गीता दत्त, जिनका सिंगिंग करियर आशा- नैय्यर की जुगलबंदी ने बर्बाद कर दिया

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

1972 में मुंबई में शानमुखानान्दा हॉल में श्रोताओं की भीड़ खचाखच भरी हुई थी. माइक पर गीता दत्त थीं. पिछले कुछ साल से वे अवसाद में चल रही थीं. गुरु दत्त की आत्महत्या ने उन्हें बुरी तरह तोड़ कर रख दिया था और वे शराब में खुद को डूबा बैठीं. वे अपनी नयी फिल्म ” अनुभव” के गाने गा रही थीं. आवाज में दर्ज और सोज अभी भी बने हुए थे. श्रोता मंत्रमुग्ध बैठे थे. एक संदेश जा रहा था कि गीता अभी खत्म नहीं हुई है, वो वापसी कर सकती है. गीता दत्त को भी यकीन था कि जिस तरह किशोर ने गायक के रूप में वापसी  की है, उसी तरह वे भी वापसी करेंगी. पर किस्मत को कुछ और मंजूर था. लम्बे समय से शराब के सेवन और अनुशासनहीन जीवन ने उन्हें तरह तरह की बिमारियों से घेर लिया था. और फिर 20 जुलाई 1972 को महज 41 वर्ष की आयु में गीता ने दुनिया छोड़ दी. एक लाजवाब आवाज खामोश हो गयी. हमेशा हमेशा के लिए.

पिछले तीन सालों में गीता ने बेहद कम काम किया था. वे आर्थिक संकटों से घिरी थीं. 1970 में गीता दत्त ने सिर्फ एक फिल्म ” इन्सान और इंसान” में गाना गाया था. 1971 में उन्होंने सिर्फ तीन फिल्म में गाना गाया. कनु रॉय की ” अनुभव”, एक युगल गीत सलिल चौधरी के निर्देश में फिल्म ” रात की उलझन” में और शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फिल्म ” ज्वाला” में.

अनुभव फिल्म में गाये गीतों ने उनके कठोरतम आलोचकों को भी उनका नोटिस लेने पर मजबूर कर दिया. पर उनके पास फ़िल्में नहीं आ रही थीं. 1972 में वे सिर्फ एक फिल्म संगीतकार सुबीर सेन के संगीत निर्देशन में ” मिडनाइट” में गाया.

ये वही साल था, जब आशा भोंसले और संगीतकार ओ पी नैय्यर एक दुसरे से दूर जा रहे थे. एक समय था जब आशा भोंसले की कोई पूछ नहीं थी. ओ पी नैय्यर ने ही उन्हें मौक़ा दिया और महज़ वैम्प की आवाज बनकर रह जाने से रोका. उनकी आवाज का इस्तेमाल उन्होंने फिल्मों की हेरोइन पर किया. आशा की तकदीर चमक उठी. करियर चमकने के साथ दोनों के बीच प्रेम भी पनपा. एक समय था जब आशा ओपी नैय्यर की कैडिलाक गाडी में मुंबई की सडकों पर खुलेआं घुमा करती थीं.

पर 1970 के दशक की शुरुआत में एक नए संगीतकार का बॉलीवुड संगीत के आकाश पर प्रादुर्भाव हुआ और वही दूसरी ओर ओपी नैय्यर के सितारे गर्दिश में जा रहे थे. 1972 में प्राण जाए पर वचन न जाए” फिल्म के लिए आशा ने ओपी नैयार के लिए अंतिम गाना गाया- चैन से आपने मुझे कभी जीने न दिया”. इस गाने के लिए आशा भोंसले को फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला. आशा इस अवार्ड को लेने के लिए नहीं गयीं. ओपी नैय्यर ने इस अवार्ड को आशा भोंसले की तरफ से स्वीकार किया. कहते हैं कि वापस लौटते समय ओपी नैय्यर ने फिल्म फेयर ट्राफी को घृणा से चलती गाडी से सड़क पर फेंक दिया.

