38 वर्षीय युवा क्रांतिकारी कवि पाश 23 मार्च 1988 को खालिस्तानी आतंकवादियों के द्वारा मौत के घाट उतार दिए गए

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

कलम वो जो सत्ता पक्ष के समकक्ष आम जन की आवाज बुलंद करे. पाश की आग उगलने वाली कलम वही कलम थी. पाश की शहादत पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं.
___________

प्रसिद्द वामपंथी कवि अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश की ह्त्या 23 मार्च 1988 को उनके गांव में कुएं पर खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा कर दी गयी. 1950 में जन्मे पाश तब महज 38 साल के थे. औ र पंजाब में नक्सल आंदोलन और हरित क्रांति से उपजी समृद्धि का चंद हाथों में सिमट जाने के खिलाफ आवाज उठा रहे थे. उन दिनों पंजाब खालिस्तानी अलगाववाद की चपेट में था. पाश इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे. वे व्यवस्था में बैठे शक्तिशाली लोगों की नज़रों में में चढ़ गए थे.

और फिर बन्दूक ने उनकी आवाज खामोश कर दी. पर पाश की क्रांतिकारी कवितायेँ मिटाई नहीं जा सकीं. अन्याय और सामाजिक असमानता के खिलाफ जब भी आवाज उठायी जाती है, पाश की कवितायेँ जेहन में आती हैं.

उन्हें क्रांति का कवि माना गया. उनकी तुलना भगत सिंह और चंद्रशेखर से भी की जाती रही पर वे जिंदगी और इस दुनिया को बेपनाह प्यार करनेवाले कवि थे. पाश के बारे में एक गौरतलब बात यह भी है कि पंजाबी भाषा का कवि होने के बावजूद पूरी हिंदी पट्टी उन्हें अपना मानती है. अपनी भाषा का कवि. अपवाद के रूप में यदि अमृता प्रीतम की बात न की जाए तो इस भाषा के किसी और कवि को हिंदी में शायद ही इतनी प्रसिद्धि प्राप्त हुई हो.

पाश की सबसे प्रसिद्द कविता है, ” सबसे खतरनाक है सपनों का मर जाना”

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

2006 में पाश की इस कविता को NCERT की 11वी कक्षा की हिंदी किताब में शामिल किया गया था. 2017 में दीनानाथ बत्रा की सलाह पर मोदी सरकार ने इस कविता को पाठ्यक्रम से हटाने का आदेश जारी किया.

पाश 15 वर्ष की किशोरवय उम्र से ही कविताएं लिखकर छोटे-छोटे कदमों से प्रसिद्धि की ऊंचाइयों की तरफ बढ़ने लगे थे और 20 साल की उम्र में जब उनका पहला कविता संग्रह ‘लौह कथा’ छपा उससे पहले ही वे क्रांतिकारी कवि के रूप में प्रसिद्धि पा चुके थे. पाश का कविता संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ पंजाबी भाषा की सबसे अधिक बिकने वाली किताब है. (हिंदी में भी इसके कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं) पाश का इस किताब के साथ एक बुरा अनुभव भी रहा. जिस प्रकाशक ने पंजाबी में इसे छापा था, सालभर के भीतर उसने इसकी सारी प्रतियां बेच लीं पर पाश को इस बिक्री से एक पाई भी नहीं दी. पाश इस बात को लेकर बहुत क्षुब्ध रहे. वे खुलकर मानते थे कि वे पंजाबी भाषा के बड़े कवि हैं. लेकिन खुद को स्थापित करने के लिए उन्होंने कभी आलोचकों की खुशामद नहीं की. दुनिया के तमाम इंसानों की आन-बान और उनकी रीढ़ की हड्डी सधी रहे इस बात की चिंता के साथ उतने ही शदीद तरीके से उन्हें अपना स्वाभिमान भी प्यारा था.

पाश को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए शोषण, दमन और अत्याचारों से मुक्त समतावादी दुनिया चाहिए थी. यही उनका सपना था और इसके लिए लड़ाई मजबूरी. उनके पास कोई बीच का रास्ता नहीं था. नामवर सिंह ने पाश को श्रद्धांजलि देने के क्रम में उन्हें एक शापित कवि कहा था. पाश शापित कवि थे, किसी शापित यक्ष की ही तरह. जिंदगी से भरे इस कवि को कभी भी अपने मन लायक जीवन या दुनिया नहीं मिली.

वे सबको आगाह कर रहे थे – ‘यह वक़्त बहुत अधिक खतरनाक है साथी.’… और यह भी कि – ‘हम सब खतरा हैं उनके लिए / जिन्हें दुनिया में बस ख़तरा-ही-खतरा है.’ और उनका यह डर भी कोई बेबुनियाद डर नहीं था. पहले उन्हें 1969 में झूठे आरोपों में फंसाकर जेल भेजा गया फिर खालिस्तानी आतंकवादियों ने 23 मार्च, 1988 को उनकी हत्या कर दी.

 

पाश की शहादत कभी बेकार नहीं जायेगी. कलम वो जो सत्ता पक्ष के समकक्ष आम जन की आवाज बुलंद करे. पाश की आग उगलने वाली कलम वही कलम थी. पाश की शहादत पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.