अमिताभ को बनारसी पान खिलाने वाला गंगा किनारे का छोरा अंजान

नवीन शर्मा
अमिताभ बच्चन की डॉन फिल्म के मशहूर गीत खाईके पान बनारस वाला ने हिंदी सिनेमा के गानों की दुनिया में तहलका मचा दिया था. इस गीत को लिखने वाले अंजान ने नई शैली और अपनी ठेठ बनारसी बोली में गीत लिख कर एक नया ट्रेंड शुरू किया था. इनके पहले हिंदी सिनेमा के गीतों में उर्दू फारसी के शब्दों का ज्यादा इस्तेमाल करनेवाले शायरों का ही बोलबाला था.

गायक मुकेश ने दी फिल्मों में गीत लिखने की सलाह

28 अक्टूबर 1930 को बनारस मे जन्में अंजान का बचपन से शेरो शायरी के प्रति गहरा लगाव था. वे बनारस मे आयोजित कवि सम्मेलन और मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे हालांकि मुशायरो में भी वह उर्दू का इस्तेमाल कम ही किया करते थे.
एक बार गायक मुकेश बनारस आए हुए थे. वे मशहूर क्लार्क होटल में ठहरे थे. होटल के मालिक ने उनसे गुज़ारिश की कि वह एक बार अंजान की कविता सुन लें. मुकेश ने जब कविता सुनी तो वह काफ़ी प्रभावित हुए. उन्होंने अंजान को फ़िल्मों में गीत लिखने की सलाह दी.
हालांकि, उस वक़्त अस्थमा से जूझ रहे अंजान ने मुकेश की सलाह पर अमल नहीं किया लेकिन, बीमारी की वजह से आखिर उन्हें बनारस के पुरसुकून और ख़ुशगावर माहौल को छोड़कर मुंबई का रुख करना पड़ा.

अस्थमा ने मुंबई जाने को किया मजबूर

अंजान के बेटे गीतकार समीर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि पापा से डॉक्टरों ने कहा कि अगर ज़िंदा रहना है तो आपको यह शहर छोड़ना होगा. अस्थमा बहुत बढ़ गया था और उन्हें काफ़ी तकलीफ़ देने लगा था. डॉक्टरों ने मशविरा दिया कि अगर किसी सागर के तट पर जाएंगे, तभी अस्थमा कंट्रोल हो पाएगा. ड्राइ क्लाइमेट में रहेंगें तो बचने की संभावना बहुत कम रहेगी.

लेकिन बीमारी और बेहतर आबो-हवा की ख़ातिर वो 1953 में मुंबई आ गए. उन्होंने मुकेश से मुलाक़ात की. मुकेश ने उन्हें निर्देशक प्रेमनाथ से मिलवाया, जो अपनी फ़िल्म के लिए किसी गीतकार की तलाश में थे. अंजान ने प्रेमनाथ की प्रिजनर ऑफ गोलकोंडा के लिए गाने लिखे. फिल्म के लिये उन्होंने अपना पहला गीत लहर ये डोले कोयल बोले गीत लिखा , लेकिन वह कुछ खास पहचान नही बना पाये.

दस वर्ष तक चला पहचान बनाने का संघर्ष

अनजान ने अपना संघर्ष जारी रखा. इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट फिल्में भी की जिनसे उन्हे कुछ खास फायदा नही हुआ. अचानक ही उनकी मुलाकात जी.एस.कोहली से हुई जिनमे संगीत निर्देशन मे उन्होंने फिल्म लंबे हाथ के लिये ..मत पूछ मेरा है मेरा कौन ..गीत लिखा.  इस गीत के जरिये वह काफी हद तक अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये. लगभग दस वर्ष तक मायानगरी मुंबई मे संघर्ष करने के बाद वर्ष 1963 मे पंडित रविशंकर के संगीत से सजी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर आधारित फिल्म ..गोदान.. में उनके रचित गीत ..चली आज गोरी पिया की नगरिया .. की सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नही देखा.
गीतकार अनजान को इसके बाद कई अच्छी फिल्मो के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गये जिनमे बहारे फिर भी आएंगी,बंधन, कब क्यों और कहां, उमंग, रिवाज, एक नारी एक ब्रह्मचारी  व हंगामा जैसी कई फिल्में शामिल हैं. साठ के दशक में अनजान ने संगीतकार श्याम सागर के संगीत निर्देशन में कई गैर फिल्मी गीत भी लिखे. अनजान द्वारा रचित इन गीतों को बाद में मोहम्मद रफी.मन्ना डे और सुमन कल्याणपुरी जैसे गायकों ने अपना स्वर दिया. इनमें मोहम्मद रफी द्वारा गाया गीत ..मै कब गाता ..काफी लोकप्रिय हुआ था.

भोजपुरी फिल्मों में भी लिखे गीत
अनजान ने कई भोजपुरी फिल्मो के लिये भी गीत लिखे. सत्तर के दशक में बलम परदेसिया का..गोरकी पतरकी के मारे गुलेलवा ..गाना आज भी लोगों के जुबान पर चढ़ा हुआ है.