आशा ओपी नैय्यर को पीछे छोड़कर उस नए संगीतकार आर डी बर्मन के साथ आगे बढ़ चुकी थीं.

पर कभी इसी आशा- नैय्यर की जुगलबंदी ने गीता दत्त के करियर पर ग्रहण लगा दिया था. हालांकि एक समय ये गीता दत्त ही थीं जो ओपी नैयर को ब्रेक दिलाने के लिए जिम्मेवार थीं. उनके कहने पर उनके पति गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में ओपी नैय्यर को संगीत निर्देशन का मौक़ा दिया. ओपी ने गुरु दत्त की फिल्मों जैसे आर पार, मिस्टर एंड मिसेज 55, जैसी कई फिल्मों में हिट संगीत दिया.

गीता दत्त ने ओपी नैय्यर के निर्देशन में कई हिट गाने गाये. पर गुरु दत्त के वहीदा रहमान से प्रेम ने उनके जीवन में परेशानियों की दीवार खड़ी कर दी. गीता दत्त ने कसम खा ली कि वे वहीदा रहमान के लिए गाने नहीं गायेंगी. उन गानों को आशा भोंसले गाने लगीं. ओपी नैय्यर और आशा के प्रोफेशनल रिलेशन पर्सनल हो चुके थे. फिर एक ऐसा दौर आया जब ओपी नैय्यर ने गीता दत्त से गाने गवाने बंद कर दिए.  गीता दत्त ने एक बार फ़ोन करके नैय्यर से शिकायत की थी:

“अब आप मुझे गाने गाने के लिए नहीं बुलाते.”

उसी दौर में संगीतकार एसडी बर्मन और लता मंगेशकर के बीच मनमुटाव हो गया था. बर्मन दा चाहते थे कि गीता दत्त उनके गाने गाएं. लेकिन पारिवारिक समस्याओं का उनके गायन पर असर पड़ा. उस तरह वो गायकी पर ध्यान नहीं दे पाईं, जैसा एसडी बर्मन चाहते थे. बर्मन दा ने आशा भोंसले की तरफ रुख कर लिया.

गीता दत्त का जन्म बंगलादेश के फरीदपुर में हुआ था:

गायिका गीता दत्त या गीता घोष रॉय चौधरी या गीता रॉय का जन्म 23 नवंबर 1930 को बंगाल (बांग्लादेश) के फरीदपुर में हुआ था.  एक जमींदार परिवार में जन्मीं गीता 10 भाई-बहनों में से एक थीं.  चालीस के दशक में परिवार जमीन-जायदाद छोड़कर कलकत्ता और असम आ गया. फिर बंबई शिफ्ट हो गए, जहां दादर में एक अपार्टमेंट ले लिया गया. गीता रॉय की मां अमिय देवी कवियत्री थीं. भाई मुकुल रॉय संगीतकार थे. गीता जी ने अपनी मां के लिखे और भाई के संगीतबद्ध गीतों को भी गाया है, जिसका रिकॉर्ड आया था.

संगीतकार हनुमान प्रसाद ने गीता को गाते सुना. उन्होंने 1946 में रिलीज हुई फिल्म भक्त प्रह्लाद में गीता से दो लाइनें गाने के लिए कहा. वो दो लाइनें स्टूडियो में मौजूद हर शख्स को पसंद आईं. पहला बड़ा मौका मिला फिल्म दो भाई में. इस फिल्म का एक गाना मेरा सुंदर सपना बीत गया… जबरदस्त हिट हुआ.

साल 1951 में गुरु दत्त बतौर डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म बाजी बना रहे थे. इस फिल्म का एक गाना ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ गीता दत्त ने गाया था. उस वक्त गीता एक स्टार सिंगर थीं. वो करीब 500 से ज्यादा गाने गा चुकी थीं. इस मुलाकात के बाद गुरु दत्त और गीता के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

3 साल के प्यार के बाद दोनों ने साल 1953 में शादी कर ली. ये शादी बंगाली रीति रिवाजों के साथ सम्पन्न हुई. गुरु दत्त और गीता दत्त के  तरुण, अरुण और नीना. शादी के कुछ सालों बाद ही दोनों के रिश्ते बिगड़ने लगे. यह शादी केवल 11 साल ही चली. गीता दत्त की ननद ललिता लाजिमी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ‘दोनों के बीच ईगो की टकराहट थी.

