवी के भी प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे.

इसरो में कथित जासूसी का मामला परियोजना शुरू होने के बस कुछ ही महीनों के बाद की घटना है. इस मामले में मुख्य आरोपी तो तीन ही थे  लेकिन पुलिस ने कुल छह गिरफ्तारियां की थीं. इनमें मरियम की एक सहेली फौजिया हसन, इसरो को सामान सप्लाई करने वाली कंपनी का एक एजेंट और क्रायोजेनिक इंजन के क्षेत्र में काम करने वाली रूस की एक कंपनी का भारतीय एजेंट शामिल थे.


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