#जयंती: जेपी, आज़ाद भारत के सबसे दिग्गज नेता; सत्ता जिन्हें ललचा न सकी

नवीन शर्मा

स्वतंत्रता आंदोलन मेंं तो हम दर्जनों ऐसे नेताओं के नाम ले सकते हैं जिन्होंने अपने नेतृत्व क्षमता के बल पर लोगों को आजादी की लड़ाई से जोड़ा था. लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति में जिस एक नेता ने सबसे प्रभावकारी भूमिका निभाई वे निस्संदेह लोकनायक जयप्रकाश नारायण हैं. इंदिरा गांधी के आत्मघाती फैसले आपातकाल के विरुद्ध आंदोलन कर केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनवाने में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभायी. देश को उद्वेलित करने की शक्ति जेपी में ही थी. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बाद अगर किसी एक व्यक्ति ने लोगों को राजनीतिक परिवर्तन के लिए सड़कों पर उतारने में सफलता पाई तो वह लोकनायक जय प्रकाश नारायण (JP) थे. 1940 के बाद से जीवन के अंत तक अलग-अलग मौकों, आंदोलनों व मुहिम में जेपी महत्वपूर्ण भूमिका में रहे. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान वे ब्रिटिश शासकों की हिरासत में रहे, तो दशकों बाद आजाद हिंदुस्तान की सरकार ने उन्हें आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया. देश और देश की जनता के उत्थान के लिए समर्पित जेपी ने हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों को मान दिया. आजादी के बाद वे बड़े-बड़े पद हासिल कर सकते थे, पर उन्होंने गांधीवादी आदर्शों के अनुरूप जीना चुना. जब उन्हें लगा कि सत्ता निरंकुशता और भ्रष्टाचार से ग्रस्त हो रही है, तो वे फिर कूद पड़े संघर्ष के मैदान में.

 

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गाँव में हुआ. उनके पिता का नाम हर्सुल दयाल श्रीवास्तव और माता का नाम फूल रानी देवी था. वो माता-पिता की चौथी संतान थे. जब जयप्रकाश 9 साल के थे कॉलेजिएट स्कूल में दाखिला लेने के लिए पटना गए.1920 में 18 वर्ष की उम्र मे उनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ. विवाह के बाद जयप्रकाश पढाई में व्यस्त थे इसलिए प्रभावती को उन्होंने कस्तूरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम मे रखा. मौलाना अबुल कलाम आजाद के भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने पटना कॉलेज छोड़कर ‘बिहार विद्यापीठ’ में दाखिला ले लिया. उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए बिहार विद्यापीठ में पढाई के बाद 1922 में जयप्रकाश आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए. पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने कई छोटे मोटे पार्टटाइम काम जैसे रेस्टोरेंट में भी काम किया. वे साम्यवादी विचारो की तरफ झुके. भारत वापस आने के बाद उन्होंने ‘ समाजवाद क्यों? (Why Socialism?)’ ये किताब लिखी.

भारत छोड़ो आंदोलन के नायक

आठ अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तो कांग्रेस के अधिकतर बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था. उस समय देश में नेतृत्वहीनता की स्थिति बन गयी थी. उसी माहौल में जेपी, योगेंद्र शुक्ल समेत अन्य नेता जो हजारीबाग जेल में बंद थे, उन लोगों ने योजना बनायी और जेल से बाहर निकले. वहां से निकलने के बाद जेपी ने दो चिट्ठियां जारी कीं. इनमें एक थी, लेटर टू ऑल फाइटर्स ऑफ फ्रीडम, जिसमें उन्होंने एक मार्गदर्शन देने की कोशिश की थी. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उन्होंने भूमिगत आंदोलन को संगठित करने की कोशिश की. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के उपयोग को सही समझा. उन्होंने नेपाल जा कर आज़ाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया. उन्हें एक बार फिर पंजाब में चलती ट्रेन में सितंबर 1943 मे गिरफ्तार कर लिया गया. 16 महीने बाद जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल मे स्थांतरित कर दिया गया. इसके उपरांत गांधी जी ने यह साफ कर दिया था कि डॉ॰ लोहिया और जेपी की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नामुमकिन है.अप्रेल 1946 को उन्हें आजाद कर दिया गया. आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण को सरकार में शामिल होने कहा गया था. ऐसा कहा जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हेंं गृह मंत्री का पद लेने के लिए कहा था. उन्होंने इनकार कर दिया था.

आजादी के बाद ताकतवर विपक्ष खड़ा किया

आजादी के बाथ कॉग्रेस पार्टी के समाजवादी विचारो के नेताओ को एकत्रित करके उन्होंने कॉग्रेस पक्ष के बाहर जाकर 1948 में आचार्य नरेंद्र देव के साथ मिलकर ऑल इंडिया कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की. इसने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को चुनौती दी. 1953 में जयप्रकाश इन्होंने रेल के कर्मचारीओं की हड़ताल का नेतृत्व किया. भूदान आंदोलन से जुड़े उसके बाद जेपी समाजवादी राजनीति से बाहर निकल कर आचार्य विनोबा भावे के ‘भूदान आंदोलन’ में शामिल हुए। 19 अप्रेल, 1954 में गया, बिहार मे उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की. 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष मे राजनीति छोड़ने का निर्णय लिया.

फिर से राजनीति में आने को विवश हुए:

1973 में देश में महंगाई और भ्रष्टाचार का दंश झेल रहा था. इससे चिंतित हो उन्होंने एक बार फिर संपूर्ण क्रांति का नारा दिया. इस बार उनके निशाने पर अपनी ही सरकार थी. सरकार के कामकाज और सरकारी गतिविधियां निरंकुश हो गई थीं. गुजरात में सरकार के विरोध का पहला बिगुल बजा. बिहार में भी बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने छात्रों के संघर्ष को दबाने के लिए गोलियां तक चलवा दी थी. तीन हफ्ते तक हिंसा होती रही. सेना और अर्द्धसैनिक बलों को बिहार में मोर्चा संभालना पड़ा था. जैसे-जैसे देश में जेपी का आंदोलन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे इंदिरा गांधी के मन में भय पैदा हो गया था. देश के हालत जिस तरह के हो गए थे उससे उन्हें लगने लगा था कि विदेशी ताकत की मदद से देश में आंदोलन चलाए जा रहे हैं और उनकी सरकार का तख्ता पलट कर दिया जाएगा. जेपी 1974 में इंदिरा गांधी व संजय गांधी की तानाशाही प्रवृत्ति के कटु आलोचक के रूप में प्रभावी ढंग से उभरे. उनकी निगाह में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार भ्रष्ट व अलोकतांत्रिक होती जा रही थी. 1975 में निचली अदालत में गांधी पर चुनावों में भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो गया था.

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