कट्टरपंथ के खिलाफ लगातार आवाज बुलंद करने वाली प्रगतिशील पाकिस्तानी लेखिका फहमीदा रियाज़ का निधन

भारत में जन्मीं और पिता के तबादले के बाद पाकिस्तान जा बसीं प्रगतिशील शायरा फहमीदा रियाज का 72 साल की उम्र में लंबी बीमारी के बाद बुधवार को निधन हो गया.  फहमीदा को साहित्य जगत में अपनी नारीवादी और क्रांतिकारी विचारधारा के लिए जाना जाता रहा है.

फ़हमीदा रियाज़ (1945-2018) को सत्ता और कट्टरता के ख़िलाफ लिखने के कारण जियाउलहक़ के शासन के दौरान इतना प्रताड़ित किया गया कि वे भारत में शरण लेने को मजबूर हुईं.  उन्होंने भारत में फासीवाद के उदय का दौर देखा था और उन्हें पाकिस्तान के बिगड़ने के शुरूआती दिन याद आये, यह कविता बताती है कि वह भारत को उम्मीद से देखती थीं और फिर कितनी निराश हुईं. उनको याद करते हुए यह कविता.

नया भारत / फ़हमीदा रियाज़
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तुम बिलकुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई ?

वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गँवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई !

भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ (नष्ट) करोगे ?

तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी

यहाँ भी मुश्किल होगा जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नजर न आयी?

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना
आगे है गड्ढा यह मत देखो
लाओ वापस, गया ज़माना

कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुतल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई.

मश्क (अभ्यास) करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पाँव ही चलते जाना
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नजर जमाना

एक जाप सा करते जाओ
बारंबार यही दोहराओ
‘कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत’ !

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे

हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ, वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना.

फहमीदा रियाज़ की पहली साहित्यिक किताब 1967 में प्रकाशित हुई थी जिसका नाम ‘पत्थर की जुबान’ था. उनके अन्य कविता संग्रह में धूप, पूरा चांद, आदमी की जिंदगी इत्यादि शामिल हैं. उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें जिंदा बहर, गोदवरी और करांची प्रमुख हैं. उनकी कविताओं में क्रांति और बगावत की झलक मिलती है. जब उनका दूसरा कविता संग्रह बदन दरीदा 1973 में प्रकाशित हुआ तो उन पर कविता में वासना और अश्लीलता के इस्तेमाल के आरोप लगे. उस वक्त तक ऐसे विषय महिला लेखिकाओं के लिए वर्जित माने जाते थे. उनके 15 से ज्यादा फिक्शन और कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

फहमीदा रियाज का जन्म मेरठ में जुलाई 1946 में एक साहित्यिक परिवार में हुआ था. उन्होंने जीवन भर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. चार साल की उम्र में ही पिता की मृत्यु के बाद उनका पालन-पोषण उनकी मां ने किया. बचपन से ही साहित्य में रुचि रखने वाली फ़हमीदा ने उर्दू, सिन्धी और फारसी भाषाएं सीख ली थीं. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रेडियो पाकिस्तान में न्यूजकास्टर के रूप में काम किया. शादी के बाद वह कुछ वर्ष ब्रिटेन में रहीं और तलाक के बाद पाकिस्तान लौट आईं उनकी दूसरी शादी जफर अली उजान से हुई.

जनरल जिया-उल-हक के शासन काल में वो 6 साल भारत में रही. इस दौरान वह दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय में रहीं और उन्होंने हिन्दी पढ़ना सीखा.

1988 में पहली पीपीपी सरकार में फहमीदा को नेशनल बुक काउंसलि ऑफ पाकिस्तान की मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया. बेनजीर भुट्टो के दूसरे कार्यकाल के दौरान वो संस्कृति मंत्रालय से भी जुड़ी रही. 2009 में उन्हें उर्दू डिक्शनरी बोर्ड का मुख्य संपादक नियुक्त किया गया था. उन्होंने अनुवाद के जरिए भी उर्दू साहित्य को समृद्ध किया है. उन्होंने अल्बेनियन लेखक इस्माइल कादरी और सूफ़ी संत रूमी की कविताओं को उर्दू में अनुवादित किया था.

फहमीदा ने अपना पब्लिकेशन आवाज के नाम से शुरू किया जिसके उदारवादी होने के कारण उसे बंद कर दिया गया और जफर को जेल भेज दिया गया. अपने राजनीतिक विचारों के कारण फहमीदा पर 10 से ज्यादा केस चलाए गए, तब अमृता प्रीतम ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बात कर उनके लिए भारत में रहने की व्यवस्था करवाई थी.


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