#Bravewomen: दयामनी बारला, घरेलू नौकरानी से अंतरराष्ट्रीय स्तर के सोशल एक्टिविस्ट तक का सफर

दयामनी बारला, यह नाम अपने आप में प्रतीक है जीवन के तमाम संघर्षों के साथ जीते हुए  समाज में अपनी जगह बनाने और अपने हक और अधिकारों की लड़ाई का.  55 वर्षीय झारखंड की दयामनी बारला एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप में पहचानी जाती हैं. दयामनी बारला मुंडा आदिवासी समुदाय से आती हैं और अपने समुदाय के लोगों को उनका हक दिलाने और उन्हें संरक्षित करने के लिए इन्होंने लंबा संघर्ष किया है.

आर्सेलर मित्तल को झारखंड से वापस भेजा

दुनिया के सबसे बड़े स्टील कारोबारी लक्ष्मी निवास मित्तल की कंपनी अर्सेलर मित्तल 8.79 बिलियन डालर की लागत से झारखंड के खूंटी जिले में दुनिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट ल गाने वाली थी, इसके लिए उन्हें सरकार से अनुमति भी मिल गयी थी, लेकिन दयामनी बारला ने इस इलाके में इतना उग्र आंदोलन चलाया कि उन्हें अपना बोरिया बिस्तर बांधना पड़ा. इस प्लांट के लिए 40 गांवों के लोगों को अपनी जमीन गंवानी पड़ती और उनका विस्थापन होता. इसे आदिवासियों के साथ धोखा बताकर दयामनी बारला ने उग्र आंदोलन चलाया और उनके समर्थन में हजारों आदिवासी खड़े हो गये. दयामनी बारला जल , जंगल जमीन पर आदिवासियों के हक की बात करती हैं. वे अकसर अपने भाषणों और आलेखों में यह बात कहती आयीं हैं कि वे विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन सरकार को यह देखना होगा कि विकास में वो आदिवासियों को किस तरह भागीदार बनाती है ना कि उनके विस्थापन की कीमत पर विकास हो और वे फिर जमीन के मालिक से दूसरों की जमीन पर मजदूर हो जायें.

एक घरेलू नौकरानी से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के एक्टिविस्ट तक का सफर

झारखंड के खूंटी जिले की रहने वाली दयामनी का बचपन बहुत संघर्षों में बीता. जब वे बहुत छोटी थीं, उनके पिता की जमीन को कुछ लोगों ने उनसे धोखे से हड़प लिया, परिणामस्वरूप उनका परिवार जमीन मालिक से नौकर बन गया. पिता मजदूरी करने लगे और मां दूसरों के घरों में काम. किसी तरह स्कूल की पढ़ाई आठवीं तक की. फिर दयामनी रांची आ गयीं और यहां उन्होंने दूसरों के घरों में जूठे बरतन साफ करके अपनी आगे की पढ़ाई की. स्कूल के बाद रांची विश्वविद्यालय तक गयीं. संघर्ष के दिनों में उन्होंने कई रातें रांची स्टेशन पर भी गुजारीं. धीरे-धीरे उन्होंने एक झोपड़नुमा चाय की दुकान रांची के क्लब रोड में खोली. आज भी उनका वह दुकान उसी रूप में चल रहा है, जहां वे खुद बैठती हैं और आदिवासियों के हक और अधिकारों की रक्षा के लिए प्लानिंग करती हैं. उन्होंने आदिवासियों के मूल मुद्दे को उठाया और सरकार को मजबूर किया कि वे उनपर ध्यान दें. दयामनी को संघर्ष के दिनों में झारखंड के प्रतिष्ठित अखबार प्रभात खबर का सहयोग मिला, जिसके कारण वे अपनी बात हजारों लोगों तक पहुंचा पायीं.

NFI मीडिया फेलोशिप अवार्ड सहित मिल चुके हैं कई पुरस्कार

दयामनी बारला को झारखंड में जल-जंगल और जमीन की लड़ाई के लिए अमेरिका में वर्ष 2013 में कल्चरल सर्वाइवल एलेन एल लूज इंडिजिंस राइट अवार्ड से सम्मानित किया चुका है. इसके अतिरिक्त उन्हें . कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं जिनमें ग्रामीण पत्रकारिता के लिए काउंटर मीडिया अवार्ड भी शामिल है.. यह पुरस्कार प्राप्त करने वाली वह पहली झारखंडी हैं. लेखन के लिए एनएफआई का पुरस्कार भी मिला है. इसके साथ ही वर्ष 2008 में कॉरपोरेट क्राइम के खिलाफ संघर्ष करने के लिए चिंगारी अवार्ड और 2011 में एक्टिविस्ट अवार्ड भी मिला है. आज भी दयानमनी बारला आदिवासी समुदाय के हक की लड़ाई के लिए संघर्षरत हैं, उन्हें इस सिलसिले में जेल भी जाना पड़ा है, लेकिन उन्होंने लड़ाई बंद नहीं की आज भी मुखर हैं.

यह भी पढ़े: #Bravewomen:गैंग रेप सर्वाइवर मुख्तार माई जिसे सामूहिक बलात्कार और धमकी तोड़ नही सकी


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

One thought on “#Bravewomen: दयामनी बारला, घरेलू नौकरानी से अंतरराष्ट्रीय स्तर के सोशल एक्टिविस्ट तक का सफर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.