गीता दत्त और गुरु दत्त के बीच लगातार झगड़ हो रहे थे. झगड़े के बाद गीता बच्चों को लेकर मायके चली जाती थीं. वैवाहिक जीवन में दिक्कतों के चलते गुरु दत्त डिप्रेशन में चले गए. दूसरी ओर गुरु दत्त और वहीदा रहमान के बीच अफेयर के किस्से तेजी से उड़ने लगे. गीता दत्त इस बात को लेकर गुरु दत्त से नाराज रहने लगीं. वहीं शादी के बाद गुरु दत्त ने गीता को फिल्मों में गाने से मना कर दिया.

गीता के लिए गुरु दत्त ने गौरी नाम से एक फिल्म शुरू की लेकिन दो दिन बाद ही इसकी शूटिंग रोकनी पड़ी. कहा जाता है सेट पर गीता अक्सर गुरु दत्त से झगड़ने लग जाती थीं. साल 1964 में गुरु दत्त किराए के फ्लैट में मृत पाए गए. खबरों के मुताबिक, उन्होंने नींद की गोलियां खाकर सुसाइड कर लिया था.

गुरु दत्त  की मौत के बाद गीता ने बहुत शराब पीनी शुरू कर दी. इस दौरान कई गाने जो पहले गीता दत्त को मिलने वाले थे वो आशा भोसले की झोली मे जाने लगे. घर चलाने के लिए उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. फिल्मों में काम ना मिलता देख उन्होंने छोटे-मोटे स्टेज शोज करने शुरू कर दिया. आखिरकार साल 1972 में लिवर की बीमारी होने से गीता का निधन हो गया.  1972 में महज 41 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई. इससे ठीक पहले उन्होंने बासु भट्टाचार्य की फिल्म अनुभव के लिए वो यादगार गाना गाया था- मेरा जां, मुझे जां न कहो मेरी जां….

अपने पूरे सिंगिंग करियर में गीता ने भजन से लेकर कैबरे गीत और प्यार और दर्द से भरे गानों से लेकर लोरियों तक सभी तरह के गाने गाये.

गीता दत्त से जुडी एक दिलचस्प कहानी पंडित जसराज की भी है:  

पंडित जसराज की एक दिलचस्प कहानी है. आजादी से पहले की बात है. कलकत्ता में रहते थे. मां बीमार थीं. डॉक्टर को घर बुलाना था. पैसे थे नहीं. घर आने के लिए डॉक्टर की फीस 15 रुपए थी. मजबूरी थी. पंडित जी ने डॉक्टर को बुला लिया. उनसे फीस की बात तो नहीं की. लेकिन इतना जरूर कहा कि आज शाम उनका रेडियो पर प्रोग्राम है. उसे सुनें. डॉक्टर की शास्त्रीय संगीत में कोई रुचि नहीं थी. उन्होंने कहा कि मुझे रुचि नहीं है. वैसे भी मैं शाम को व्यस्त हूं. मुझे अपनी भांजी के घर डिनर पर जाना है.

अगले दिन डॉक्टर फिर घर आया. उसके सुर बदले हुए थे. बहुत खुश था. डॉक्टर ने बताया कि भांजी के घर रेडियो बज रहा था. आपका गाना सुना, सबने बड़ी तारीफ की. इसका फायदा यह हुआ कि डॉक्टर ने 15 रुपए के बजाए फीस ली दो रुपए. डॉक्टर की भांजी का नाम था गीता रॉय. वही गीता रॉय जो आगे चलकर बनीं गीता दत्त. गुरु दत्त की पत्नी. मशहूर गायिका. बगैर जाने उन्होंने एक तरह से पंडित जसराज की मदद की.


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