#2019लोकसभा: सीटों का बंटवारा अंतिम रूप से तय नहीं; अभी बातचीत चल रही है: उपेन्द्र कुशवाहा

अगले लोकसभा चुनाव को लेकर बिहार में भाजपा और जदयू के बीच सीटों के बंटवारे पर तो बात बन गई है. सूत्रों के अनुसार, तय हुआ है कि जेडीयू और बीजेपी राज्य में 17-17 सीटों पर लड़ेंगी. रामविलास पासवान की पार्टी 4 और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी 2 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी.  सूत्रों के अनुसार 40 सीटों का बंटवारा भी नए सिरे से होगा और इसमें इन दलों के बीच कई सीटों की अदला-बदली भी हो सकती है. लेकिन एनडीए के अन्य घटक दलों को कितनी सीटें मिलेंगी, इसपर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है. इस बीच केंद्रीय मंत्री और एनडीए की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने शनिवार को कहा कि सीटों की संख्या अभी तक तय नहीं की गई है. हम बातचीत कर रहे हैं.

सीटों के बंटवारे पर अपना दबाब बनाने के लिए कुशवाहा ने राजद नेता एवं बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से मुलाकात की.  तेजस्वी ने पत्रकारों से कहा, ‘‘2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा ने 40 में से 22 सीटें जीती थी. कुमार को एक बराबर साझेदार समझे जाने की इच्छा जताई जा रही है जिन्होंने केवल दो सीटें जीती थी और वह (भाजपा) अपना जनाधार खो चुकी है जिससे अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निराशा का पता चलता है.’’ हालांकि, तेजस्वी और कुशवाहा के बीच हुई बातचीत का ब्यौरा अभी पता नहीं चल पाया है. बैठक के बाद रालोसपा के एक पदाधिकारी ने टालने के स्वर में कहा,‘‘राजनीतिक हस्तियां प्राय: एक दूसरे से मिलती रहती है, भले ही वे सहयोगी न हो.’’

“इस मुद्दे पर मैंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से बात की है, अभी कुछ भी कह नहीं सकते हैं.”- उपेन्द्र कुशवाहा

तेजस्वी से मुलाक़ात के बाद राजनीतिक गलियारे में संभावना उठने लगी थी कि उपेंद्र कुशवाहा आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन जदयू नेता केसी त्यागी ने स्पष्ट किया है कि उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी दोनों ही दल एनडीए के साथ अगले चुनाव में भी बने रहेंगे.

बीजेपी के लिए भी चुनौती बनी हुई है: 

दरअसल, इस समझौते से अभी बिहार में बीजेपी के लिए मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं. ऐसा इसलिए भी है कि अब बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चिंता और चुनौती उन नेताओं को मनाने की होगी, जिनकी सीटें सहयोगी दलों को दी जाएंगी. अगर बीजेपी 17 सीटों पर लड़ती है तो 5 मौजूदा सांसद का टिकट कटेगा और 12 सीटों पर दावेदारी हटेगी. ऐसे में बीजेपी को अपने मौजूदा सांसद और नेताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है. इसके अलावा रामविलास पासवान की पार्टी को भी 2 मौजूदा सीट छोड़नी पड़ सकती है. खबर है कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को भी एक सीट छोड़नी पड़ सकती है.

सीटों के बंटवारे को लेकर लोजपा के अंदाज़ भी तल्ख़ हैं. चिराग पासवान ने हालाँकि  दावा किया है कि एलजेपी एनडीए के साथ ही रहेगी पर वे शर्त ये लगाते हैं कि  हमें उम्मीद है कि चुनाव लड़ने के लिए सम्मानजनक सीटें मिलेंगी.  इस मुद्दे पर एलजेपी बिहार चीफ पशुपति कुमार पारस और अधिक स्पष्टवादिता के साथ कहा  कि 2014 लोकसभा चुनावों में एलजेपी जिन 7 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, उसे वही सीटें चाहिए. उन्होंने कहा कि इससे कम पर समझौता होने की संभावना नहीं है. हालाँकि इधर खबर आई है कि रामविलास पासवान लोक सभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और राज्य सभा का रास्ता पकड़ेंगे. इसे सीटों के नए बंटवारे के सन्दर्भ में भी समझा जा सकता है.

लोजपा और रालोसपा को मनाना इतना आसान नहीं है: 

लोजपा ने तो यूपी और झारखंड में भी कुछ सीटों की मांग कर दी है. उधर, उपेंद्र कुशवाहा लगातार खीर ऑप्शन यादवों के दूध और कुशवाहा के चावल से खीर बनाने का संकेत दे रहे हैं. नीतीश कुमार के वोट बैंक पर नजर गड़ाए रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता धानुक-कुर्मी एकता मंच बनाकर आगामी 2 नवंबर को राजधानी पटना में एक बड़ा जातीय समारोह कर राज्य में पार्टी का आधार बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हैं. सूत्रों के मुताबिक कुशवाहा राज्य के सीएम नीतीश कुमार के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। कुर्मी-कोइरी समाज अभीतक नीतीश कुमार के साथ खड़ा रहा है. ऐसे में आने वाले समय में राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखना रोचक होगा.

 

कौन हैं उपेन्द्र कुशवाहा? 

उपेन्द्र कुशवाहा रोहतास जिले के कराकाट लोक सभा सीट से सांसद हैं. कराकाट लोक सभा क्षेत्र कुशवाहा बहुल संसदीय क्षेत्र है. वे राज्य सभा के भी पूर्व सांसद रह चुके हैं.

कुशवाहा ने अपना राजनीतिक करियर 1985 में शुरू किया. तीन साल यानि 1985 से 1988 तक वे युवा लोक दल में जनरल सेक्रेटरी रहे. फिर 1988 से 1993 तक वे युवा जनता दल में राष्ट्रीय जनरल सेक्रेटरी बने रहे. समता पार्टी की स्थापना होने के बाद उपेन्द्र कुशवाहा 1994 से 2002 तक समता पार्टी के जनरल सेक्रेटरी के रूप में काम किया. 2000 में बिहार विधान सभा के सदस्य के रूप में चुने गए और फिर विधान सभा में समता पार्टी के डिप्टी लीडर चुने गये. मार्च 2004 में सुशील मोदी के लोक सभा में चुने जाने के बाद बिहार विधान सभा में भी परिवर्तन आया. जदयू के सदस्यों की संख्या बीजेपी के सदस्यों से बढ़ गयी थी. ऐसे में उपेन्द्र कुशवाहा विधान सभा में  विरोधी दल के नेता बन गये.

आगे चल कर उनके नीतीश कुमार से मतभेद हो गए और फिर वे जनता दल यूनाइटेड को छोड़ कर अपनी अलग राह बनाने चल पड़े. 3 मार्च 2013 को उन्होंने राष्ट्रीय लोक दल ( रालोसपा) की स्थापना की और गांधी मैदान में बुलाई गयी जनसभा में पार्टी का नाम और झंडा उजागर किया.

फिलहाल कुशवाहा केंद्र में मंत्री हैं और 2019 के लोक सभा चुनाव के लिए बारगेनिंग में लगे हैं.

 

 


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