कायस्थों के आराध्य देव भगवान् चित्रगुप्त के पूजन का है बड़ा महत्व

चित्रगुप्त पूजा का कायस्थों में खास महत्व है क्योंकि कायस्थों की उत्पत्ति चित्रगुप्त से मानी जाती है. इसके लिए उनके लिए यह पूजन काफी विशेष माना जाता है. मान्यता के मुताबिक महाभारत में शर-शैया पर पड़े पितामह भीष्म ने भगवान चित्रगुप्त का विधिवत पूजन किया था ताकि उन्हें मुक्ति मिल सके. इसके लिए यह पूजन बल, बुद्धि, साहस और शौर्य के लिए काफी अहम माना जाता है. वहीं पुराणों और ग्रंथों में इस पूजन के बिना की गई कोई भी पूजा अधूरी मानी गई है.

कोई भी कायस्थ दीपावली से कलम स्पर्श नहीं करता है. चित्रगुप्त भगवान के पूजन के पश्चात ही वह कलम स्पर्श करेगा. आज के दिन हर शहरों के चित्रगुप्त मंदिर की सजावट होती है. हर शहर में एक चित्रगुप्त मंदिर प्रायः होता ही होता है. घर पर पूजा करने के पश्चात कायस्थ समाज के लोग वहां सामूहिक पूजा करते हैं और वह दृश्य बहुत ही सुंदर होता है. कलम का वितरण होता है. सामूहिक भोजन होता है. भगवान चित्रगुप्त की भव्य सामूहिक आरती होती है.

भगवान चित्रगुप्त परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं. चित्रगुप्त हर व्यक्ति के कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं. चित्रगुप्त कायस्थों के आराध्य देव हैं. चित्रगुप्त ब्रह्मा की संतान हैं. चित्रगुप्त का जन्म ब्रह्मा के अंश से न होकर सम्पूर्ण काया से हुआ था, इसलिए चित्रगुप्त कायस्थ कहलाये. इसी उपनाम पर इनका गोत्र चला और समाज में कायस्थ जाति की भागेदारी शुरू हुई. चित्रगुप्त जी की दो पत्नियाँ हैं, एक ब्राह्मण और दूसरी क्षत्रिय. इसी कारण कायस्थों में क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों के गुण पाए जाते हैं.

कायस्थ आज के दिन भगवान् चित्रगुप्त के साथ ही कलम और बही खाते की पूजा करते हैं. इसके साथ ही अपने आय व्यय का ब्योरा और घर परिवार के बच्चों के बारे में पूरी जानकारी लिखकर भगवान् के चरणों में अर्पित करते हैं. एक सादे कागज पर अपनी इच्छा लिखकर पूजा के दौरान भगवान् चित्रगुप्त के चरणों में अर्पित करते हैं. चित्रगुप्त पूजा की रस्में मुख्य रूप से पुरुष द्वारा निभायी जाती हैं और पूरा परिवार मिलकर साथ में पूजन करता है. चित्रगुप्त पूजा के मौके पर भगवान को अपनी आमदनी और खर्चों का ब्योरा सौंपा जाता है. वहीं घर की महिलाएं गोधन कूटती है. जिसके बाद महिलाएं भी पूजा में शामिल होती हैं. ऐसी मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त पाप पुण्य का लेखा जोखा रखा करते हैं. दिवाली के बाद भैया दूज के दिन चित्रगुप्त पूजा के साथ लेखनी, दवात और पुस्तकों की पूजा भी की जाती है.

इनकी कथा इस प्रकार है कि सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सृष्टि की कल्पना की तो उनकी नाभि से एक कमल निकला जिस पर एक पुरूष आसीन था. चुंकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की रचना और सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से हुआ था अत: ये ब्रह्मा कहलाये. इन्होंने सृष्ट की रचना के क्रम में देव-असुर, गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरूष पशु-पक्षी को जन्म दिया. इसी क्रम में यमराज का भी जन्म हुआ जिन्हें धर्मराज की संज्ञा प्राप्त हुई क्योंकि धर्मानुसार उन्हें जीवों को सजा देने का कार्य प्राप्त हुआ था. धर्मराज ने जब एक योग्य सहयोगी की मांग ब्रह्मा जी से की तो ब्रह्मा जी ध्यानलीन हो गये और एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद एक पुरूष उत्पन्न हुआ. इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था अत: ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ गया.

इस संदर्भ में एक कथा का यहां उल्लेखनीय है.

सौराष्ट्र में एक राजा हुए जिनका नाम सौदास था. राजा अधर्मी और पाप कर्म करने वाला था. इस राजा ने कभी को पुण्य का काम नहीं किया था. एक बार शिकार खेलते समय जंगल में भटक गया. वहां उन्हें एक ब्रह्मण दिखा जो पूजा कर रहे थे. राजा उत्सुकतावश ब्रह्ममण के समीप गया और उनसे पूछा कि यहां आप किनकी पूजा कर रहे हैं. ब्रह्मण ने कहा आज कार्तिक शुक्ल द्वितीया है इस दिन मैं यमराज और चित्रगुप्त महाराज की पूजा कर रहा हूं. इनकी पूजा नरक से मुक्ति प्रदान करने वाली है. राजा ने तब पूजा का विधान पूछकर वहीं चित्रगुप्त और यमराज की पूजा की.
काल की गति से एक दिन यमदूत राजा के प्राण लेने आ गये. दूत राजा की आत्मा को जंजीरों में बांधकर घसीटते हुए ले गये. लहुलुहान राजा यमराज के दरबार में जब पहुंचा तब चित्रगुप्त ने राजा के कर्मों की पुस्तिका खोली और कहा कि हे यमराज यूं तो यह राजा बड़ा ही पापी है इसने सदा पाप कर्म ही किए हैं परंतु इसने कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को हमारा और आपका व्रत पूजन किया है अत: इसके पाप कट गये हैं और अब इसे धर्मानुसार नरक नहीं भेजा जा सकता। इस प्रकार राजा को नरक से मुक्ति मिल गयी.

 


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