अमिताभ बच्चन के साथ याराना

अनजान के सिने करियर पर यदि नजर डाले तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पर फिल्माये उनके रचित गीत काफी लोकप्रिय हुए थे. वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म दो अनजाने के.. लुक छिप लुक छिप जाओ ना ..गीत की कामयाबी के बाद अनजान का अमिताभ बच्चन से एक ख़ास रिश्ता बन गया था.  उन्होंने अमिताभ की कई फ़िल्मों के लिए गाने लिखे. जिनमें डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, याराना, नमक हलाल और शराबी उनके करियर में मील का पत्थर रहीं. अंजान ने उनके लिये कई सफल गीत लिखे जिनमें ..बरसों पुराना ये याराना,खून पसीने की मिलेगी तो खायेंगे, रोते हुये आते है सब, ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना.खइके पान बनारस वाला जैसे कई सदाबहार गीत शामिल हैं.

मिथुन की फिल्मों के लिए लिखे सुपरहिट गीत

मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मो के लिये भी अनजान ने दर्जनों सुपरहिट गीत लिखकर उनकी फिल्मों को सफल बनाया है ।इन फिल्मों में डिस्को डांसर,डांस डांस,कसम पैदा करने वाले.करिश्मा कुदरत का.कमांडो .हम इंतजार करेंगे.दाता और दलाल आदि फिल्में शामिल है ।

प्रकाश मेहरा के फेवरेट गीतकार
जाने माने निर्माता-निर्देशक प्रकाश मेहरा खुद भी अच्छे गीतकार थे. उन्होंने कई हिट गीत लिखे हैं लेकिन उनकी फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अंजान के गीतों ने निभायी है. उनकी सदाबहार गीतों के कारण ही प्रकाश मेहरा की ज्यादातार फिल्मे अपने गीत-संगीत के कारण आज भी याद की जाती है.

कल्याण जी आनंद जी के साथ जोड़ी
अंजान ने वैसे तो अपने समय के सभी दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया, लेकिन कल्याणजी-आनंदजी के साथ उनकी जोड़ी कमाल की रही. क़लम के फ़न से सितारों की जगमगाती दुनिया में अंजान ने अपना एक ऐसा मुक़ाम बनाया, जिसकी ताज़गी आज भी महसूस की जा सकती है. अंजान के लिखे यादगार गीतों में, ‘ओ खाइके पान बनारस वाला, खुल जाए बंद अकल का ताला…, इंतहा हो गई इंतज़ार की, आई ना कुछ खब़र, मेरे यार की…, गोरी हैं कलाईयां तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियां…, मुझे नौ लखा मंगा दे रे ओ सैया दीवाने, तेरे जैसा यार कहां, कहां ऐसा याराना…,छू कर, मेरे मन को, किया तूने, क्या इशारा…, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है…, जैसे बेहतरीन गीत हैं.
1964 की फ़िल्म ‘बहारें फिर भी आएँगी’ का गीत “आप के हसीन रुख़ पे आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कसूर है. इस गीत को मोहम्मद रफ़ी ने गाया है, ओ.पी. नय्यर ने स्वरबद्ध किया है, और लिखा है गीतकार अंजान ने.

रिजेक्ट हो गया था छूकर मेरे मन को गीत
याराना फिल्म के गीतकार राजेश रौशन को अंजान का गीत छूकर मेरे मन को बहुत पसंद आया था. लेकिन फिल्म के निर्माता गफ़्फ़ार नाडियाडवाला को पसंद नहीं आया तो उन्होंने इसे बेकार कहा. इस पर राजेश रौशन ने कहा कि यह फ़िल्म बने ना बने, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गाना मैं रिकार्ड करने जा रहा हूँ और यह गाना मैं अपने पैसे से रिकार्ड करने जा रहा हूँ और तुम अभी इसी वक़्त इस रिकार्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नहीं देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा. वह गाना रिकार्ड होके जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होने यह बात कही थी कि अगर यह गाना नहीं होगा तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा और वह गाना माइलस्टोन बना.

अपने निम्न स्तरीय गीतों पर था एतराज
हिंदी सिनेमा को एक से एक नायाब गीत देने वाले इस गीतकार को अपने कुछ गीतों पर एतराज़ भी रहा. समीर कहते हैं, ‘जब पापा ने डिस्को डांसर के गाने लिखे तो उन्होंने मुझसे कहा कि ऐसा लग रहा जैसे मैं अपने क़लम के साथ दुष्कर्म कर रहा हूं. लोग ये कैसे-कैसे गाने लिखवा रहे हैं. अंजान को एक बात का और भी रंज रहा कि कई सदाबहार नग़मे लिखने के बावजूद उन्हें फ़िल्म फेयर का अवॉर्ड नहीं दिया गया. सिनेमा को क्षेत्रियों बोलियों की महक से रू-बू-रू कराने वाले अज़ीम फ़नकार अंजान आख़िर इस दुनिया से 13 सितंबर 1997 को कूच कर गए।

अनजान के गीतों का जादू आज भी
अनजान ने अपने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे सिने करियर में लगभग 200 फिल्मो के लिये गीत लिखे. लगभग तीन दशको तक हिन्दी सिनेमा को अपने गीतों से संवारने वाले अनजान 67 वर्ष की आयु मे 13 सितंबर 1997 को सबसे अलविदा कह गये.।अनजान के रूमानी नज्म आज भी लोगो को अपनी ओर आकर्षित कर लेते है.
अनजान के पुत्र समीर ने बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी खास पहचान बनायी है.


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