“किलकारी” के नन्हे कलाकार राज आर्यन की दास्तां उषालाल सिंह की जुबानी

उषालाल सिंह 

राज आर्यन, उर्फ आजाद, उम्र करीब दस साल, जहाँ इस उम्र के बच्चे कार्टून चैनलों और मोबाइल में गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं वहीं ये नन्हा बाल कवि अपने नाम कई उपलब्धियां हासिल करने में जुटा है. “किलकारी” का सबसे नन्हा कलाकार अपनी लेखन और आवाज से सबके दिल क्या दुनियाँ जीतने की हैसियत रखता है. अपनी भावनाओं और आस- पास घटित घटनाओं पर नन्हें मन- मस्तिष्क से विस्तृत विश्लेषण करता उसे शब्दों में बाँधने की कला रखता है. तीन भाई बहनों में सबसे छोटा होने के कारण घर का सबसे लाड़ला है खास कर माँ का.

बचपन की एक कहावत याद आती है कि बड़ा बच्चा बाप का,छोटा बच्चा माँ का और मंझला या बीच वाले सारे बच्चे दादा दादी के. तब मुझे बहुत दुःख होता था रोती भी थी,क्योंकि भाई बहनों में मेरा स्थान भी बीच वाला है. बाद में बी.एड.करने के क्रम में चाइल्ड साइकोलॉजी पढ़ने को मिला तब ईडिपस काम्प्लेक्स और  इलेक्ट्रा काम्प्लेक्स के बारे में समझने का मौक़ा मिला.  इलेक्ट्रा काम्प्लेक्स  में लड़की का पिता के प्रति विशेष लगाव जबकि ईडिपस कॉम्पेक्स में लड़का का माँ के प्रति विशेष लगाव होता है. ये लगाव बचपन में इतना अधिक होता है कि बच्ची अपने और पिता के बीच माँ को खलनायिका समझती है तो बच्चा इसके उलट पिता को अपने और माँ के बीच खलनायक समझता है.

समय के साथ समाजीकरण का ही हिस्सा है कि बच्चे को धीरे -धीरे घर से दूरी बढ़ाने के ख्याल से ही आस पड़ोस में दूसरे बच्चों संग खेलने देना ,खिलौनों के साथ खेलना थोड़ा बड़ा होने पर स्कूल भेजना सभी उसी समाजीकरण का हिस्सा है.तब बच्चा अपने घर परिवार से निकल कर अपना दायरा बढ़ाता है.

हाँ तो बता रही थी कि छोटा राज माँ के बेहद करीब है. अभी राज की माँ बीमार हैं उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हुआ है, उनका ऑपरेशन हो चुका है, केमोथेरेपी चल रही है. माँ जितने दिन अस्पताल रही नन्हा आर्यन सबसे ज्यादा व्यथित हुआ है. बिना खाये- पिये औंधे मुहँ माँ के बिस्तर पर पड़ा रहता था. जब उसके पापा उसे अस्पताल ले जाते तो माँ संग ही दो कौर खाता. दिन भर माँ के साथ अस्पताल में रहना उसे ज्यादा सुखद लगता. बस उसे तो हर हाल में माँ का सानिध्य चाहिए था. पापा राज को रात का खाना भी माँ के साथ खिलाकर सोने के लिए घर पहुँचाते.  इस बीच अपने कविता कहानी से विमुख होकर सिर्फ प्रार्थना में माँ को शामिल करता. जब माँ घर आ गई तब भी नन्हा राज अपनी समझ से माँ का पूरा ख्याल रखता है. जबकि पापा, दीदी,भैया सब माँ का ख्याल रखते हैं पर ये भी अपनी सेवा से नहीं चूकता.  आधी – आधी रात को भी माँ के लिए पानी गर्म करके देना,या पानी पिलाना मतलब माँ के नींद सोना और उनकी नींद जागना।श्रवण कुमार की तरह माँ की चरणों में ही रहना उसे पसन्द है.  जब माँ बताने लगी कि एक दिन भी मेरे पैरों में तेल मालिश किये बिना ये स्कूल नहीं जाता तब मैं अवाक सुनती रही और बेवफा आँखे उमड़ने को आतुर हो उठी. माँ कहने लगी कि ,इसी उम्र में मेरे किये का अपना कर्ज उतार रहा है.

कविता लेखन और कविता पाठ के लिए कई सम्मान पा चुका है राज:

राज अपनी कविता लेखन और कविता पाठ के कारण कई जगह सम्मानित हो चुका है. राज हिन्दी के अलावे मगही में भी अच्छी कविताएं लिखते हैं. गौरैया संरक्षण दिवस पर इनकी कविता “ओ रे गौरैया……🐧” एफ एम रेडियो मिर्ची पर भी शामिल की गई थी. कोलकाता में राज को पुरुस्कार में जब 5000 रु दिए गए तो पूछा गया कि बेटा आप इस पैसे का क्या करोगे? तब मासूम का जवाब भी मासूमियत भरा था-
“माँ के लिए बनारसी साड़ी खरीदेंगे” ओह! कितना सुखद रहा होगा वो पल।कितनी धन्य हैं राज की जननी।कितनी अच्छी परवरिश मिली होगी कि ये संस्कार आये.

बाद में पापा ने समझाया कि बेटा माँ के पास तो साड़ी है. ऐसा करते हैं इसमें और पैसे मिलाकर आपके लिए हारमोनियम ले देता हूँ.
राज आप बहुत आगे जायेंगे. जहाँ बच्चे पिता से पहचान पाते हैं आपने इसी उम्र में अपने नाम से पिता की पहचान बनाई है. आप सफलता की चरमोत्कर्ष पर पहुँचेगें पर पाँव यथार्थ के धरातल पर ही रखेंगे ऐसा विश्वास है.


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