16वी लोकसभा, बिहार और झारखंड में 54 सीटें; और महिला सांसद सिर्फ 3; इस बार स्थिति बदलेगी क्या?

2014 के लोक सभा चुनाव से 16वी लोकसभा के सदस्य चुने गए थे. 2014 में चुनाव 7 अप्रैल से 12 मई तक 9 फेज में संपन्न हुआ. भाजपा 282 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. 26 मई को नरेंद्र मोदी भारत के 14वे प्रधानमंत्री बने.
16वी लोकसभा में कोई विपक्ष का नेता नहीं था. क्योंकि नियम कहते हैं कि किसी दल को विपक्षी दल की हैसियत पाने के लिए कुल सीट (545) का कम से कम 10 प्रतिशत सीट प्राप्त होना चाहिए. लेकिन सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को केवल 44 सीट पर जीत हासिल हो सकी और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी AIDMK के पास 37 सांसद थे. ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकसभा में कांग्रेस का नेता चुना गया, हालाँकि वे आधिकारिक तौर पर लोकसभा में विपक्ष के नेता नहीं थे.

अगर 16 वी लोक सभा में सदस्यों के ऐज ग्रुप पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि
40 साल से कम उम्र के सांसदों की संख्या 46 हैं , वहीँ 41 से 50 ऐज ग्रुप के 103 सांसद हैं ; 51 से 60 ऐज ग्रुप में 164 सांसद; 61 से 70 ऐज ग्रुप में 161 सांसद, 71 से 80 साल के ऐज ग्रुप में 53 सांसद, और 80 साल से अधिक उम्र के 8 सांसद रहे.

अगर महिला सांसदों की बात करें तो

16 वी लोक सभा में कुल 543 सदस्य चुने गए, जिसमे महिला सांसदों की संख्या 62 रही. यह आजादी के बाद सबसे अधिक संख्या रही. इससे कम 2009 में 15वी लोक सभा में 58 महिला सांसद चुनी गयी थीं.

अगर महिला सांसदों का राज्य वार प्रतिनिधित्व देखें तो हम पाते हैं कि सबसे अधिक उत्तर प्रदेश से 14 सांसद, फिर पश्चिम बंगाल से 13, महाराष्ट्र से 6, गुजरात और मध्य प्रदेश से 5-5, बिहार से ३ महिला सांसद 16वी लोक सभा में पहुंची.
अगर दलवार विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि महिला सांसदों में सबसे अधिक भाजपा की 32 सांसद, तृणमूल कांग्रेस की 12 सांसद रहीं. वही कांग्रेस से 4 महिला सांसद, बीजू जनता दल से 3, वाई एस आर कांग्रेस से 2 महिला सांसद, जबकि सीपीएम, अपना दल, एनसीपी, आर एल डी, शिरोमणि अकाली दल, सपा जैसी पार्टियों से 1-1 महिला सांसद चुनी गयीं.
बिहार की बड़ी पार्टियों राजद और जदयू से एक भी महिला सांसद लोकसभा नहीं पहुंची.

16वी लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व के मामले में बिहार और झारखंड की तस्वीर दयनीय है:

बिहार और झारखण्ड को मिलाकर कुल 54 लोक सभा सीट हैं. बिहार में 40 और झारखण्ड में 14. बिहार से 16वी लोक सभा में तीन महिला सांसद हैं.
1. शिवहर लोक सभा सीट से रमा देवी ( भाजपा)
2. सुपौल लोक सभा सीट से रंजीत रंजन ( कांग्रेस)
3. मुंगेर लोक सभा सीट से वीणा देवी ( लोजपा)

पिछले लोकसभा चुनाव में झारखंड से कोई महिला सांसद नहीं चुनी गयीं थी. यह एक सच्चाई है कि किसी बड़ी पार्टी ने महिला उम्मीदवारों पर अपना विश्वास नहीं जताया था और किसी महिला को टिकट नहीं दिया था. पिछले चुनाव में 17 महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में थीं, जिनमें से 16 की जमानत जब्त हो गयी थी, एकमात्र उम्मीदवार खूंटी से दयामनी बारला थीं, जिनकी जमानत जब्त नहीं हुई थी. दयामनी बारला को आम आदमी पार्टी ने टिकट दिया था, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पायीं थीं.

15वीं लोकसभा में भी झारखंड से कोई महिला सांसद नहीं थीं, 14वींलोकसभा में खूंटी से कांग्रेस सांसद सुशीला केरकेट्टा और जमशेदपुर से जेएमएम से सुमन महतो चुनी गयीं थीं. 13वीं लोकसभा में दो महिला सांसद झारखंड से चुनी गयीं थीं, जिनमें जमशेदपुर से आभा महतो और धनबाद से रीता वर्मा शामिल थीं.

हालांकि अभी तक बिहार और झारखण्ड में पार्टियों ने उम्मीदवारों की सूची फाइनल नहीं की है, पर जिन राजनीतिक सूरमाओं के नामों पर चर्चा चल रही है, उससे यही उम्मीद है कि एक बार फिर महिला उम्मीदवार दरकिनार कर दी जाएंगी. ऐसे में संसद में महिला आरक्षण की जरुरत बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही है. महिलाओं ने हर क्षेत्र में कुशलता साबित की है, चाहे वो मेडिसिन, प्रशासन, कॉर्पोरेट, अकादमिक हो या डिफेन्स सेक्टर ही क्यों न हो, पर राजनीति पारम्परिक रूप से पुरुष प्रधान क्षेत्र रहा है और महिलाओं को यहाँ मौके कोई दल दे नहीं रहा है. संसद में जो महिलाएं पहुँच रही हैं, वे अक्सरहां राजनीतिक घरानों से आती हैं. अपने बलबूते जगह बनाने वाली महिलाओं की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है.

बिहार में समाजवादी सिद्धांतों में यकीं रखने वाले दलों जैसे जदयू और राजद ने भी महिला नेतृत्व में भरोसा नहीं दिखाया है. दुखद बात ये है कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने में कोई ख़ास रूचि नहीं दिखाई है. 2018 में कम्युनिस्ट नेत्री निवेदिता शकील ने बिहार में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम सेक्स काण्ड में बेहद प्रशंसनीय भूमिका निभायी और सुप्रीम कोर्ट उनकी जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इस केस की मॉनिटरिंग को राजी हुआ. लेकिन राजनीतिक आवोहवा में कहीं भी निवेदिता शकील के नाम की चर्चा कम्युनिस्ट पार्टी नहीं कर रही है.

वहीँ झारखण्ड में दयामनी बारला जनहित के मुद्दों पर संघर्ष करने वाली नेत्री की एक बेहतरीन उदाहरण हैं. उन्होंने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के मुद्दे उठाये हैं, आदिवासियों के हितों के नाम पर झारखण्ड राज्य के गठन के आंदोलन में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा काफी आगे रहा था. पर दयामनी बारला के नाम पर भी जे एम् एम् किसी तरह से विचार कर रहा हो, ऐसा लगता नहीं है.
तो कुल मिलाकर फिर से पुराना किस्सा दुहराया जाएगा. महिलायें दलों के लिए पैदल सैनिकों के तौर पर काम करेंगी, पर नेतृत्व में उनकी भागेदारी फिलहाल दूर की कौड़ी लग रही है.


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