#MeToo: असम में महिला पुलिसकर्मी ने आईपीएस ऑफिसर पर यौन शोषण के आरोप लगाये

गुवाहाटी : भारत में #MeToo अभियान जब शुरू हुआ तो सबसे पहले बॉलीवुड और फिर मीडिया से यौन शोषण की खबरे सामने आने लगीं, फिर इसका दायरा फैला. और फिर राजनीति, पुलिस, एनजीओ जैसे सेक्टर से भी यौन शोषण की खबरें सामने आने लगीं. पटना में पुलिस लाइन में हुए विद्रोह के पीछे की एक कहानी ये भी है कि महिला पुलिसकर्मियों का यौन शोषण होता था. उन्हें छोटे छोटे काम के लिए पुलिस सहकर्मी उनकी अश्लील तस्वीरें, विडियो, चुम्बन, सेक्स आदि की मांग रखते थे और पाते रहे थे. इन्कार करने की शक्ल में महिला पुलिसकर्मियों को निलंबन की सजा भुगतनी पड़ती थी.

ताजा तरीन उदाहरण असम पुलिस का है. जहाँ एक महिला पुलिस कर्मी ने वरिष्ठ आईपीएस ऑफिसर पर यौन शोषण का आरोप लगाया है. ध्यान रहे कि महिला पुलिसकर्मी के पति ने अपनी पत्नी की  प्रतारणा से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी.   माजुली (मुख्यालय) पुलिस की अतिरिक्त अधीक्षक लीना डोले ने अतिरिक्त महानिदेशक (कानून और व्यवस्था) मुकेश अग्रवाल पर छह वर्ष पहले उसका यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया. अग्रवाल इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए मौजूद नहीं हुए.

डोले ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा, ‘मैं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की पीड़ित हूं. मार्च 2012 में मेरे एक सीनियर आईपीएस मुकेश अग्रवाल, (जो तब लॉजिस्टिक के आईजीपी थे) ने मेरे अच्छे काम के लिए मुझे छुट्टियों पर ले जाने का प्रस्ताव दिया था.’ पुलिस अधिकारी ने कहा कि उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकराते हुए डीजीपी को इसकी जानकारी दी थी. उन्होंने कहा कि मैंने मुकेश अग्रवाल के लिए लिखित शिकायत दर्ज कराई थी. डोले के पति ने शिकायत दर्ज कराए जाने के छह महीने बाद खुदकुशी कर ली थी.

उन्होंने कहा कि इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव ईमली चौधरी (जांच अधिकारी) मेरे घर आईं और मुझे आश्वासन दिलाया कि मेरे पति ने उस शिकायत की वजह से आत्महत्या नहीं की है. डोले ने लिखा कि तब तक जांच प्रक्रिया शुरू नहीं हुई थी. मेरे मामले को गलतफहमी के तौर पर खारिज कर दिया गया, जबकि आरोपी ने इस तथ्य को स्वीकार किया था. आरोपी ने मेरे पति को बताए बिना मुझे छुट्टियों पर चलने का प्रस्ताव दिया. इसके बाद उसकी (आरोपी की) पत्नी ने उसके पति की छवि धूमिल करने का आरोप लगाते हुए मुझ पर मानहानि का मामला कर दिया.
दो बच्चों की मां डोले ने कहा, ‘उन्हें मामले में किसी भी तरह कोई न्याय नहीं मिला. मेरे  पति के आत्महत्या करने का दुख और फिर जांच समिति के मामले को गलतफहमी बताते हुए खारिज कर देना, जबकि आरोपी ने मेरे द्वारा लगाए आरोपों को खुद स्वीकार किया था. पुलिस अधिकारी ने शोक जताया कि उनके इस अनुभव के बाद सरकारी विभाग में से किसी ने अपने अनुभव साझा नहीं किए. मैं एक उदाहरण हूं. हार का लेकिन फिर भी जो भी इसके (कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के) खिलाफ खड़ी हुईं हैं उनको शक्ति मिले.’

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